डर – बीना शर्मा   : Moral Stories in Hindi

कविता आज बेहद खुश थी काफी समय बाद वह अपने मम्मी पापा से मिलकर जो आई थी परंतु, जैसे ही अपने मम्मी पापा से मिलने के बाद अपनी ससुराल पहुंची तो उसने देखा उसकी सास  बिमला गुस्से में भरी बैठी थी कविता को देखते ही गुस्से में बोली”आज तू मुझसे बिना पूछे अपने घर चली गई तुझे किसने हक दिया

मुझसे पूछे बगैर अपने घर जाने का क्या तेरे मन में मेरे लिए बिल्कुल भी डर नहीं रहा?”सास की बात सुनकर कविता की सारी खुशी पल भर में गायब हो गई थी कुछ साल पहले ही उसकी शादी किशन के साथ हुई थी शादी के बाद जब वह अपनी ससुराल आई तो सास की यह बात सुनकर वह बहुत खुश हुई थी कि

” मेरे घर में बेटी बहु को बराबर हक मिलेगा”लेकिन उसकी खुशी ज्यादा दिन तक कायम ना रह सकी थी एक दिन भूख लगने पर जब उसने पति और ससुर को खाना खिलाकर अपनी ननंद नैना से पहले खाना खा लिया तो उसकी सास गुस्से में उसे डांटते हुए बोली”इस घर में सबसे पहले खाना खाने का हक सास ससुर और बेटा बेटी का होता है सबके खाना खाने के बाद ही बहू खाना खाती है।”

  सास की बात सुनकर उसकी आंखें नम हो गई थी उसके मायके में तो ऐसी कोई प्रथा नहीं थी उसकी भाभी को जब भी भूख लगती वह  तभी खाना खा लेती थी उसके मम्मी पापा ने उसकी भाभी को वह सारे हक दे रखे थे जो उन्होंने अपनी बेटी को दिए थे उसकी भाभी का जब मन करता अपने मम्मी पापा से मिलने अपने मायके चली जाती थी लेकिन ससुराल में आने पर उसे पता चला कि उसका तो कोई हक ही नहीं था ।

   पहली बार राखी पर जब उसकी ननंद उसे राखी बांधने आई तो खुशी खुशी ननद से राखी बंधवा कर उन्हें खाना खिला कर उनकी मनपसंद साड़ी और दक्षिणा देकर जब सास से उसने अपने भाई को राखी बांधने के लिए अपने घर जाने के लिए इजाजत मिली तो ननदोई के सामने भलाई लूटने के लिए उन्होंने हां कर दी थी परंतु,

जब वह अपने भाई को राखी बांधकर शाम के समय वापस घर आई तो सास गुस्से में बोली”मेरी बेटी और दामाद को घर पर छोड़कर खुद राखी बांधने चली गई तुझे शर्म नहीं आई उन्हें इस तरह अकेला छोड़कर

खबरदार जो आज के बाद किसी त्योहार पर अपने घर गई।”

 सास की बात सुनकर कविता की आंखें छलक आई थी जब उसने किशन से इस बारे में कुछ कहना चाहा तो किशन ने भी अपनी मां का ही पक्ष लिया उसके बाद घर में क्लेश ना होने के डर से वह राखी या  भैयादूज किसी भी त्यौहार पर  अपने घर नहीं गई थी बस अपनी ननद ननदोई की सेवा में लगी रहती थी

जब उसके पापा उसे फोन करके बुलाते तो वह घर में काम होने का बहाना लगाकर अपने घर जाने से इनकार कर देती थी उसकी ननद हमेशा हर त्यौहार पर और जब भी छुट्टियां पड़ती तुरंत  मायके  आ जाती थी।

   एक बार उसके पापा को दिल का दौरा पड़ा तो जब उसने अपने पापा को देखने के लिए अपनी सास से इजाजत मांगी तो सास बोली”बुढ़ापे में तो ऐसी बीमारी लगी ही रहती हैं क्या करेगी अपने मायके जाकर? अपने घर का काम संभाल..…सास की बात सुनकर उसे बेहद दुख हुआ उसे अपनी सास से ऐसे जवाब की अपेक्षा नहीं थी

क्योंकि जब भी उन्हें बुखार होता तो तुरंत उनकी बेटी उन्हें देखने दौड़ी चली आई थी एक बार सास की तबीयत खराब होने पर जब उसकी बेटी उन्हें देखने नहीं आई तो सास ने बेटी को फोन करके जब उसके ना आने का कारण पूछा तो बेटी के यह कहने पर की उसकी सास ने उसे मायके भेजने से मना कर दिया तो

उसकी सास उसे समझाते हुए बोली “बेटी को पूरा हक होता है अपने माता-पिता से मिलने का इसलिए अपनी मां से मिलने के लिए किसी की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है तुम्हारा जब मन करे मुझसे मिलने के लिए आ जाया कर।”     कविता ने घर का काम करते वक्त अपनी सास की यह बात सुन ली थी

उसने उसी वक्त मन ही मन निश्चय कर लिया था अपने पापा से मिलकर आने का  तब अपनी मम्मी की बात सुनकर उसकी ननंद अगले ही दिन उनसे मिलने आ गई थी।

   अगले दिन झटपट घर का सारा काम करने के बाद कविता सबको खाना खिला कर तैयार हो कर अपने घर चली गई थी घर पहुंचने पर उसके पापा उसे देखकर बहुत खुश हो गए उन्होंने  उसे अपने अंक से लगा लिया था उसके भैया भाभी और मम्मी भी उससे मिलकर बहुत खुश हुए

उसके पापा की तबीयत में अब काफी सुधार था जिससे उसके मन को बहुत संतोष हुआ खुशी खुशी कुछ समय उनके साथ बिता कर जब वह वापस अपने घर पहुंची तो उसे देखकर सास उससे गुस्सा हो गई थी तब सास की बात सुनकर वह ननद की तरफ देखते हुए बोली “बेटी को पूरा हक होता है

अपने माता-पिता से मिलने का इसके लिए उसको किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है यही बात अपने दीदी को समझाई थी ना बस मैंने भी उसी बात पर अमल किया और आगे भी करूंगी जितना हक आपकी बेटी का आप पर है उतना ही हक मुझे भी है अपने माता-पिता से मिलने का इस हक को मुझसे कोई नहीं छीन सकता

यदि आप प्यार से मुझे खुशी-खुशी तीज त्योहार पर और अपने पापा से मिलने भेज देती तो मैं आपसे पूछ कर ही जाती लेकिन आपने हर बार इनकार करके आपसे पूछने का हक खुद ही खो दिया बेटी को खुश रहने के सारे हक और बहू को खुश रहने का एक भी हक नहीं यदि आपकी बेटी की सास भी इनके साथ ऐसा ही करती तो आपको कैसा लगता?”

      कविता की बात सुनकर उसकी सास शर्मिंदा हो गई थी उसके मुख से कोई बोल ना निकल सका था चुपचाप बेटी के साथ वह अपने कमरे में चली गई थी और कविता उस दिन के बाद बिल्कुल बदल गई थी जब भी उसका मन करता वह अपने माता-पिता से मिलने अपने मायके चली जाती थी। इस रचना के माध्यम से मैं यही कहना चाहूंगी

कि इंसान जब तक डरता है लोग उसे बहुत दबाते हैं जब इंसान डरना छोड़ देता है तो लोग उसे दबाना भी छोड़ देते हैं इसलिए अपनी खुशी के लिए किसी से डरे नहीं बल्कि पूरे हक़ से अपनी खुशियां मनाएं ताकि बाद में मन में पश्चाताप  ना रहे की किसी के डर से हम यह खुशियां मनाने से वंचित हो गए।

बीना शर्मा 

#हक

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