बिटिया की जात,,, मत कर ज्यादा बात,,,  – मंजू तिवारी

बिटिया की जात ,,,मत कर ज्यादा बात,,, यह कहावत संजू अपनी दादी से अक्सर सुनती रहती थी जब वह छोटी थी घर में उसके और भी चचेरी बहने थी तो सब भाई बहनों में झगड़ा होता तो हम बहने ज्यादा बोलते या किसी से मुंह जोरी करते,,,, हम बहनों का अपनी मां से झगड़ा हो जाता , या बहने ही आपस में झगड़ जाती तो संजू की दादी इस कहावत को कहती थी “बिटिया की जात… मत कर ज्यादा बात”.. ज्यादा बोलना ठीक नहीं,,,,,, इस घर में तो कोई बात नहीं ,,,,, ऐसे ही मुंह जोरी करोगी तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं है क्योंकि तुम्हें पराए घर जाना है। ऐसे ही सास ननंद को जवाब दोगी तो कैसे निभ पाओगी उस परिवार में,,,,

सब लोग एक जैसे नहीं होते हैं बेटी को तो दूसरे घर में निभाना पड़ता है।

संजू की दादी हमेशा अपने पोतोसे ज्यादा पोतियों को प्यार करती थी लाड प्यार में तनिक भी अंतर नहीं था पोते पोतियां एक ही स्कूल में पढ़ने जाते थे शिक्षा में भी कोई अंतर नहीं था,,,,, लेकिन संजू की दादी को हमेशा फ़िक्र अपनी पोतियों के दूसरे घर में निभने की लगी रहती क्योंकि अगर इस घर की तरह वहां इन बेटियों ने जवाब दिया तो इनकी शिकायतें आएंगी और परिवार में सामंजस्य नहीं बिठा पाएंगी इसलिए थोड़ा सा बर्दाश्त करना सीखो पोतियां भी कौन सी कम थी लाड प्यार तोअच्छे से मिलता था इसलिए मुखर होकर बोलती कभी भी झुकने के लिए तैयार नहीं होती,, अपनी पोतियों को हिदायतें भी देती नाराज होने जाने पर उन्हें मनाती,,, लाड प्यार दुलार करती,,, यहां पर यह समझाने का प्रयास कर रही हूं। बेटा बेटी की परवरिश में लाड प्यार में संजू की दादी कहीं भी दोहरे मापदंड नहीं रखती थी

दादी का तो बस यह सब कहने का एक मतलब था कि मेरी पोतिया कभी भी परेशान ना हो जिस तरह से ससुराल के मर्यादा के मापदंड बनाए गए हैं ।चुप रहना सभी को बर्दाश्त करना उसमें फिट बैठ जाएं,,, कहीं इनके साथ कुछ गलत ना हो इनकी ससुराल से शिकायतें ना आए की मां ने क्या सिखाया है।,,,,,

“पूरब में जाओगी धुआं देकर मार दिया जाएगा”,,,, परिवार का नाम डुवो दोगी,,, इसलिए बिटिया की मर्यादा में रहो,,,,

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यह बात तब संजू के समझ में नहीं आती है कि यह क्या कहना चाहती हैं। शायद उन्हें अपनी पोतियों के लिए डर था कि कहीं यह ज्यादा मुखर हो गई अपने लिए आवाज उठाने लगी तो इन के ससुराल वाले  बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे वह इस बात को भलीभांति जानती थी उन्हें लगता था ससुराल वाले इन्हें मार ना डाले इसलिए दबाने का प्रयत्न करती थी बिटिया को दबकर रहना चाहिए

निश्चित रूप से कहीं ना कहीं कुछ बेटियों के साथ गलत हुआ होगा या मारा जाता होगा तब यह कहावत प्रकाश में आई कहावतें इस तरह से नहीं बनती है।,,,, सारी बात का निचोड़ होती है।,,,

संजू की दादी को पूर्व दिशा से इतना डर लग गया था कि वह अक्सर संजू की मां से कहती हैं अगर संजू के पापा मेरी संजू को अगर पूरब दिशा मे शादी करें तो इस से अच्छा है कि संजू को लेकर कुएं में गिर जाना लेकिन शादी मत करना क्योंकि पूरब की रीत रिवाज बहुत खराब है बेटियां घुट के मर जाती हैं।

उनके रीति रिवाज बड़े ही कठोर हैं बहू के लिए इन रीति रिवाज में मेरी संजू नहीं रह सकती क्योंकि संजू के परिवार में लड़कियों की शादी पूर्व दिशा में होती है। बहू पश्चिम दिशा से ही ली जाती है। यह रिवाज चला आ रहा था लेकिन संजू की दादी खुश नहीं थी वहां के लोगों के व्यवहार से इसलिए वह नहीं चाहती थी कि उनकी संजू को पूरव में किया जाए,,,,,,,,

संजू और उसकी सभी चचेरी बहनों से अक्सर कहती तुम लोग इतना बोलती हो,, झगड़ती हो हमने तुम्हारी बुआ को सुई के छेद में से निकाल दिया उन्हें इतना दबा कर रखा तब कहीं जाकर पूरब के लोगों में निभ पाई है।  कभी कोई शिकायत नहीं आई,,,, तुम लोगों के तो रोज उलहने आया करेंगे,,,, या तुम्हें मार दिया जाएगा,,,, इसलिए बिटिया की जात को ज्यादा नहीं बोलना चाहिए मर्यादा में बोलो सहन करना सीखो,,,,

इन कहावतों को बचपन से ही सुनते आ रहे थे इसलिए सभी बहने इनको अपनी गांठ में बांधकर अपनी अपनी ससुराल पहुंच गई,,,, बताई हुई मर्यादा के कारण कभी भी जवाब नहीं दिया,,,, इसका गलत अर्थ लगा लिया गया कुछ भी बोलते रहो कभी जवाब नहीं देती तो वह कुछ भी बोलते रहते,,,,,, संजू के संयुक्त परिवार की सारी बहने उच्च शिक्षित है लाड प्यार में पली है कहीं भेदभाव नहीं हुआ क्या वह अपनी ससुराल में तर्कपूर्ण जवाब नहीं दे पाएंगी जवाब ना देने का कारण बस सिर्फ इतना सा है कि उनकी दादी की सिकाई हुई मर्यादा,,,,,,, वे सारी बहनें मर्यादा तोड़ना नहीं चाहती हैं। और परिवार वाले समझते हैं कि उनके मुंह में जबान नहीं है।,,,,,

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क्योंकि बचपन से ही परिवार में बेटियों को सिखाया गया है बिटिया की जात,,,, मत कर ज्यादा बात,,,

इस लेख के माध्यम से मैं बताना चाहती हूं चाहे समय आज का हो चाहे समय पुराना हूं कहावतें पुरानी जरूर है लेकिन अभी भी चित्रार्थ हैं यह बहुत बड़ी  विडंबना है। शहरी क्षेत्रों में थोड़ा बहुत सुधार जरूर लगता है महिलाओं की जिंदगी में

लेकिन जैसे ही ग्राम ग्रामीण अंचल में जाते हैं वहां पर उन महिलाओं की स्थिति बड़ी दयनीय है। मर्यादाओं के नाम पर,,, पिंजरे में बंद पंछी बना दिया है जैसे तोता वही बोलो जो  सब बोलते हैं। अपनी क्या सोच है उससे कोई सरोकार नहीं। पढ़ी लिखी बहू तो चाहिए लेकिन दिमाग ना लगाएं यह कैसे संभव है।

 

घर की चारदीवारी में कैद हो जाओ किसी पड़ोस वाले से बात करो चाहे वह महिला ही क्यों ना हो एक हाथ लंबा घूंघट होना चाहिए,,,, इन ससुराल वालों को गर्मी से कोई फर्क नहीं पड़ता इसे कायदे का नाम देते हैं।,,

 

छत पर भी अगर जाओ तो घूंघट होना चाहिए

बहू अपनी सास से बात भी नहीं कर सकती अगर कुछ कह दे तो उसका प्रचार हो जाता है।

अपना बेटा चाहे रोज अपमान करता हो मारता हो उसको छुपा लिया जाता है।

बहू पर जब सांस ननंद  मर्यादाओं के बंधन बांधती है। तो उसे अच्छे लगते हैं। फिर वही बंधन जब बेटी पर बांधे जाते हैं फिर छटपटाहट क्यों,,,,?

अपना घर संभालो अपने पिता के परिवार को सदा के लिए छोड़ दो जैसे कोई खरीदी हुई चीज अपनी हो जाती है अगर ना चले उस पर तो खराब है वहू,,,

धीरे बोलो बाहर तक आवाज ना जाए नहीं तो गली में निकलने वाले लोग क्या कहेंगे बहू बड़ी जोर से बोलती है। बोलने में मर्यादा,,, चाहे खुद की आवाज कितनी ही तेज क्यों ना हो,,,,

और अगर छत पर सोना तो जल्दी उठ कर आ जाना नहीं तो कोई कहेगा बहु बहुत देर तक सोती है।

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और कुछ जगह तो हालत यह है कि साड़ी के ऊपर चद्दर ओढो,,, चाहे उसका पति ही क्यों मर गया हो लोगों की नजर उसकी चद्दर पर होती है कि उसमें चद्दर ओढ़ रखी है नहीं ओढ़ रखी,,,,,,

बहू की चाल बड़ी जल्दी-जल्दी की है चलने में भी मर्यादा

हंसने की मर्यादा बोलने की मर्यादा चलने की मर्यादा सोने की मर्यादा घर से बाहर ना निकलने की मर्यादा किसी से बात ना करने की मर्यादा किसी को पलट कर जवाब ना देने की मर्यादा चाहे गलत हो सही हो चुप ही रहना,, अपनी पढ़ाई लिखाई को भूल जाओ उसका कोई मूल्य नहीं है  इन सब मर्यादाओं को ओढना एक स्त्री की मजबूरी बन जाती है। क्योंकि उसे इसी समाज में रहना है सामंजस्य बिठाना है।

महिलाएं बड़े गर्व से कहती हैं मैंने तो अपनी बहू को इतनी छूट दे रखी है।

समाज की बहुत थोड़ी सी महिलाओं का तबका अभी कुछ आजाद हुआ है इन बंधनों की मर्यादाओं से,,,

ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी महिलाएं पराधीन ही है इसलिए उन्हें छूट दी जाती है नहीं तो महिलाओं के लिए छूट शब्द कहां से आया,,,,

अब इन मर्यादाओं से घुटन होने लगी है। हमें कैद पक्षी मत बनाओ मर्यादाओं के नाम पर,,, उतनी ही आजादी चाहिए जो आपने अपने बेटे को दे रखी है,,, बहू को भी वही आजादी दो जो तुम अपनी बेटी के लिए चाहते है।,,,

बेटी को भी उतनी ही आजादी दो जितनी आपने अपने बेटे को दी है। बंघनो की मर्यादा सिर्फ बेटी पर ही क्यों,,

 इन मर्यादाओं के बंधनों से मुक्ति एक मां एक सास बखूबी देने में सक्षम है। प्यार के बंधनों से बांधे  मर्यादाओं के घुटन भरे बंधनों को तोड़ दे ऐसी मैं महिलाओं से आशा करती हूं। इन मर्यादाओं के बंधन से मुक्ति एक महिला ही दूसरी महिला को कर सकती है। एक पहल करें इन  मर्यादाओं के बंधनों को तोड़े

#मर्यादा

मंजू तिवारी गुड़गांव

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