बेटियां – उमा वर्मा

मै कुमुद  सफर कर रही हूँ, अमेरिका के लिए ।वहां मेरी मंझली बिटिया  रहती है ।जहाज अब कुछ ही घंटों में पहुंचने वाली है ।ओह! इतना लम्बा सफर ।कोई उपाय भी तो नहीं है ।जीवन जीने का बस यही एक तरीका बच गया है मेरे लिए ।पिछले यादों का पन्ना खुल गया है ।सत्रह तस्वीर छांटने के बाद मेरे ससुराल वालों ने मुझे पसंद किया था ।

एक अच्छे  घर की, आठ भाई बहन के बीच की थी मै ।ससुराल में परिवार छोटा था ।मेरे पति चंद्र दो भाई, एक बड़ी बहन,माता पिता बस ।दुल्हन बनकर आई तो सबने मुँह दिखाई की रस्म में वाह वाही की।फिर दहेज में मिले सामान को टटोला गया ।बड़े बुजुर्गों ने कुछ बर्तन पैर से ठोकर मार कर “” हल्का मिला है “” की बधाई

दी ।सारे कड़वाहट को सहेजती रही  मै।चन्द्र बहुत अच्छे पति थे।शान्त ,गम्भीर, हंसमुख ।जरा बोलते कम थे।कहते “” भगवान् ने एक मुँह, दो कान दिए हैं “” तो कम बोलने और ज्यादा  सुनने के लिए ।पति इंजीनियर थे।जगह जगह उनकी बदली होती और मै भी उनके साथ सफर करती ।

दो साल बाद ही खुशियाँ आने लगी थी ।मै माँ बनने वाली थी ।सासूमा प्यार तो करती थी पर जरा हटके।हाँ ससुर जी थोड़ा कड़क थे।सारे परिवार उनसे डरते थे ।हर बात में कायदे कानून की बात करते ।समय पर मै अपने ससुराल आ गई ।और मेरी प्यारी सी बेटी का जन्म हुआ ।

परिवार में खुशी की लहर थी।मायके और ससुराल से बधाइयाँ मिलने लगी ।चन्द्र मेरी हर खुशी का खयाल रखते थे ।जीवन में बहुत सारी सुख सुविधा के बीच पति का तबादला होता और हम नये घर की तलाश  करते ।चन्द्र सिनेमा और घूमने फिरने के शौकीन थे ।बहरहाल मेरा जीवन मस्ती में गुजर  रहा था ।दो साल बाद फिर पता चला मै फिर माँ बनने वाली हूँ ।अम्मा जी बहुत खुश हो गई ।इस बार तो बेटा होना चाहिये ।लेकिन भाग्य पर किसी की नहीं  चलती।


दूसरी बार फिर बेटी आ गई ।अम्मा जी का चेहरा उतर गया ।”” बेटा होना चाहिए था “”। वे इसका दोषी  बहू को मानती थी ।उन्हे कौन समझाता कि “” अम्मा जी, बेटी और  बेटा होना तो पुरूषों के तरफ से होता है ।इसमें औरत का कोई हाथ नहीं होता ।”” थोड़े बुझे मन से घर वालों ने छठी  की रस्म पूरी कर दी ।चन्द्र तो  हमेशा खुश रहने वालों में थे।सबसे मिल जुल कर रहते ।ननिहाल और ददिहाल से अच्छे रिश्ते बना कर रखते ।अम्मा जी भी ठीक ही थी बस उन्हे  पोता न होने का मलाल था ।मेरी दोनों बेटी बहुत सुन्दर और तेज थी।

नौकरी के सिलसिले में पूरा भारत का भ्रमण होने लगा ।और दो साल बीते।फिर मेरी तीसरी बेटी का आगमन हो गया ।अब अम्मा जी ने बहुत सारा दोष मढ़ दिया मुझ पर ।””” खानदान कैसे चलेगा, यह तो खाली बेटियां  पैदा कर रही है “” चन्दर सिर्फ मुसकुराते, कहते— देखना अम्मा, मेरी यह बेटियां ही मेरा नाम रोशन करेगी ।””” बेटे से बढ़कर होगी यह ।वैसे तो चन्द्र बहुत अच्छे पति थे।लेकिन कुछ मामलों में अलग थे।उन्हे भी बेटे की चाह होने लगी थी ।

ऐसा मुझे लगता ।लेकिन इनसान के हाथ में कुछ नहीं रहता ।यह बात किसी को समझाया नहीं जा सकता ।जिन्दगी अच्छे से गुजर रही थी ।चन्द्र अपने माता-पिता का भी  बहुत खयाल रखते ।अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्हे भेजते रहते ।कुछ बातों का निर्णय वे खुद लेना पसंद करते थे ।कहते “” अच्छा खाओ,अच्छा पहनो पर परिवार के लेन-देन का फैसला खुद करते ।तीन साल के बाद सबके उम्मीदों पर पानी फेर कर मेरी चौथी बेटी का जन्म हुआ ।

मेरा बस चलता तो मेरे दो ही बच्चे रहते ।लेकिन इस मामले में उनका ही फैसला था ।चन्द्र को छोड़ कर सभी के चेहरे पर मातम की लकीरें खिंच गयी ।ये समझाते “” देखना अम्मा, मेरी चारों बेटी ही मेरा नाम रोशन करेगी ।मै इनको खूब आगे, अच्छी शिक्षा पूरी करने में मदद करूँगा ।

“” जिन्दगी की गाड़ी आगे बढ़ने लगी ।चारों बेटियां बहुत सुन्दर, बहुत कुशाग्र, बहुत तेज थी पढ़ने में ।चन्द्र ने भी पिता का भरपूर प्यार दिया ।अच्छे अच्छे नंबरो से पास होती  वे आगे बढ़ने लगी ।मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था ।पति मेरा साथ देने में आगे थे।जीवन में बहुत सारी सुख सुविधा मिलती रही ।चन्द्र अपने कार्य क्षेत्र में बहुत इमानदार और अच्छे थे ।पर खुशियाँ बहुत कहाँ टिकती है ।मेरी खुशी को भी किसी की नजर लग गई ।उस दिन उनका जन्म दिन था ।बोले इस बार खूब अच्छे  से मनायेंगें।सुबह नौ बजे आफिस के लिए तैयार होने लगे।

मैंने उन्हें नयी शर्ट दी पहनने को ।पहन कर खुश हो गये ।अपनी फाइलें समेटी और कहा “” चार बजे आऊंगा, मिठाई और केक लेकर, तुम सब तैयार रहना ।”” उन्हे खुश मन से विदा किया ।शाम को आने में देर होने लगी ।वे नहीं आए तो सब को चिंता हुई ।


घर में विचार विमर्श चल ही रहा था कि एक आदमी सायकिल से आकर कह गया “”” यहाँ के साहब को किसी ने  गोली मार दिया है, आप लोग जल्दी चलिए””” फिर घर अस्त व्यस्त हो गया ।सब लोग दौड़ कर अस्पताल पहुँचे ।उनकी हालत गंभीर थी ।

मालूम हुआ किसी की गलत काम को रोकने की यह सजा मिली थी ।हम ने इन बातों को दरकिनार किया और दौड़ भाग करते रहे ।डाक्टर उन्हे  बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे ।छः गोलियां  लगी थी जो सीने के पार हो गई थी ।वे बार-बार दुहराते “”” मै बच तो जाउँगा न डाक्टर, मुझे मरना नहीं चाहिए ।मेरी चार चार बेटियां है, पत्नी है  कौन उनका खयाल रखेगा “”” उनकी सांसें धीमी हो रही थी ।फिर भी चेहरे पर वही मीठी मुस्कान थी।

“”””” मुझे बचा लो कुमुद, मै अभी मरना नहीं चाहता “””। उनहोंने चाय और सिगरेट पीने की इच्छा जाहिर की ।डाक्टर ने मना कर दिया ।पूरे शरीर पर मशीनें लगा दिया गया ।लेकिन उनकी आँखे बंद होती और खुलती ।डाक्टर ने मुझे इशारा किया “”” सामने बैठिए””” मैं सामने बैठ गयी।उनहोंने टूटे फूटे शब्दों में कहा “”””” मै तो अब बचुगां नहीं, तुम बच्चों की परवरिश अच्छे से करोगी ऐसा मेरा विश्वास है ।”””” वे धीमे से मुस्काए ।और उनकी आँखे बंद हो गई ।वे चले गये ।हम सब को छोड़ कर ।वह भयावह काली रात मेरे जीवन में अंधेरा छा गया ।कैसे जीवन चलेगा ? कैसे बच्चों की पढ़ाई होगी? कुछ सूझ नहीं रहा था ।रो रो कर हम सब एक दम चुप हो गये ।

घर में मातम छा गया ।ससुराल वालों ने किनारा कर लिया ।फिर मेरे मायके वालों के सहयोग से मेरी नौकरी लग गई ।उन्ही के आफिस में ।सभी लोग बहुत आदर सम्मान देते ।मैंने अपने आंसू पोछ लिए ।अब इन बच्चों के लिए जीना है ।फिर जीवन रुपी नौका में सवार होकर हम पाँच प्राणी आगे बढ़ने लगे।बेटे के जाने के गम में छः महीने के भीतर अम्मा जी भी चली गयी ।बच्चे पढ़ाई में तेज थे।चन्द्र के शब्द मुझे याद आते “””” देखना अम्मा मेरी चारों बेटी ही मेरा नाम रोशन करेगी, मेरी बेटियां मेरा गुमान है अम्मा, मेरी बेटियां आफिसर्स बनेगी

 “””” भगवान् ने इनकी प्रार्थना सुन ली।समय पाकर वे अच्छे अच्छे पद पर आसीन हो गई ।जीवन की गाड़ी  ठीक चलने लगी ।उनकी भी शादी हो गई ।बच्चे हो गये ।दो बेटी अमेरिका में है, दो भारत में ।चारों मुझे बहुत सम्मान देती हैं ।मै भी सब के पास घूमती रहती ।जीवन में जो चाहिए, मुझे मिला।पर वह भयावह काली रात, जिसने चन्द्र को मुझसे छीन लिया वह कैसे भूलूँ? मेरे जीवन का एक अध्याय तो उनके साथ चला गया ।

अमेरिका पहुंचने की सूचना दी गई ।मै भी वर्तमान में लौट आई ।जीवन का क्या  भरोसा, खुश रहो मस्त रहो।मेरी बेटियों ने यही सिखाया है मुझे ।_____उमावरमा, रांची, सिंहमोड़ ।यह कहानी सच्चाई पर है, मेरे अपने की।मेरे मन को तकलीफ पहुंचाने वाली ।जिसे मैंने आप सभी से साझा किया है ।

#बेटी_हमारा_स्वाभिमान

2 thoughts on “बेटियां – उमा वर्मा”

  1. कलयुग है। ईमानदार इंसान की नियति इस युग में अच्छी कदाचित नहीं होती। एक ईमानदार अधिकारी सभी वरिष्ठ व कनिष्ठ साथियों की आंखों का कांटा बन जाता है। उसे हटाने के लिए निरंतर षड्यंत्र होते रहते हैं।
    अच्छी कहानी…

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