विद्याजी ने अचानक दीवार घडी की ओर देखा सबेरे के 8.30 बज रहे थे उन्हें ड्राइंगरूम में बैठे हुए लगभग एकघंटा हो गया था रविवार का दिन था इसीलिए अभी तक कोई भी सोकर नहीं उठा था ना बेटा यश ना बहू रीना ना नन्हा चार वर्ष का पौत्र अर्णव। पांच वर्ष पूर्व विद्यादेवी गांव मे ही रहा करती थीं वहीं उनकी छोटी सी गृहस्थी थी उनके पति गांव के ही माध्यमिक विद्यालय मे संस्कृत के शिक्षक थे सेवानिवृत होने के 2 वर्ष पूर्व ही उनके पैतृक गांव मे ही उनका ट्रान्सफर हो गया था । वहां उनकी 5एकड़ जमीन थी
उसमे थोड़ी बहुत खेती कर लेते थे साथ ही सम्मान जनक पेंशन भी मिलती थी । पिता का देहांत हो गया था ।मां उनके साथ हीरहती थीं विद्याजी जबसे बेटे के साथ बैंगलोर गई थीं तब से गांव मे मां बेटा दोनो मिल कर घर चला रहे थे। विद्याजी की कैवल एक ही संतान थी
बेटा यश वर्धन पति पत्नी और दादी की जान बसती थी उसमें। विद्याजी केवल मैट्रिक पास थीं किन्तु शिक्षक पति और वे दोनो पढ़ाई का महत्व समझते थे इसलिए बेटे की शिक्षा से कोई समझौता नहीं किया पढ़ाई के लिए उसे घर से दूर होस्टल भी भैजना पड़ा तो दोनो ने उसे सहन किया यश भी अपने माता पिता की कसौटी पर खरा उतरा और बहुत अच्छे नंबरों से इंजिनियरिंग की परीक्षा पास करने केबाद एक प्रतिष्ठित मल्टी नेशनल कंपनी मे सम्मान जनक पैकेज पर बैंगलोर मे नौकरी भी पा गया अब तो माता पिता की खुशी का पारावार ना रहा।
अब तो विद्याजी की आंखों में यश के विवाह के सपने तैरने लगे बरसों से अपनी सहेली रागिनी की सर्व गुण संपन्न बेटी को बहू बनाने का सपना पाल रही थीं परन्तु उनका यह सपना साकार न हो सका क्योंकि यश ने वहीं कंपनी मे साथ काम करने वाली रीना को जीवन साथी के रूप मे चुन लिया था । यश के अनुरोध पर विद्याजी तथा उनके पति जब रीना से मिले तो उनकी सारी आशंकाएं दूर हो गईं । रीना तथा उसके परिवार के लोग बड़े अच्छे लोग धे कुछ दिनों के बाद बड़े धूमधाम से यश और रीना विवाह बंधन मे बंध गए।
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रीना बहू बनकर गांव आ गई। शीघ्र ही छुट्टियां समाप्त हो गईं और यश और रीना को काम पर बेंगलोर लौटना पड़ा। समय बीतता गया अर्णव का जन्म हुआ परन्तु रीना की मां ने सब संभाल लिया । अर्णव जब साल भर का हुआ तो रीना यश के सामने एक समस्या खड़ी हो गई रीना की मां को पारिवारिक दायित्व के कारण अपने शहर जाना पड़ा कुछ दिन तो रीना ने छुट्टी लेकर समय निकाला पर जब इससे भी समस्या का हल नहीं निकला तो दोनो को आशा की किरण विद्याजी मे दिखाई दी
यश उसी दिन पहली ट्रेन पकड़कर गांव जा पहुंचा और अपनी समस्या माता पिता के सामने रख दी । पिता तथा दादी ने यश की समस्या को आत्मसात कर विद्याजी को इस आश्वासन के साथ उसके साथ भेज दिया कि गांव मे उनकी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है अभी बच्चे को संभालना सबकी पहली। प्राथमिक ता है। और आज चार साल हो गए पूरा घर और अर्णव को विद्याजी ने ऐसा संभाला कि सारी समस्याएं तिरोहित हो गईं
वैसे तो यश ने हर काम के लिए काम करने वालों की व्यवस्था कर दी थी विद्याजी को कोई काम नहीं करना पड़ता था केवल देख रेख करना पड़ती थी। झाड़ू पोछा बर्तन कपड़े खाना सब कुछ काम व्यवस्थित रूप से हो जाता था। केवल एक काम उन्हें जिम्मेदारी से करना होता था
अर्णव को सुबह 8.30बजे सोसाइटी के गेट तक छोड़ना जहां उसकी स्कूल बस आती थी और दोपहर को लेने जाना और संध्या तक उसका ध्यान। रखना जब तक कि उसके मम्मी पापा ऑफिस से नहीं आ जाते।
सामने के कमरे में बैठे बैठे विद्याजी को बहुत समय हो गया था स्नान ध्यान पूजा पाठ से निवृत्त होकर ही वे यहां आई थीं चाय पहले ही बनाकर पी ली थी अब उन्होंने जाने का मन बना लिया था । उठ ही रही थीं कि तीनो अपने कमरे से आते दिखे रीना किचन मे चली गई अर्णव दौड़कर उनकी गोद मे चढ़ गया यश उनसे कहता हुआ सोफे पर बैठ गया मम्मी अभी कहां जा रही हैं रीना चाय ला रही है पीकर जाना और समाचार पत्र पढ़ने लगा। विद्याजी भी अर्णव का गीला मुंह पल्लू से पोछते हुए वापिस बैठ गईं।
अर्णव भी तबतक T.V.का रिमोट लेकर मनपसन्द कार्टून प्रोग्राम लगाने मे व्यस्त हो गया। अचानक जैसे कुछ याद आया हो यश रीना को आवाज देते हुए बोला अरे आज चाय पुराने कप में मत लाना उन नए ग्लास के मग मे लाना जो हम पिछले हफ्ते लाए हैं जरा संडे सेलिब्रेशन हो जाए। थोड़ी देर के बाद विद्याजी ने देखा तीन चमचमाते मग्स लिए रीना आ रही है एक मग उसने यश को पकड़ाया यश ने भी मुस्कराकर चाय का मग हाथ मे लिया और फिर समाचार पत्र में अपनी नज़रें गड़ा दीं
उसके बाद उसने अर्णव को नीचे कालीन पर बैठने का संकेत किया और दूध से भरा हुआ चमचमाता कप और एक प्लेट मे कुछ बिस्कुट और उसके सामने रख दिए उसके बाद विद्याजी के सामने चाय का कप रख दिया और खुद भी नया मग लेकर अर्णव के पास बैठकर चाय पीने लगी।
विद्याजी ने देखा उन्हें रीना ने उसी रोज के पुराने कप में ही चाय दी है कप की किनारी कुछ दरकी हुई थी उनके मन में कुछ दरक गया परन्तु उन्होने कुछ कहा नहीं चुपचाप चाय पी ली और अपने कमरे में आ गईं । अब तो पौधों में पानी डालने का भी उनका मन नहीं हो रहा था। चुपचाप बिस्तर पर लेट गईं। मन अनमना सा हो गया था। गांव की बहुत याद आ रही थी
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वहां कोई भाभी कहता कोई चाची कोई ताई सारा दिन कब निकल जाता पता ही नहीं चलता। यहां इस 3 BHK Flat में जैसे दिनभर अकेले अकेले मन घबराता रहता था। आस पड़ोस मे भी सब इसी प्रकार के नौकरी पेशा लोग रहते थे । विद्याजी के कोई हमउम्र न होने से आसपास के लोगों से उनके संबंध केवल दुआ सलाम तक ही थे वैसे भी उनकी जरा कम बोलने की आदत थी। चार साल से उनका गांव जाना नहीं हो पाया था कारण बहू बेटे को ऑफिस से छुट्टी मिलना मुश्किल थी और अब तो अर्णव भी स्कूल जाने लगा था।
विद्याजी के पति ही साल मे कुछ दिनों के लिए बैंगलोर आ जाते थे। इन्हीं बातों को सोचते हुए कब उनकी आंख लग गई पता ही नहीं चला ।लगभग 1बजे रीना जब खाना खाने बुलाने आई तब उनकी आंख खुली । खाने की टेबल पर भी यश ने टोक दिया मम्मी क्या तबियत ठीक नहीं है उन्होंने धीरे से कहा ठीक है जितना खाते बना उतना खाकर उठ गईं आज उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। समय काटे नहीं कट रहा था अपने कमरे मे एक पत्रिका पढ़ने मे मन लगाने का प्रयत्न कर रही थीं कि इतने मे अर्णव आया
और बाहर काॅरिडोर में उनके साथ बाॅल खेलने की जिद करने लगा। बच्चे का मन रखने के लिए वे उसके साथ खेलने लगीं एक निश्चित दूरी से अर्णव उनकी ओर बाॅल फेकता था दूसरी बार उन्हें फेकना पड़ता था जल्दी ही बच्चे का मन खेल से उकता गया और वह पास के ही फ्लैट मे रहने वाले अपने दोस्त मयंक के यहां चला गया। विद्याजी भी निश्चित होकर टी वी वाले कमरे में बैठ गईं जहां पहले से रीना टी वी देख रही थी ।अचानक विद्याजी को पैर मे तेज जलन महसूस हुई दोनो हाथों से उन्होने पांव को सहलाना शुरू कर दिया
कारण उन्हे समझ मे आ गया अर्णव के साथ जो हल्केगर्म खुरदरे। काॅरिडोर मे जल्दबाजी मे बिना स्लीपर पहने इतनी देर रहीं ये जलन उसी का नतीजा है। विद्याजी ने इधर उधर देखा यश कहीं दिखाई नहीं दिया रीना ने ही बताया403 नं वाले शर्माजी के यहां उन्होने किसी काम से बुलाया था तो गया है।
वे कुर्सी से पीठ टिकाकर बैठ गईं पर पैर की जलन उन्हे शांत नहीं बैठने दे रही थी । उनकी बैचेनी रीना ने भांप ली पूछा मम्मी क्या हुआ है विद्याजी को आखिर पैर मे जलन की बात रीना को बताना पड़ी उसने भी बोलना शुरू किया छत पर बिना चप्पल पहने सूखे कपड़े लेने धूप मे जाएंगी तो ऐसे ही जलन पड़ेगी पर आप मानती कब हैं
इतना कहकर वह किचन में चली गईजरा देर केबाद विद्याजी ने देखा वह एक परात लिए चली आ रही है वहां आने के बाद बड़े इतमिनान के साथ साथ उनकी कुर्सी केपास नीचै बैठ गई परातमें घुली हुई मेंहदी थी उनके बार बार मना करने के बाद द्दढ़ता से दोनों पैर पकड़कर परात मे रखे और बारी बारी से एक एक पैर में मेंहदी का लेप लगाने लगी
विद्याजी का विरोध निष्फल साबित हुआ धीरे धीरे मेंहदी की शीतलता पैरों के माध्यम से पूरे तन मन को आल्हादित करने लगी कनखियों से रीना के चेहरे कीओर देखा उसी समय शीतल बयार काएक झोंका खिड़की से आया रीना कीअलकों को सहला गया रीना अभी भी पूरी तन्मयता और गंभीर ता केसाथ उनके पैरों मे मेंहदी लगा रही थी
विद्याजी के मन से अचानक ये आवाज आई इतना स्वर्गिक सुख छोड़कर तू कहां टूटे कप में उलझी है। और क्या चाहिए ? उन्होंने प्यार से उसके सिर पर धीरे से हाथ रखकर कहा बस हो गया बेटा l उनका स्नेहपूर्ण स्पर्श रीना को अभीभूत कर गया |
मधुलता पारे
D217 Junior MIG.
Nehru Nagar
Bhopal, 462003