कहानी के पिछले भाग के अंत में आपने पढ़ा के, अंगद स्कूल खुलने से पहले ही विभूति की दुकान पर पहुंच जाता है…. उसी लड़की के बारे में सब कुछ जानने…
अब आगे..
विभूति: अरे मास्टर जी..! बैठिए.. बैठिए… चाय के साथ बिस्कुट भी दे दूं ना..?
अंगद: हां… दे दो… वैसे कितनी सुबह दुकान खोल लेते हो..?
विभूति: 5:00 बजे… वह क्या है ना, रास्ते के किनारे पर दुकान है… आते जाते राहगीर रुककर यहां चाय पीते हैं… वैसे हमारी उन राहगीरों से ही असली आमदनी है… वरना इस छोटे से कस्बे में कितने ही लोग हैं और वह कितने ही चाय पीने आते हैं हमरी दुकान पर..?
अंगद: वैसे विभूति…. आज मेरे यहां जल्दी आने की एक और वजह भी है….
विभूति: देखिए मास्टर जी..! आप इस किस्बे में, यहां के बच्चों को पढ़ाने आए हैं… तो सिर्फ उसी से मतलब रखें, तो बेहतर होगा… क्योंकि बेकार के लफड़ाे में पड़कर मैं नहीं चाहता जो, इतने दिनों बाद इस किस्बे में एक मास्टर आया हैं… वह भी चला जाए… क्यों सुरैया की वजह से अपना और हमारा काम बिगाड़ना चाहते हैं…? जब पूरा कस्बा इस बात के लिए कुछ ना कर पाया, तो हम और आप क्या ही कर लेंगे..?
अंगद: विभूति..! मैं कुछ करने की बात तो सोच भी नहीं रहा… मैं भी अब इस कस्बे का हिस्सा हूं, तो उस हिसाब से मुझे भी यहां के सभी लोगों के बारे में जानकारी तो होनी चाहिए ना…? यहां रहते रहते आज नहीं तो कल, मुझे यह सब तो पता चलेगा ही… बस इसलिए…!
विभूति: तो फिर उस समय का ही इंतजार कीजिए…. मास्टर जी..! इस समय और ना किसी भी समय, आप हमसे कुछ जानने की उम्मीद मत कीजिएगा… काहे की हमको अपनी जिंदगी में कोई बवाल नहीं चाहिए…
अंगद अब समझ चुका था कि, विभूति उसे कुछ भी नहीं बताएगा… पर अब उसका उस लड़की के बारे में जानने की इच्छा और बढ़ जाती है और वह उसे जानकर ही रहेगा, इस सोच के साथ वहां से चला जाता है… चलो कम से कम, उस लड़की का नाम तो पता चला… अंगद यही सोचते हुए, स्कूल की ओर जा रही रहा था कि, तभी उसने रास्ते में सुरैया को एक पेड़ के नीचे बैठा पाया…
तो वह उसी के पास चला गया… पहली बार जब अंगद उससे मिला था… वह शायद भीड़ की वजह से ध्यान नहीं दे पाया… पर आज एकांत में अंगद सुरैया को देखकर हैरान ही हो गया… क्योंकि वह गर्भवती थी… अंगद यही सोचकर अचंभित था… और उससे कहता हैं… अरे सुरैया..! स्कूल नहीं जाना…?
सुरैया: स्कूल..? पर मुझे वहां सभी मारेंगे…
अंगद: कोई नहीं मारेगा… मैं हूं ना…
सुरैया: कौन हो तुम..? मैं तुम्हारे स्कूल का मास्टर जी… उसी दिन तो मिला था…
सुरैया: मास्टर जी..!
अंगद: चलो मेरे साथ..!
सुरैया: आप मुझे अ से अनार आ से आम पढ़ाएंगे…?
अंगद: हां…
सुरैया: पर मास्टर जी..! आप मुझे सजा देने उस टूटे कमरे में मत ले जाना…
अंगद: क्या..? कौन सा टूटा है कमरा…?
सुरैया चुप होकर फिर पत्थरों से खेलने लगती है… अंगद उससे पूछता है… कौन सा टूटा कमरा…?
सुरैया: अ से अनार आ से आम
तो कहो भैया, इसके दोगे कितने दाम…?
अंगद उसे लेकर स्कूल पहुंच जाता है…
अंगद: देखो बच्चों..! आज से सुरैया भी इसी कक्षा में बैठेगी… कोई भी उसे नहीं छेड़ेगा, ना ही उसका मजाक उड़ाएगा… अगर कोई ऐसा करता हुआ मुझे दिख गया तो, उसे सजा मिलेगी…
सुरैया सजा का नाम सुनकर घबरा कर खड़ी हो जाती है और ना…ना… सजा नहीं… सजा नहीं…. कहते हुए कक्षा से निकलकर भाग जाती है…
अंगद उसे कितनी आवाजें देता है… पर वह नहीं आती… इतने में एक बच्चा आकर कहता है…. मास्टर जी..! वह पगली नहीं आएगी… सजा के नाम पर वह ऐसे ही भाग जाती है…
अंगद वापस कक्षा में जाकर बच्चों को पढ़ाने लगता है…. स्कूल से जब वह घर वापस जा रहा होता है तो, वह विभूति के दुकान पर चुपचाप जाकर बैठ जाता है… पर वह विभूति से ना तो चाय मांगता है और ना ही उससे कोई बात करता है…
विभूति थोड़ी देर उसे तकने के बाद, उसके पास आकर उसे एक कप चाय देखकर करहता है…. मास्टर जी..! क्या हुआ हम से गुस्सा हो क्या..?
अंगद: अरे.. नहीं… नहीं…. वह तो मैं कुछ सोच रहा था…
विभूति: का सोच रहे थे मास्टर जी…? यही के सुरैया क्यों सजा का नाम सुनकर कक्षा से भाग गई..?
अंगद हैरानी से: पर तुम्हें कैसे पता…?
क्या कहता है विभूति..?
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दर्द की दास्तान ( भाग-3 ) – रोनिता कुंडु : Moral Stories in Hindi