ढलती सांसें – कविता झा ‘अविका’ : Moral Stories in Hindi

अपनी अपनी सीट पर बैठे सभी श्रोता उठकर ताली बजाने लगे और पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा जब सुहासिनी का गीत खत्म हुआ और उसने एक गहरी सांस भरी। उसकी सांसें किसी समय भी उसका साथ छोड़ सकती है इसका इल्म है उसे पर अंतिम सांस तक कुछ कर गुजरने की इच्छा और उसका जुनून ही उसे आज यहां साहित्य के महाकुंभ में ले आया था।

पहले किसी को विश्वास ही नहीं हुआ था कि ये बुजुर्ग महिला जिस तरह आईं हैं… वो माइक के सामने दो शब्द भी ठीक से बोल पाएंगी या नहीं। पर जब उन्होंने सबको संबोधित कर अपना लिखा छंद गीत गाना शुरू किया तब उनके गीत पर पांव थिरकने लगे थे सभी के। 

“वाह! वाह! मजा आ गया।”

पूरे हॉल में यही आवाज गूंज रही थी।

 

सुबह से हॉल में बैठे सभी कवियों की कविताएं सुनकर सभी श्रोतागण, कार्यकर्ता और अपनी बारी खत्म करके बैठे कवि कवियत्री सभी बुरी तरह से थक गए थे। सभी कार्यक्रम समाप्त होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। ऐसे में कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति देने जो आई उसे देखकर तो कई लोग 

वहां से उठकर जाने को तैयार थे तो सुहासिनी ने अपनी थरथराती आवाज में कहा…

“बस दो मिनट और रुक जाइए… आप लोग… और मेरा लिखा यह गीत… जो मैं आज सुनाने आई हूं सुन लीजिए।”

लोगों के खुसफुसाहट की आवाज सुनाई दी थी।

” पैर कब्र में हैं इन मोहतरमा के और हम युवा कवियों के मुकाबले में श्रोताओं के बीच कविता सुनाने आईं हैं वो भी व्हील चेयर पर बैठे।”

अठासी वर्ष की सुहासिनी जिसे सांस लेने में तकलीफ़ होती है और हमेशा उसके साथ उसके बेटे बहू पोता पोती या बेटी और जमाई रहते हैं । उसे ऑक्सीजन सिलेंडर की कभी भी जरूरत पड़ जाती है। चलना मुश्किल है उसके लिए इसलिए व्हील चेयर की व्यवस्था रहती है पर उसमें सीखने की ललक अभी भी है।एक ज़िद्दी बच्चे की तरह वो सब सीखना और करना चाहती है जो वो जीवन के इस लंबे सफर में अब तक ना कर सकी अब जीवन की सांझ की इस बेला को अपने नाम करना चाहती है। अपनी एक पहचान बनाना चाहती है। जिसमें उसका परिवार उसका पूरा सहयोग कर रहा है। जहां आज के बच्चे अपने मां बाप को बोझ समझ कर उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं वहीं सुहासिनी आज अपनी बहू बेटे के साथ इस कार्यक्रम में आई थी हवाई जहाज में बैठकर मुंबई से पटना।

रोज नया सीखने की उम्मीद में ही उसके जीवन की हर सुबह होती है।

नकारात्मक खुसफुसाहट को अनसुना किया था उसने और अपनी प्रस्तुति देने के बाद हुई वाहवाही से उसकी आंखें छलक उठीं थीं जब सबने उनकी खूब तारीफ की। उन्हें मंच ने सम्मानित किया और जब उनसे उनके बारे में पूछा कि आपने ये गीत कब और कैसे लिखा तो जो उन्होंने बताया वो सबके लिए प्रेरणादायक है।

“जैसा कि आप सब अब तक जान गए हैं कि मेरा नाम सुहासिनी है और मैं यहां अपनी बेटे और बहू के साथ आई हूं। मेरे जीवन की शाम कभी भी ढल सकती है और मैं रात के अंधेरे में समा जाऊंगी। यही सबके साथ होता है और यही प्रभु का विधान है। 

मरना तो एक दिन सभी को है पर जब तक जीवन है उसे खूब खुश होकर जीना चाहिए। मैंने अभी कुछ साल पहले बी ए की परीक्षा दी अपने पोते के साथ। बचपन से बड़ा शौक था पढ़ने का पर मौका ही नहीं मिला। छोटी उम्र में शादी कर दी गई फिर घर गृहस्थी बाल बच्चों में ही उलझी रही। अब यही बच्चे मेरे लिए वो सब करते हैं जो मैं कभी करना चाहती थी। बच्चों ने ही मुझे इंटरनेट की दुनिया से मिलाया है इस मोबाइल के जरिए। मुझे मोबाइल और लैपटॉप चलाना सिखाया और मेरे लिखने पढ़ने के शौक को पूरा किया।

 मैं कुछ साहित्यिक मंचों से जुड़ी और छंद सीखने लगी। इसमें रुचि बढ़ती ही गई। मात्रा और कल संयोजन सीखकर अपने भावों को लिखने में मज़ा आने लगा। जब मुझे काव्य पाठ के लिए इस मंच के अध्यक्ष जो मेरे बेटे के मित्र हैं उन्होंने आमंत्रण दिया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, खुद पर विश्वास भी नहीं हो रहा था कि मैं जो एक कदम बिना सहारे के चल नहीं पाती हूं वो कैसे इतनी दूर इतने बड़े कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति दे पाऊंगी। मेरे बच्चों के साथ के कारण ही मैं आज यहां आप सब के बीच उपस्थित हूं।”

सुहासिनी को बोलते हुए खांसी उठने लगी और उसे सांस लेने में दिक्कत होता देख उसकी बहू और बेटा हाथ में आक्सीजन सिलेंडर और मास्क लिए दौड़ते हुए मंच पर आए और वहीं उसे मास्क पहना कर जब ले जाने लगे तो उसने उन्हें हाथ के इशारे से मना किया। बस दो मिनट का इशारा करते हुए उन्हें वहीं रुकने को कहा।

सबकी आंखें भर आईं थीं और सभी उनकी पूरी कहानी सुनना चाहते थे।

पूरे हॉल में शांति पसर गई थी और सबकी धड़कनें तेज हो गई थी। प्रार्थना के लिए आंखें बंद कर ली थी सबने थोड़ी ही देर बाद सुहासिनी की आवाज पुनः सुनाई दी। मास्क हाथ में पकड़े वो मुस्कुरा रही थी।

“अरे! तुम लोग क्या समझे बुढ़िया चल बसी। अभी तो बहुत कुछ सीखना बांकी है बस शाम ही हुई है जीवन की रात अभी बाकी है। यह ऑक्सीजन सिलेंडर है ना जब सांस रुकने लगती है तो पुनः जीवन दे देता है। मेरी बहू मेरी बेटी से कम नहीं है इसी के कारण मैं आज यहां तक आई हूं।” सुहासिनी ने अपनी बहू का माथा चूम लिया।

पूरा हॉल तालियों से पुनः गूंज उठा।

” बुढ़ापे में जब बच्चे साथ हों तो शारीरिक समस्याएं भी हार जाती हैं।” सुहासिनी ने कहा और उसका बेटा बहू उसे ले जा रहे थे।

सबकी आंखें नम थी और चेहरे पर मुस्कान छा गई थी। 

“बुढ़ापा तो एक दिन सबको आना ही है। शरीर का कौन सा अंग साथ छोड़ेगा कुछ नहीं कह सकते पर जीने की ललक और कुछ सीखने का जज्बा कायम रहे तो यह जीवन की सांझ हसीन हो जाएगी।” अध्यक्ष के इन शब्दों के साथ कार्यक्रम समाप्त हो गया था।

कविता झा ‘अविका’

रांची, झारखंड

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