बीमार होने का बहाना… – रश्मि झा मिश्रा : Moral Stories in Hindi

“तुम्हारा तो रोज का हो गया है… कभी कमर दर्द… कभी पेट… कभी हाथ… आज कुछ नहीं मिला तो घुटना लेकर बैठ गई… अब मुझे तो और कोई काम बचा नहीं लगता है…

 अच्छा बताओ… कितना दवा ही खाओगी…

 मां… तुम ही से बोल रहा हूं… कुछ तो बोलो…!”

 मां गिरिजा देवी कुछ नहीं बोलीं… चुपचाप दूसरी करवट ले घूम गईं…

 राकेश झल्लाता हुआ घर से निकल गया… पीछे से सौम्या पानी की बोतल लिए भागती गई…तब तक राकेश गाड़ी स्टार्ट कर चुका था…

” क्या हुआ… इतने गुस्से में क्यों हो… बोतल भी घर छोड़ आए…?” 

“कुछ नहीं…!”

” बोलो भी…!”

” अरे… मां का देखती नहीं हो…!”

” अच्छा तुम जाओ ना… मैं देख लूंगी…!”

 पर सौम्या के ही पास समय कहां था… देखने को…

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 दस मिनट बाद वह भी भागती हुई तैयार होकर निकल गई…

 गिरिजा देवी अपना घुटना पकड़े… दरवाजा बंद कर आईं…

” इस व्यस्त जिंदगी में किसे फुर्सत है… मेरे साथ समय बिताए… मेरा हाल-चाल जाने…!” अपने आप से बोलते हुए… गिरिजा देवी फिर जाकर अपने बिस्तर पर लेट गईं…

 शाम को दोनों वापस आए तो मां अनमनी सी ही थी…

” क्या हुआ मां… कैसा है तुम्हारा घुटना…!”

” ठीक हो गया…!”

” वाह… इस बार बिना दवा के कैसे ठीक हो गया…!”

 पर गिरिजा जी इससे आगे कुछ नहीं बोलीं… 

इस वाकये के बाद उन्होंने बेटे बहू से अपने बारे में कुछ भी कहना बंद कर दिया…

 कोई पूछता कैसी तबीयत है… तो ठीक हूं… बोलकर चुप हो जाती थी…

 इसी तरह समय गुजर रहा था… मौसम में ठंडापन आ गया था…

 गर्म कपड़ों की जरूरत बच्चों बूढ़ों को पहले ही हो जाती है… पर मां ने कुछ नहीं कहा…

 सुबह बिना चादर लिए टहलने निकल गई… दो-चार दिन ऐसा करते आखिर सर्दी ने आक्रमण कर दिया…

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 राकेश सौम्या दोनों तैयार थे जाने को… पर मां की छींक और खांसी तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी…

 राकेश ने पूछा “क्या हुआ मां दवा ला दूं… या कहो तो डॉक्टर से दिखा लाऊं…!”

 गिरिजा देवी ने सिरे से मना कर दिया…” मैं ठीक हूं… तुम अपना काम देखो…!”

 पर दोनों जान रहे थे मां गुस्से में है… उस दिन की बात पकड़े है… इसलिए ऐसा कह रही है…

 आखिर सौम्या ने घर में ही रुकने का फैसला किया… राकेश का जाना ज्यादा जरूरी था…

 शाम होते-होते मां को बुखार ने धर दबोचा…

 सौम्या को दो दिनों की छुट्टी लेनी पड़ी.… तीसरे दिन राकेश घर में रुका…

 चौथे दिन मां ठीक थी… बुखार भी कल से नहीं आया था…

 दोनों चाहते थे कि अब ड्यूटी ना छोड़ें…

 राकेश ने मां से पूछा… तो मां बोली… “मैंने रुकने कहा है किसी से… जाओ तुम लोग… अपना काम करो… मैं ऐसे ही ठीक हो जाऊंगी…!”

 पर राकेश फिर भी रुक गया…

 मां के पैरों पर हाथ फेरता… उन्हें दबाते हुए प्यार से बोला…” मां अब तो तुम बिल्कुल ठीक हो गई हो… चार दिन से सेवा करवा रही हो… अब आगे क्या इरादा है…!”

” मैं क्या जानबूझकर सेवा करवा रही हूं …

हां… हां… कभी-कभी सेवा करवाने के लिए बीमार होने का दिखावा भी करना पड़ता है…

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 मैं दिखावा ही कर रही हूं…!”

 “अरे मां रुठती क्यों हो… मैंने तो यूं ही कह दिया…!”

” रूठती नहीं हूं बेटा… तुम लोगों से अपना दुख दर्द ना कहूं तो किसे कहूं.… …तुम ही बताओ…

 मैं क्या जानबूझकर रोग बुला लेती हूं…!”

” ऐसा किसने कहा… बोलो ना जो बोलना है… तुम्हें बोलने से किसने मना किया है…

 यही अगर चादर के लिए बोल दी होती… तो ऐसे बीमार तो नहीं पड़ती…!”

” बीमार नहीं पड़ती… तो छुट्टी लेकर तुम दोनों सेवा भी तो नहीं करते…!”

 “मां सचमुच तुम बच्ची हो गई हो…!”

 बोलकर राकेश ने अपनी बाहें मां के गले में डाल दी… और चेहरा मां के चेहरे से मिला हंस पड़ा…

रश्मि झा मिश्रा 

#कभी-कभी सेवा करवाने के लिए बीमार होने का दिखावा भी करना पड़ता है.…

VM

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