भाभी – संध्या सिन्हा : Moral Stories in Hindi

कपड़े फैलाते-फैलाते ही  अवनी ने समय का अनुमान लगाया। सूरज सिर के ऊपर आ गया है, बारह तो बज ही रहे होंगे। रविवार का दिन बस कहने भर को छुट्टी का दिन होता है. उस दिन तो उसकी  व्यस्तता और भी बढ़ जाती है।

जल्दी से नहा कर अवनी रसोई की तरफ़ लपकी, तभी  सास   सरिता की नज़र उस पर पड़ गई।अवनी को सुनाकर तेज़ आवाज़ में वे बोलीं, “लो, महारानी

के पूरे तीन घंटे का  शाही स्नान समाप्त हुआ. न जाने कौन-से उबटन मले जा रहे थे कि …इन्हें  समय का होश ही नहीं रहता।”

            पति अजय भी अपनी माँ की बातों में आ जाते और… अवनी को ही बुरा-भला कहते।भूल जाते कि… संडे है छुट्टी है.. जरा देर से उठना… रात को मनुहार करते हुवे कहा था ।

हड़बड़ी  में दाल में नमक तेज़ हो जाने पर सरिता  जी ने इतना हंगामा किया और बड़बड़ाते हुवे बोली-“हमारी तो क़िस्मत ही खोटी है। बहू मिली तो वह भी किसी ढंग की नहीं,  तब भी बेटा पल्लू से बंधा रहता है…दामाद मिला तो वह भी वैसा ही है…हमेशा अपनी मां के पल्लू से ही बंधा रहता है।” माँ की बात सुन कर अजय इतना क्रोधित हो गया कि अवनी को ग़ुस्से के मारे इतने ज़ोर से धक्का दिया कि वह सीधे दीवार से जा टकराई और उसके सिर पर गहरी चोट लग गई।

 अपने सिर के ऊपर उसे किसी के हाथों का कोमल स्पर्श महसूस हुआ. उसकी नज़र सामने बैठी अपनी छोटी ननद अर्पिता पर गई। “आप कब आई दीदी???”

अर्पिता ने धीरे-धीरे उसका सिर दबाते कहा-“ कल से तुम अस्पताल में हो #भाभी ।

”क्या???”

बरबस मिली सहानुभूति से अवनी की आंखें भर आईं।

अर्पिता ने ही चुप्पी तोड़ी, “एक बात पूछूं भाभी? पहले जब मेरी शादी नहीं हुई थी तो बिना सोचे-समझे, मैं भी आपको जाने क्या-क्या बोल दिया करती थी।पर अब सोचती हूं, इतना सब कुछ आप कैसे सहन कर लेती हैं? क्या आपको कभी ग़ुस्सा होकर घर छोड़ने का मन नहीं होता?”

“ख़ुशी-ख़ुशी कोई नहीं चाहता इस तरह की तिरस्कृत ज़िंदगी जीना।सच कहूं तो कभी-कभी मेरा मन भी ख़ुशियों की तलाश में भटकने लगता है।दिल चाहता है सब कुछ छोड़ ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करूं, पर क्या इतना आसान है सब कुछ? विरले को ही ज़िंदगी ऐसे अवसर देती है, वरना ज़िन्दगी तो हर क़दम पर ख़ुद ही एक चुनौती है।कहीं न कहीं तो इस चुनौती को स्वीकारना ही पड़ता है।

तुम्हारे भैया क्रोधी स्वभाव के हैं।परेशानियां उन्हें कभी-कभी उदं्दड और निर्मम भी बना देती हैं।फिर भी जब इस तरह का क्रोधी, दबंग, उद्दंड और स़िर्फ अपना ही वर्चस्व स्थापित करनेवाला व्यक्ति पति के रूप में मिल जाए, तो उसका एकमात्र उपाय उसे छोड़कर भाग जाना या अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करना नहीं होता है।मेरे हिसाब से ऐसी परिस्थिति में जीवन की इस चुनौती को स्वीकार करना और परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालने की कोशिश करना  ही सही रास्ता है। वैसे भी पुरुष होते ही अहंवादी हैं।

उनके दिल में स्वयं की अवधारणा इतनी व्यापक होती है कि पत्नी का स्वयं उसमें समा ही जाता है।जहां तक तुम्हारे भैया का सवाल है, उनका विवेक भले ही कुछ समय के लिए खो जाता है, पर उनके अंदर की इंसानियत अभी ज़िंदा है।उन्हें अपने किए का एहसास रहता है।मेरे साथ दुर्व्यवहार करने के बाद कई दिनों तक तो मुझसे नज़रें नहीं मिला पाते हैं।मेरे बीमार पड़ने पर मेरी देखभाल भी करते हैं।उनके क्रोध को मैं समझती हूँ… ऑफिस और घर के ख़र्चों से वो परेशान हो जाते है। मुझे पूर्ण विश्‍वास है कि उन्हें जल्द ही अपनी ग़लतियों का एहसास दिला सही रास्ते पर ले आऊंगी।बस, ईश्‍वर से यही प्रार्थना है कि मेरे मन की दृढ़ता कायम रहे।

यह ज़रूरी नहीं कि हर जगह पति ही दोषी हो। आज का यह सबसे बड़ा सत्य है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती नारियों का स्वाभिमान, अभिमान के हद को पार कर रहा है। यही अभिमान छिन्न-भिन्न कर रहा है उसकी सहनशीलता को। छोटी-छोटी बातों को सम्मान का विषय बनाकर घर टूटने लगा है।इस टूटते परिवार की सारी त्रासदी बच्चों को झेलनी पड़ रही है। सच पूछो तो औरत बरगद की वो छांव है, जहां बच्चे ही नहीं, घर के बुज़ुर्ग भी चैन और सुकून की सांस लेते हैं। इसलिए ही शायद प्रकृति ने नारी को इतना सहिष्णु और दिलो-दिमाग़ से अत्यधिक कोमल बनाया है, ताकि रिश्तों की भावना को दिल से महसूस कर वह उसे टूटने से बचा सके।विपरीत परिस्थितियों में नारी अपने अंदर छुपी अदम्य साहस और सहनशीलता से अपने घर का तिनका-तिनका जोड़ उसे बिखरने से बचा लेती है।

कौन नहीं चाहता कि उसे सुंदर, समझदार और प्यार करनेवाला जीवनसाथी मिले, लेकिन जीवन में सब कुछ वही नहीं मिलता जैसा कि हम चाहते हैं।अगर अनचाहा मिले तो उसे अपने अनुरूप ढालने की कोशिश करना ही समझदारी है, न कि सब कुछ छोड़कर भाग जाने में।कहां-कहां और किन-किन कठिनाइयों से हम भागते रहेंगे?

कुछ हफ्तों बाद….

अर्पिता अपने पति अमर के साथ अवनी को देखने घर आई और सीधे उसके कमरे में गयी और गले मिलते हुवे बोली-“ भाभी… आपको किन शब्दों में धन्यवाद दूं।आपने मेरा घर टूटने से बचा लिया। आप नहीं होतीं तो ज़िंदगी में न जाने मैं कितने कष्ट झेलती, इसका मुझे ख़ुद भी अंदाज़ा नहीं।”

खाने की टेबल पर अर्पित अपनी मां से बोली, “मां… आज से आप मेरी कोई चिंता नहीं करेंगी.।मैं अपना घर अपने हिसाब से चलाऊंगी. अगर आपको किसी की चिंता करनी है तो भाभी की कीजिए। तभी इस घर में भी सच्ची शांति आएगी। अगर आप लोगों का निष्ठुर व्यवहार सहते-सहते कहीं भाभी टूट गई तो यह घर पूरी तरह उजड़ जाएगा।

मेरी सास से तो आप आशा रखती हैं कि वह आपकी बेटी को अपनी बेटी समझें,आपकी बेटी के अधिकार को समझें, तो फिर इन्हीं सब बातों से आप भाभी को क्यूं वंचित रखती हैं?

भैया से भी मैं यही चाहूंगी कि जितनी नसीहतें आप अमर को देते हैं, वे सारी की सारी नसीहतें ख़ुद आपको भी याद रखनी चाहिए।भाभी की सहनशीलता को आप लोग उनकी कमज़ोरी मत समझिए।रिश्तों को बचाने की ज़िम्मेदारी स़िर्फ उन्हीं पर नहीं है।पत्नी एक बंधन मात्र नहीं होती, वो तो ईश्‍वर, समाज, कुटुंब और माता-पिता के आशीर्वाद से पति और परिवार को जोड़ कर रखनेवाली सेतु है, जिसके मानसिक रूप से टूटते ही सब कुछ टूटकर बिखर जाता है।”

थोड़ी देर के लिए खाने के टेबल पर नि:शब्द शांति छा गई, मानो सभी के अंदर विचारों का मंथन चल रहा हो।

लेखिका : संध्या सिन्हा

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