मम्मी जी..! आंचल की सासू मां का फोन आया था… वह आंचल की गोद भराई की रस्म है, हमें बुलाया है…. नायरा ने अपनी सास गायत्री जी से कहा…
गायत्री जी: अच्छा… पर समधन जी ने मुझे फोन ना करके तुम्हें क्यों किया…?
नायरा: वह कर रही थी कि आपका फोन नहीं लग रहा था.. इसलिए…
गायत्री जी: हां बस… सब पता है मुझे… वह मुझसे बात ही करना नहीं चाहती… वरना यह बहाना नहीं बनाती… चलो मान लिया मेरा फोन नहीं लगा… पर जब वह तुम से बात कर रही थी तब भी मुझे फोन देने को बोल सकती थी… पर नहीं… दरअसल में सब समझती हूं… वह सोच रही है होगी कि उनके ऐसा करने से मैं बुरा मान जाऊंगी और अपनी बेटी की गोद भराई में नहीं जाऊंगी… पर मैं जाऊंगी…
नायरा: मम्मी जी..! आप क्यों हमेशा आंचल के ससुराल वालों की बातों का गलत मतलब निकालती है… और आंचल की गलत बातों को सही साबित करने में लगी रहती है..?
गायत्री जी: तुम चुप रहो नायरा… आंचल तुम्हारी तरह बिन मां की बेटी नहीं है… वह मेरी बेटी है.. मेरा गुरूर है वह… और कोई भी आकर उसके खिलाफ कुछ कहे और मैं उसे सच मान लूं… हरगिज नहीं… उसपर आज तक मैंने कोई पाबंदी, रोकटो क्या बंदिशे
नहीं लगाई… वह अपने मन की करने के लिए पहले भी आजाद थी और आज भी है… जब उसके माता-पिता ने कभी उस पर कोई चीज जबरदस्ती नहीं थोपी… फिर उसके ससुराल वाले ऐसा करने की कैसे सोचते हैं..? वह तो उसकी हालत अभी ऐसी नहीं है कि वह कहीं यात्रा कर सके… वरना उसे मैं यहां ले आती डिलीवरी के लिए..
पता नहीं वह लोग उसका सही से ख्याल रखते भी है या नहीं..? नायरा और कुछ नहीं कहती… फिर दो दिनों बाद सभी आंचल की गोद भराई में पहुंच जाते हैं… घर को काफी अच्छी तरीके से सजाया गया था… आंचल भी बिल्कुल दुल्हन की तरह सजी-धजी चमक रही थी….
अपनी मां को देखकर वह मारे खुशी के दौड़ पड़ी, जिस पर उसकी सास अंजना जी ने उसे कहा… अरे आंचल जरा धीरे… तुम्हें हर कदम अब संभल कर रखना चाहिए… अंजना जी का इतना कहना हुआ नहीं कि आंचल बोल पड़ी… बस कीजिए मम्मी जी… मैं कोई बच्ची नहीं… अपना ध्यान मैं रख सकती हूं… आपको कितनी बार कहा है यह बात-बात पर मुझे टोका मत कीजिए… मुझे बिल्कुल पसंद नहीं…
नायरा: आंचल वह तुम्हारे भले के लिए ही कह रही है… जरूरी नहीं हर बात का गलत ही मतलब निकालो.. तुम अब अकेली नहीं तुम्हारा बच्चा भी है इसका ध्यान तुम्हें ही रखना है..
गायत्री जी: और तुम कौन होती हो मेरी बेटी को यह सब कहने वाली..? यह उसका घरेलू मामला है वह खुद सुलझा लेगी.. उसमें इतना समझ तो है… तुम्हें ज्यादा ज्ञान बांटने की जरूरत नहीं…
आंचल: अब भाभी या रस्म में आई हो तो उसमें अपना ध्यान वही लगाओ… ज्यादा पंचायत करने की जरूरत नहीं…
आंचल के इस बात का नायरा को बहुत बुरा लगा और वह बाहर चली गई और सोचने लगी यह मां बेटी कितने बदतमीज है.. जब से आंचल की शादी हुई है वह अपने ससुराल में बड़े क्लेश करती है… वह किसी की परवाह नहीं करती… जब मन किया
सो गई जब मन किया उठ गई… जहां मन किया चली गई बिना किसी को कुछ बताएं… कोई कुछ कहता तो झगड़ने लगती…. जब यह बात अंजना जी ने गायत्री जी को बताया तो उल्टा अपनी बेटी को डांटने की जगह वह और उसे शह देते हुए
उसके ससुराल वालों के खिलाफ ही बोलने लगी… आंचल के ससुराल वाले बड़े ही सीधे-साधे लोग थे… इसलिए उन लोगों ने उनसे बहस करना छोड़ स्थिति में ढल गए.. पर इससे इन मां बेटी की हिम्मत और बढ़ गई… और दिनों दिन आंचल की बदतमीजी बढ़ती गई…
यह सारी बात नायरा को बहुत बुरी लगती थी… पर उसे भी गायत्री जी अनाथ कह कर चुप कर देती थी.. उसका पति ऋषि अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था… जो कभी-कभी नायरा उसे यह सब कहती, तो वह कहता… तुम औरतों के मामले में मुझे मत घसीटो… मैं दिन भर बाहर के टेंशन में रहता हूं.. घर आकर चैन से सोना चाहता हूं, तो नायरा अब उसे भी कुछ नहीं कह पाती थी..
खैर गोद भराई से लौटते ही गायत्री जी ने कहा… मैं अपनी बेटी को कार से यहां ले आऊंगी… उसकी डिलीवरी यही करवाऊंगी… उन लोगों पर मुझे बिल्कुल भी भरोसा नहीं… अगले दिन गायत्री जी ने वही किया जो उन्होंने कहा.. आंचल के ससुराल वालों ने लाख कहां पर मां बेटी नहीं मानी… आंचल अपने मायके में आ गई और ससुराल वाले का फोन भी नहीं उठाती.. एक दिन सुबह कोरियर से कुछ कागजात आए… जिसमें उसके तलाक के कागजात है…
नायरा: लो आंचल… इन पर अपने साइन कर दो…
आंचल: क्या है यह भाभी..?
नायरा: मैं तुम्हारी नौकर नहीं हूं… खुद पढ़ लो…
गायत्री जी: यह कैसे बात कर रही हो तुम आंचल से..?
नायरा: हां तो जो ननद अपना ससुराल छोड़ हमेशा के लिए अपने मायके में बसने आ जाए उसके साथ और कैसा सुलुक करना चाहिए मम्मी जी….
आंचल: भाभी… मैं यहां हमेशा बसने नहीं आई… अपनी डिलीवरी तक ही रहने आई हूं…
नायरा हंसते हुए: जरा अपने हाथ में पकड़ा लिफाफा खोलकर पढ़ तो लो, फिर यह बात कहना और मम्मी जी अब को आगे इसके खर्च भी आप उठाना…. भई इनकी तनख्वाह तो अब इतनी है नहीं… जो इतने लोगों का खर्च उठा सके…
आंचल जल्दी में जब लिफाफा खोलती है उसके होश ही उड़ जाते हैं… वह तलाक के कागजात थे… जो उसके पति मनीष ने भिजवाए थे… तलाक देखकर ही आंचल शांत होकर सोफे पर बैठ जाती है और रोने लगती है…
नायरा: रो क्यों रही हो आंचल..? यह तो होना ही था… तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि अब से तुम्हें किसी की बात सुननी नहीं पड़ेगी… पर एक बात मेरी भी सुन लो… यहा मैं ज्यादा दिनो तुम तक तुम्हारी सेवा नहीं करूंगी… मेरे पति पहले से ही तुम्हारी शादी में हुए खर्च के कर्ज में डूबे हैं… ऊपर से दो लोग और आ गए… तो हम सड़क पर आ जाएंगे… डिलीवरी के बाद तुम भी कोई काम ढूंढ लेना…
गायत्री जी: नायरा तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आई ऐसी बात बोलने में..? ऋषि क्या सिर्फ तुम्हारा पति है..? वह इसका भैया भी है… आने दो उसे आज… फिर बताती हूं क्या कहा तुमने आंचल को..?
शाम को जैसे ही ऋषि घर आता है… वह आंचल को देखकर कहता है… कैसी हो आंचल..? तुरंत गायत्री जी ने कहा… आज तू सबके सामने बता क्या तेरी बहन तेरे पर बोझ हो जाएगी जो वह यहां रहेगी..?
ऋषि: यह सब क्या बोल रही है आप मां..? भला ऐसा कहने की वजह..?
गायत्री जी: तेरी पत्नी कहती है कि वह आंचल को और उसके बच्चे की जिम्मेदारी तुझ पर नहीं आने देगी, क्योंकि तुझ पर पहले ही बहुत कर्ज है… इसलिए डिलीवरी के बाद आंचल कहीं काम ढूंढ ले…
ऋषि: क्या..? पर डिलीवरी के बाद आंचल तो अपने ससुराल ही चली जाएगी फिर नायरा ऐसा क्यों कह रही है..?
नायरा: मम्मी जी पूरी बात तो बताइए अपने बेटे को… छोड़िए मैं ही बता देती हूं… वह दरअसल आंचल और मनीष का तलाक हो रहा है… अब से आंचल यही रहेगी…
ऋषि: क्या तलाक..? यह सब क्या हो रहा है इस घर में..? आंचल तू बता… क्या हो गया..? तुम दोनों में तो कितना प्यार था… मनीष तो हमेशा तेरी हां में हां मिलाता था… फिर आज यह सब..?
गायत्री जी: बेटा तेरी बहन की गलती नहीं है… उसके ससुराल वाले को लगता है कि तलाक के कागजात भेज कर वह हमें डरा देंगे और आंचल उनकी गुलामी करने लगेगी… पर तू भी उन्हें बता देना कि उसका भैया अभी है उसके लिए….
ऋषि: मां वैसे तो मैं हूं पर..? इस मामले में मैं नायरा के साथ हूं… अपना ही गुजारा कितनी मुश्किल से होता है… ऐसे में दो लोगों की जिम्मेदारी..? और आंचल यहां तेरी गलती भी है… तूने हमेशा अपनी मन की की है… जिसकी सजा तो मिलनी ही थी… अब भुगतना तो तुझे ही पड़ेगा ना…
गायत्री जी: यह तू क्या कह रहा है ऋषि..? नायरा ने तुझे बहकाया है ना..? यह आजकल की लड़कियां सिर्फ क्लेश करने ही आती है… परिवार को जोड़ना तो कभी आया ही नहीं… बस हमेशा तोड़ने की बात ही करती है… बहू लाने से पहले ही सब जान जाते हैं की यह तो बस आकर घर को तोड़ेगी… ऊपर से घर के बेटे को ही घर के खिलाफ कर देगी…
नायरा: चलिए मम्मी जी… यह बात आपको समझ तो आ गई के बहू का मतलब क्लेश होता है… इसलिए आपकी बेटी को भी बहू के रूप में क्लेश करना सिखाती रही… पर जो बात मेरे लिए गलत वह बात आपकी बेटी के लिए सही कैसे हो गई मम्मी जी..? बेटी गुरूर और बहू क्लेश… यह बात कुछ समझ नहीं आई…
आंचल मम्मी जी की उम्र शायद उतनी नहीं है कि वह हमारी बात समझे, पर तुम तो समझ सकती हो ना… एक तरफ तो मम्मी जी चाहती है मैं बहू का पूरा कर्तव्य निभांऊ… पर तुम्हें वही कर्तव्य निभाने नहीं देती… इसलिए अब तुम्हें फैसला करना है कि अपनी बसी बसाई गृहस्ती उजाड़नी है या एक बहू का कर्तव्य निभानी है…
आंचल: भाभी सच में आज आपने मेरी आंखों पर से घमंड की पट्टी उतार दी है, जो बात एक मां को अपनी बेटी को सिखानी चाहिए… वह बात आपने सिखाई… पर अब काफी देर हो गई है… मनीष ने तो मुझे तलाक देने का फैसला कर लिया है..
नायरा हंसने लगी.. उसे यूं हंसता देख आंचल कहती है.. क्या हुआ भाभी..?
नायरा: पगली तुम अभी तक अपने पति को नहीं समझ पाई.. वह तुम्हें सपने में तलाक नहीं दे सकता, तो सचमुच की बात ही अलग है… यह सब तो मेरे प्लेन का हिस्सा था.. जिसमें तुम्हारे भैया, मनीष सभी शामिल थे… वह तो तुमसे एक पल दूर नहीं सकता है फिर तलाक क्या देगा..? बाहर खड़ा है तुमसे मिलने आया था.. पर मैंने रोक दिया और कहा पहले इस नाटक को खत्म करेंगे फिर आप अंदर आना… उसके बाद मनीष भी अंदर आ जाता है..
आंचल रोते-रोते: भाभी मैं बहुत खुशनसीब हूं जो मुझे आप जैसी भाभी मिली… नायरा और भी खुश नसीब हो जो तुम्हें ऐसा पति मिला…
ऋषि: अरे नहीं नहीं… सबसे ज्यादा खुश नसीब तो मैं हूं जो मुझे ऐसी पत्नी मिली… फिर सभी हंसने लगे और गायत्री जी बस सिर झुकाए खड़ी रही… वह सब कुछ समझ तो रही थी… पर शायद अपनी गलती मानकर छोटों के सामने अपनी गलती स्वीकार करें… यह उनकी उम्र इजाजत नहीं दे रही थी… क्योंकि अक्सर बड़ों को लगता है कि हमेशा वही सही होते हैं… पर कभी-कभी छोटे भी बड़ों को सीख दे जाते हैं…
धन्यवाद
रोनिता
#गुरुर