आज सुबहसुबह ही भाभी का फोन आया कि जरूरी बात करनी है, जल्दी आ जाओ और फोन काट दिया. मैं ने चाय का प्याला मेज पर रख दिया और अखबार एक ओर रख कर सोचने लगा कि कोई बात जरूर है, जो भाभी ने एक ही बात कह कर फोन काट दिया. लगता है, भाभी परेशान हैं…
“अरे! चाय फिर ठंडी हो गयी.. कहाँ खोए हो राजेश???”
“ कोई ना… पी लेता हूँ,इतनी भी ठंडी नहीं हुई है..”
“नहीं .. मैं दूसरी बना कर लाती हूँ!”चाय का कप हाथ से लेती हुई रेवा ने कहा ।
….
“ये लो चाय , साथ में आलू के पराठें भी.. काम में इतने व्यस्त हो जाते हो… और क्या सोच रहे हो… देख रही हूँ किसी से फ़ोन पर बात करने के बाद तुम कुछ खोए-खोए से हो ।”
“ हाँ इलाहाबाद से भाभी का फ़ोन आया था कि.. जल्दी आओ कुछ बात करनी है ।और फ़ोन काट दिया ।”
काफी दिनों से मैं महसूस कर रहा हूं कि भाभी परेशान हैं. लगता है, बेटे-बहुओं के साथ कुछ खटपट चल रही है. जब से भैया गए हैं, वे अकेली हो गई हैं… अपने मन की बात किस से करें?’’
‘‘क्यों, बेटे-बहुएं उन के अपने नहीं हैं? मंजरी उन की अपनी नहीं है? क्यों नहीं बांट सकतीं वे अपनी परेशानियों को अपने बच्चों के साथ?’’ रेवा ने कहा।
‘‘अरे, मंजरी तो अब दूसरे घर की हो गई है।रह गए सौमित्र और राघव, वे दोनों अपने व्यापार और गृहस्थी में मशगूल हैं।तीनों बच्चों में कोई ऐसा नहीं, जिस से भाभी अपने मन की बात कह सकें।”
हो सकता है… मैं कुछ उनकी मदद कर पाऊँ..क्योकि मुझे वे अपना मानती हैं, सौमित्र और राघव के साथ वे मुझे अपना तीसरा बेटा मानती हैं।वे बेटों से अकसर कहा करती थीं कि नालायको, तुम बुढ़ापे में हमारे सुखदुख में काम नहीं आओगे । राजेश मेरा तीसरा बेटा है, उस के होते मुझे तुम्हारी सहायता की जरूरत नहीं।” कह कर मैं चुप हो गया.
रेवा बोली, ‘‘ठीक है, अगर आप कुछ कर सकते हैं तो जरूर करिए… मैं समझती हूं कि उन्हें कोई आर्थिक परेशानी तो नहीं होनी चाहिए. भैया काफी रुपया, बड़ी कोठी, जायदाद छोड़ कर गए हैं।हमारे पास तो उन से आधा भी नहीं।वही पारंपरिक सास-बहू या बेटों की समस्या होगी, मुझे तो इस के अलावा कुछ नजर नहीं आता।”
तुम आज ही चले जाओ, पता नहीं भाभी किस मुसीबत में हैं.’’
मैं ने कहा, ‘‘हां रेवा , यदि मैं ने उन की आज्ञा नहीं मानी तो मैं स्वयं को क्षमा नहीं कर पाऊंगा।”
‘‘इतने बड़े भक्त हो भाभी के?’’
‘‘हां, रेवा! मेरे लिए वे भाभी ही नहीं, मेरी मां भी हैं, उन का मुझ पर बहुत कर्ज है, बस यों समझ ले, भाभी न होतीं तो मैं आज जो हूं वह न होता, एक आवारा होता और फिर तुम जैसी इतनी सुंदर, इतनी कुशल पत्नी मुझे भाभी के द्वारा ही तो मिली है।”
यदि वो बेटे-बहुओं से वे प्रसन्न नहीं तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? क्या भाभी को यहां ले आऊं? यहां ले आया तो क्या रेवा निभा पाएगी उन से? रेवा को निभाना चाहिए, उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया है, मुझ जैसे आवारा को एक सफल आदमी बनाया है।इसी उधेड़-बुन में वह अतीत में खोने लगा…
उसे वो घटना याद आने लगी ..जब वह बी.एससी. फाइनल में था। उसकी बुद्धि प्रखर थी, परीक्षा में सदा फर्स्ट आता था, पर कुछ साथियों की सोहबत में पड़ कर वह सिगरेट पीने लगा था।पैसों की कमी कभी भाभी ने होने नहीं दी. एक दिन…
‘‘भाभी…ओ भाभी.’’
‘‘क्या बात है?’’
‘‘जल्दी से एक सौ का नोट निकालो, जल्दी करो, नहीं तो भैया आ जाएंगे।”
‘‘डरता है भैया से?’’
‘‘हां, उन से डर लगता है।”
‘‘और मुझ से नहीं?’’ कह कर वे मुसकराईं।
‘‘अरे, तुम से क्या डरना? भाभी मां से भी कोई डरता है भला ??”कह कर उनका एक चुंबन ले लिया।
वे मुसकरा कर गुस्सा दिखाती हुई बोलीं, ‘‘हट बेशर्म कहीं का… बचपना नहीं गया अब तक।”
‘‘मेरा बचपना चला गया तो तुम बूढ़ी न हो जाओगी, फिर कौन बेटा मां को चूमता है, अच्छा है, यों ही बच्चा बना रहूं तुम्हारा… और तुम भी तो मुझे अपना बड़ा बेटा मानती हो ।”
उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया और मेरे सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘‘चल हट, ले 100 रुपए का नोट।”
एक दिन भाभी ने आवाज लगाई, ‘‘ राजेश मशीन लगा रही हूं कपड़े हों तो दे दो।”
मैं ने अपनी कमीज, पैंट, बनियान उन्हें दे दिए।जब वे कपड़े मशीन में डालती थीं तो पैंट, कमीजों की जेबें देख लिया करती थीं।वे मेरी कमीज की जेब में हाथ डालते हुए बड़बड़ाईं, ‘यह भी नहीं होता इस से कि अपनी जेबें देख लिया करे, देख यह क्या है?’
जेब में सिगरेट का पैकेट था. उसे देख कर वे वहीं माथा पकड़ कर बैठ गईं, राजेश और सिगरेट। वे चिल्लाईं..
“ राजेश..l”
‘‘हां, भाभी?’’
‘‘यह क्या है?’’ मुझे पैकेट दिखाते हुए वे लगभग चीखीं।
‘‘यह, यह…’’ और मैं चुप।
‘‘बोलता क्यों नहीं, क्या है यह?’’ कह कर मेरे मुंह पर एक जोर का तमाचा मारा और फिर फफकफफक कर रो पड़ीं।
काफी देर बाद वे चुप हुईं, अपने आंसू पोंछते हुए कुछ सोचती सी मुझ से बोलीं, ‘‘राजेश! सॉरी! मैं ने तुम्हें थप्पड़ मारा… अब कभी नहीं मारूंगी. मारने का मेरा हक खत्म हुआ।”
थोड़ी देर मौन रह कर वे पुन: बोलीं, ‘‘अपने भैया से मत कहना, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं,’’ उन्होंने हाथ जोड़ते हुए मेरी ओर कातर नजरों से देखा।
मैं काठ की मूर्ति बना खड़ा रहा। बहुत कुछ बोलना चाहता था, पर मुंह से शब्द नहीं फूटे अपनी सफाई में… मैं कुछ कह भी नहीं सकता था, क्योंकि वह सब झूठ होता, मैं ने सिगरेट पीनी शुरू कर दी थी।बस, इतना ही कह पाया था…” सॉरी!भाभी मां।”
भाभी ने मुझ से बोलचाल बंद कर दी। दिन में २-३ बार ही वे मुझे आवाज लगाती थीं…” राजेश !नाश्ता तैयार है, राजेश!खाना तैयार है, या राजेश! कपड़े हों तो दे दो।”
भाभी मेरे कमरे में आतीं और मेरी मेज पर 100 रुपए का नोट रखते हुए कहतीं, ‘‘और जरूरत हो तो बोल देना।”
एक दिन मैं ने कहा, ‘‘जब आप मुझ से कोई संबंध ही नहीं रखना चाहतीं तो रुपए क्यों देती हैं?’’
‘‘इसलिए कि एक ऐब के साथ तुम दूसरे ऐब के शिकार न हो जाओ, चोरी न करने लगो।सिगरेट की तलब बुझाने के लिए तुम्हें पैसों की जरूरत पड़ेगी, पैसे न मिलने पर तुम चोरी करने लगोगे और मैं नहीं चाहती कि तुम चोर भी बन जाओ।”
‘‘आप की बला से, मैं चोर बनूं या डाकू।”
इस पर वे बोलीं, ‘‘सिर्फ इंसानियत के नाते मैं नहीं चाहती कि कोई भी नवयुवक किसी ऐब का शिकार हो कर अपनी प्रतिभा को कुंठित करे, तुम मेरे लिए एक इंसान से अधिक कुछ नहीं,’’ कह कर वे चली गईं।
मैं काफी परेशान रहने लगा ।
फिर सिगरेट न पीने का संकल्प कर लिया।भाभी का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जा रहा था. वे पीली पड़ती जा रही थीं, हर समय उदास रहती थीं, जैसे उन के भीतर एक झंझावात चल रहा हो।भैया ने भी कई बार कहा था कि सुमित्रा, क्या तबीयत खराब है? वे हंस कर टाल जाती थीं।
एक दिन वे मेरे कमरे में आईं. मेज पर 100 का नोट रखते हुए बोलीं, ‘‘और चाहिए तो बोल देना।”
जैसे ही वे बाहर जाने को हुईं, मैं ने उन का हाथ पकड़ा और कहा…”
भाभी।”
उन्होंने झटके से हाथ खींच लिया, बोलीं, ‘‘मत कहो मुझे भाभी, उसे मरे तो काफी दिन हो गए।”
‘‘माफ नहीं करोगी?’’
‘‘माफ तो अपनों को किया जाता है, गैरों को कैसी माफी? मैं कोई जज हूं, जो अपराधी की अपील को सुन कर उसे माफ कर दूं?’’
‘‘क्या सौमित्र के साथ भी ऐसा ही बरताव करतीं?’’
‘‘अरे, उसकी तुम्हारे भैया की शिकायत करती या उसके कान पकड़ कर घर से बाहर निकल देती ।”
‘‘फिर मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं किया??”
‘‘तुम मेरे पेट के जाए जो नहीं हो।”
‘‘ठीक, यही मैं सुनना चाहता था, मैं तुम्हारा दिखावे का बेटा था, मतलब सगे और पराए में अंतर आह तुमने बता ही दिया।”
मैं ने भूल की जो आप को अपना समझा।ठीक है, अब मेरा आप का वास्तव में कोई रिश्ता नहीं, अब के बाद आप मेरी सूरत नहीं देखेंगी… गुड बाय,’’ कह कर मैं किताब के पन्ने पलटपलट कर पढ़ने का बहाना करने लगा।
मैं आत्मग्लानि के भंवर में फंसा था, अपराध तो मुझ से हुआ था, इतना बड़ा विश्वासघात? मेरी आंखों से आंसू टपकने लगे, मैं ने निर्णय किया कि मैं घर छोड़ कर चला जाऊंगा,
जब मांबाप ही नहीं रहे तो भैयाभाभी पर कैसा अधिकार?
अगले दिन भैया दफ्तर चले गए तो मैं ने अपनी पुस्तकें, कुछ कपड़े अटैची में रखे और घर छोड़ कर निकल जाने को तैयार हुआ।भाभी ने देख लिया था कि मैं अटैची लगा रहा हूं।वे कमरे में आईं, ‘‘यह क्या हो रहा है? कहीं जाने की तैयारी है?’’
‘‘हां, आप का घर छोड़ कर जा रहा हूं।”
‘‘घर आप का भी है, मेरा ही नहीं।इस के आधे के मालिक हैं आप, आप घर छोड़ कर क्यों जाएंगे, घर छोड़ कर तो मुझे जाना चाहिए, क्योंकि असली कसूरवार तो मैं हूं। तुम्हारे भैया सदैव कहते कि… पैसे देकर तुम बच्चों को बिगाड दोगी ।”
आप के भैया के लाख मना करने पर भी मैं ने आप को ऐबी बना दिया है… आप के पतन की दोषी मैं ही हूं…आप कहीं नहीं जाएंगे, जाना ही होगा तो मैं जाऊंगी।”
‘‘किस अधिकार से आप मुझे रोक रही हैं?’’ मैं ने पूछा।
‘‘अधिकार की बात मत कीजिए, मैं नहीं जानती कि अधिकार किसे कहते हैं, बस आप कहीं नहीं जाएंगे, कह दिया सो कह दिया, कोई मेरी बात टाले, मुझे बरदाश्त नहीं।”
‘‘सौमित्र और राघव की हुक्मउदूली तो आप बरदाश्त कर लेंगी,’’ सुनते ही उन्होंने मेरे मुंह पर तड़ातड़ चांटे बरसाने शुरू कर दिए. बदहवास सी सौमित्र… राघव… सौमित्र… राघव…चीखे जा रही थीं और मेरे मुंह पर थप्पड़ पर थप्पड़ मारे जा रही थीं।मैं हाथ पीछे बांधे मूर्तिवत खड़ा थप्पड़ खाता रहा और फिर मैं ने उन की कोली भर ली और उन के मुंह को दोनों हथेलियों के बीच ले कर उन से आंखें मिलाते हुए कहा, ‘‘मां, मुझे माफ कर दे, मैं ने तो कभी की सिगरेट पीनी छोड़ दी है।देखो, ये रहे सारे रुपए,’’ और मैं ने अपने बेड के नीचे रखे सौ-सौ के नोटों की ओर इशारा किया।फिर फफकफफक कर रो पड़ा।
उन्होंने मुझे कस कर अपनी छाती से लगा लिया।कुछ देर वे यों ही खड़ी रहीं, फिर साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोंछते हुए बोलीं, ‘‘ठीक है, मैं एक बार फिर विश्वास कर लेती हूं,’’ कह कर वे जाने लगीं।
मैंने उन का हाथ पकड़ कर उन्हें रोका और बोला, ‘‘भाभी मां, मैं वादा करता हूं कि अब कोई गलती नहीं करूंगा।”
‘‘ठीक है, ठीक है,’’ कह कर वे चली गईं।
‘‘और यह उसी का फल है रेवा!कि मैं आज इस रूप में तुम्हारे सामने हूं।”
कोठी के गेट में घुसते ही देखा कि भाभी सामने ही लौन में कुरसी पर बैठी हैं.
मुझे देखते ही वे खिल उठीं, ‘‘आ गए राजेश!”
‘‘हां भाभी,’’ कहते हुए मैं ने उन्हें प्रणाम किया।
‘‘अकेले ही चले आए हो, रेवा को भी ले आते.’’
मैं ने कहा, ‘‘उसे कुछ जरूरी काम था।
मैं जल्दी में चला आया इसलिए कि ऐसी क्या बात है, जो आप ने बुलाया है और कारण भी नहीं बताया. सब ठीक तो है?’’
‘‘हां, यहां सब ठीकठाक है, कोई खास बात नहीं है.’’
‘‘बात तो कुछ जरूर है भाभी, वरना आप इतनी जल्दी फोन छोड़ने वाली कहां थीं? बताइए क्या बात है?’’
‘‘अरे दम तो ले, चायपानी पी, फिर बैठ कर आराम से बातें करेंगे,’’ कह कर भाभी ने नौकर को आवाज लगाई, ‘‘अरे रामू.’’
रामू भागता हुआ आया और बोला, ‘‘कहिए बीबीजी.’’
‘‘जा, 2 कप चाय बना ला.’’
चाय पीतेपीते कुछ देर बाद मैं ने पूछा, ‘‘कैसी हो भाभी?’’
‘‘यों तो सब ठीकठाक है राजेश ।”
पर यहां अब मन नहीं लगता, मुझे अपने साथ दिल्ली ले चल।”
‘‘इस में क्या मुझे किसी की आज्ञा लेनी होगी? जब चाहिए चलिए,’’ मैं ने कहा.
‘‘हां आज्ञा लेनी होगी, रेवा की,’’
वे बोलीं.
‘‘कैसी बात करती हो भाभी, आप को साथ ले चलने के लिए रेवा की आज्ञा? नहीं भाभी नहीं, अपने इस बेटे पर तुम्हारा कितना अधिकार है, यह भी मुझे ही बताना पड़ेगा? पर बताओ तो सही कि बात क्या है? सौमित्र, राघव, दोनों बहुएं क्या नाराज चल रहे हैं? किसी ने कुछ कहा है आप से?’’
‘‘मुझे कुछ कहने की हिम्मत कौन करेगा? नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, बस मन नहीं लगता. अब मेरा दम घुटता है यहां,’’ कह कर वे कुछ उदास सी हो गईं.
‘‘भाभी, साफसाफ बताओ न? कुछ बात तो जरूर है.’’
‘‘समझो तो बहुत कुछ है, न समझो तो कुछ भी नहीं. बस यों समझ ले, बहूबेटों के रंगढंग मुझे अच्छे नहीं लगते. मुझे लगता है कि ये बहुएं तुम्हारे भैया की इज्जत खाक में मिलाने पर तुली हुई हैं. इन की चालढाल, इन का रंगढंग, इन का लाइफस्टाइल मुझे बिलकुल पसंद नहीं.’’
मुझे इस के अतिरिक्त कोई और कारण नहीं दिखाई दे रहा था, भाभी की परेशानी का. मैं पहले ही जानता था, हो न हो वही सासबहू का, मांबेटे का पारंपरिक तनाव है.
थोड़ी देर बाद भाभी फिर बोलीं, ‘‘राजेश!अब सहन नहीं होती मुझ से बहुओं की यह चालढाल… सौमित्र और राघव तो जोरू के पक्के गुलाम बन गए हैं… दब्बू कहीं के, उन के ही रंग में रंग गए हैं, जन्म से जवानी तक चढ़ा हुआ मां का रंग इतना कच्चा पड़ गया कि बहुओं के आते ही उतर गया? अरे, मैं तो इन से बड़े खानदान की थी, पढ़ीलिखी भी इन से कम नहीं हूं, इन से हर बात में आगे हूं. चलो और कुछ न सही, इन की सास तो हूं, यह सब कुछ मेरा ही तो है, फिर भी…’’ कह कर भाभी चुप हो गईं.
मैं ने कहा, ‘‘भाभी, मैं समझ तो रहा हूं, पर यह भी जानता हूं …भाभी कि तुम प्रसन्न नहीं हो, परेशान हो, पर क्या तुम सुख खोजने का अपना दृष्टिकोण नहीं बदल सकतीं?’’
‘‘मतलब?’’
‘‘मतलब यह भाभी कि सुख तो हमारे चारों ओर बिखरा पड़ा है, उसे बीनने और संजो कर रखने का ढंग बदल दो तो तुम्हारी झोली में सुख ही सुख होगा. स्पष्ट कहूं, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी रुचि बेटेबहुओं के दोष ढूंढ़ने तक ही सीमित हो गई हो, अच्छाई देखने की इच्छा ही नहीं हो?’’
‘‘अरे, तू तो मुझे उपदेश ही देने बैठ गया,’’ इतना ही कह पाई थीं कि मैं बोल उठा, ‘‘देखो भाभी, अपने मन की बात सदा ही साफसाफ करता रहा हूं, आज भी मैं तुम से उसी रूप में अपने मन की बात कह रहा हूं. जरूरी तो नहीं कि मेरे मन में आई हर बात सही हो, मैं गलत भी हो सकता हूं, बिना किसी लागलपेट के मैं ने अपने मन की बात आप से कह दी, आप प्लीज अन्यथा न लें.’’
इस पर वे बोलीं, ‘‘तू बता राजेश! बहुएं जींस पहन कर बाहर निकलें, यह गलत नहीं तो और क्या है?’’
मैं ने कहा, ‘‘बड़े भैया की बड़ी बेटी एम.ए.कर रही है, कालेज जींस पहन कर जाती है या नहीं?’’
‘‘जाती तो है, पर वह तो बेटी है.’’
‘‘बस, यही तो गड़बड़ है भाभी, बहुएं क्या तुम्हारी बेटियां नहीं?’’
‘‘जो कुछ भी हो, पर बेटीबहू में अंतर तो रहता ही है, बहुएं बड़ेबूढ़ों का इतना भी लिहाज न करें कि उन्हें देख कर तिनके की ओट जितना परदा कर लें?’’
‘‘और बेटी भले ही नौजवान लड़कों के साथ बेलिहाज घूमती फिरे?’’ मैं ने कहा, ‘‘यह तो भाभी एक “जनरेशन गैप “ है, न जाने कब से जारी है, इस का अंत नहीं है ।
भाभी को मेरी बात शायद कुछ समझ आने लगी थी… पर उनका #भाभी माँ से सासू माँ बनने वाला दिल इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
अगली प्रात: मैं भाभी को ले कर दिल्ली आ गया, बेटे-बहुओं ने बहुत विनती की कि मां मत जाओ, पर मैं उन्हें यह कह कर ले आया कि मेरा अपना घर भी उन का अपना ही घर है।
लेखिका : संध्या सिन्हा