भाभी, आप अपना वक्त भूल गईं क्या?? – सविता गोयल 

 ” बेटा, देख ले तेरी बीवी को…. कितनी जुबान चलाती है मेरे सामने। ,, मोहित के घर में घुसते ही उसकी मां संयुक्ता जी रोनी सूरत बनाकर मोहित से बोलीं।

सास की बात सुनकर मोहित की पत्नी मिताली भी चुप नहीं रह सकी और बोल पड़ी ,। ” हां हां…. इन्हें सिर्फ मेरा बोलना नजर आता है, खुद जो सारा दिन मेरे पीछे पड़ी रहती हैं वो नहीं दिखता ….  ।,,

घर में घुसते ही रोज की तरह सास बहू की चिक चिक सुनकर मोहित भी खीझ गया

“क्या माँ….. हर रोज की वही चिक चिक….. मैं तंग आ गया हूँ आप दोनों से……. ।  अब आपकी सुनूं या इसकी….. आपको अब इस उम्र में और क्या चाहिए… दो वक्त की रोटी चैन से खाओ और भगवान का नाम लो… ” मोहित के मुंह से आज झुंझलाहट में ये शब्द निकल ही गए।

मोहित तो ये बोलकर अपने कमरे में चला गया लेकिन बेटे के मुंह से निकले ये शब्द संयुक्ता जी के कलेजे में तीर की भांति चुभ रहे थे…. ।

संयुक्ता जी शुरू से ही जुबान और स्वभाव दोनों में ही तेज थीं । हमेशा अपने तरीके से घर को और घर के सदस्यों को चलाने की कोशिश करती रहती थीं….. लेकिन अब शायद बहू भी उनकी इस आदत से परेशान होकर मुंह पर जवाब देने में हिचकती नहीं थी… बस यही बात उनसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी….. बेटा मोहित भी उनकी इस आदत से भली भाँति परिचित था इसलिए हमेशा उनका पक्ष नहीं लेता था….।




बेटे की बात संयुक्ता जी के जेहन में गूंज रही थी ।

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“इस उम्र में आपको और क्या चाहिए !! …. मतलब क्या अब मुझे दो वक्त की रोटी के अलावा कुछ नहीं चाहिए…..!!!!! कुछ बोलने का या कुछ पाने का मुझे अब कोई हक नहीं है????  … आज यदि मोहित के पिताजी होते तो मुझे शायद ये सब ना सुनना पड़ता… । ,,

विचारों की उथलपुथल में आज उन्हें वो दो वक्त की रोटी भी नहीं भा रही थी…   कुछ दिनों बाद हीं उनकी ननद मधु का आना हो गया।  जिस ननद को देख कर वो पहले हमेशा मुंह बनाती थीं आज उसी ननद को देखकर उनकी आंखें नम हो गई ।  आज बड़ी आत्मीयता से संयुक्ता जी अपनी ननद से मिलीं और अपना दुखड़ा  सुनाने लगी ,

देखो ना जीजी ……., मोहित कितना बदल गया है….। मुझसे कहता है कि बस दो वक्त की रोटी खाओ और भगवान का नाम लो….. क्या इसी दिन के लिए उसे पाल पोस कर बड़ा किया था????,,

”  अच्छा भाभी … !!  वैसे बोल तो वो ठीक हीं रहा है । इस उम्र में इंसान को चैन से दो वक्त की रोटी मिल जाए तो बहुत है । ,, मधु जी ने कहा।




संयुक्ता जी अचंभित सी उनका मुंह ताकने लगी  ” ये आप क्या बोल रही हैं जीजी ?  आप भी बहू बेटे का पक्ष ले रही हैं  । आखिर आपके घर में भी तो बेटा बहू हैं । यदि वो आपको ऐसा बोलेंगे तो क्या आपको अच्छा लगेगा ??  ,,

” क्यूँ भाभी .. भूल गई.. जब पिता जी के गुजरने के बाद मां ने एक  बार सहेलियों के साथ तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए कहा था… उस वक्त तुमने कितना बखेड़ा खड़ा किया था…. घर का माहौल ठीक करने के लिए मैंने भी मां को जाने से मना कर दिया था…. । छोटी-  छोटी जरूरतों के लिए भी मां भईया और तुमसे  बोलते हुए झिझकती थी। अपनी हर इच्छाओं और जरूरतों को उन्होंने दब लिया था.. ।  किस तरह चुपचाप बिस्तर पर पड़ी रहती थीं।

मेरी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि मैं मां को अपने साथ ले जाकर उनकी देखभाल कर दूं। बस लाचार सी उनकी बेबसी देखती रहती थी।    सिर्फ दो वक्त की रोटी ही रह गई थी उनके नसीब में…. वो भी तुमने कभी बिना एहसास जताए नहीं डाली । उस वक्त तो तुम भी बहुत खुश हुई थी कि चलो  घर पर मेरा एकाधिकार हो गया…. । तो अब अपनी बहू को क्यों दोष दे रही हो !! ,,

 

ननद का दिखाया हुआ आईना देखकर संयुक्ता जी शर्मिंदगी से अपनी नजरें चुरा रही थीं..। 

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” भाभी , हम जैसा बोते हैं वैसा ही काटते हैं। भाभी , वक्त लौटकर आता है लेकिन उस वक्त हम अपने कर्म नहीं बदल सकते । आज आपको बेटे की एक बात ने अंदर तक दुखी कर दिया जरा सोचिए उस वक्त मां पर क्या बीतती होगी। ,,

संयुक्त जी आत्मग्लानि से भर उठी थीं। उन्हें अब अपने किए का पक्षतावा हो रहा था लेकिन उन्हें माफ करने वाली उनकी सास तो कब की इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं।

दोस्तों, जब हम खुद किसी को कड़वी यादें देते हैं तो खुद को भी उस अनुभव के लिए तैयार रखना चाहिए.. क्योंकि पता नहीं कब हमारे कर्म वापस लौटकर हमारे पास आ जाएं।

सविता गोयल 

 

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