बेटा विदेश में है – विभा गुप्ता : Moral Stories in Hindi

 दो वर्ष पूर्व मेरा जबलपुर जाना हुआ था।पति के ऑफ़िस से मिले गेस्ट हाउस में फ़्रेश होकर पति महोदय जब अपने काम के लिये निकल गये तब मैंने अपनी सहेली मीता को फ़ोन किया।हाय-हैलो करने के बाद उसने कहा,” चल..’आंटी काॅफ़ी हाउस’ में बैठकर बातें करते हैं।” कहकर उसने मुझे लोकेशन शेयर किया और मैं ऑटोरिक्शा में बैठकर वहाँ पहुँच गई।मीता वहीं थी।दोनों सहेलियाँ गले मिले।फिर वो बोली,” अंदर चल…तुझे आंटी से मिलाती हूँ।”

         छोटा लेकिन करीने-से सजा हुआ काॅफ़ी हाउस मुझे बहुत पसंद आया।कुछ मेज़ों पर लड़के-लड़कियाँ बैठकर लैपटाॅप पर काम भी कर रहें थें।काउंटर पर कलफ़दार साड़ी पहने बहत्तर वर्षीय दो महिलाओं को बैठे देखकर मैं चकित रह गई।मीता ने उन दोनों से मेरा परिचय कराया और उनकी तरफ़ देखते हुए मुझसे बोली,” गुलाबी साड़ी पहने सुलोचना आंटी हैं और साथ में बैठी उनकी समधन सुचित्रा आंटी हैं।’ समधन’ सुनकर मैं ज़रा चौंक पड़ी थी।

     सुलोचना आंटी मुझसे पूछने लगी कि कैसी हो..बच्चे कैसे हैं….।तब मैंने कहा कि मैं अच्छी हूँ आंटी..बस बेटे को लेकर थोड़ी दुविधा में हूँ।

    ” दुविधा! कैसी दुविधा…आजकल के बच्चों का तो विज़न बहुत क्लिर है..फिर..।”

  ” बेटा मुंबई से एमबीए करना चाहता है और हम लोग चाहते हैं कि वो जर्मनी जाये…मैं भी तो चार लोगों के बीच घमंड से कह सकूँ कि मेरा बेटा विदेश में है…।” मेरी बात सुनकर सुलोचना आंटी मुस्कुराने लगी।उनकी समधन ने हौले-से उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।मैं कुछ पूछने ही वाली थी कि मीता ने आंटी को ‘दो काॅफ़ी’ कहा और मेरा हाथ पकड़कर बोली,” चल…बैठते हैं।”

     काॅफ़ी टेबल पर आ गई तो मैंने क्रोध में मीता से पूछा,” मेरी बात सुनकर तेरी आंटी मुस्कुरा क्यों रही थी? वो क्या जाने कि लंदन-अमेरिका क्या है…।” अब तो मीता भी हा-हा करके हँसने लगी।

  ” उधर तेरी आँटी और इधर तू… आखिर माज़रा क्या है?” मेरा स्वर तीव्र हो गया।

   ” जानना चाहती है कि आंटी क्यों मुस्कुराई थी।”

   ” बिल्कुल “

   ” तो सुन..।” फिर मीता मुझे बताने लगी…

       ” सुलोचना जी सम्पन्न घराने से ताल्लुक रखतीं थीं।उनके पति जी डी लाल यानि गिरधारी लाल सरकारी अफ़सर थे…बंगला-गाड़ी…नौकर-चाकर सारी सुविधायें उन्हें मिली हुई थी।तीन बच्चे थें- अंजू, निखिल और रंजू।पढ़ाई में तीनों ही अव्वल थें।अंजू और निखिल को अपने पिता के पद-प्रतिष्ठा पर बहुत गुरूर था लेकिन रंजू उनसे विपरीत थी।वह विनम्रता और सरलता को अधिक महत्त्व देती थी।

      सुलोचना जी की सहेलियाँ जब इतरा-इतराकर कहतीं कि हमारा बेटा लंदन में है अथवा अमेरिका में है तब वो सोचती कि जब मेरे बच्चे बड़े होंगे तब मैं भी उन्हें विदेश भेजूँगी और इनकी तरह घमंड से कहूँगी कि मेरा बेटा…।

      अंजू ने जब अच्छे अंकों से ग्रेजुएशन कंप्लीट किया तब सुलोचना जी ने अपनी सहेली के भतीजे अंकित जो कनाडा की एक कंपनी में नौकरी करता है, के साथ उसका विवाह करा दिया।

       निखिल मास्टर्स करने अमेरिका चला गया।लौटा तो साथ में उसकी पत्नी भी थी।बेटे-बहू के आने की खुशी में सुलोचना जी ने बहुत बड़ी पार्टी दी थी।मैं आता रहूँगा मम्मी ‘ कहकर निखिल वापस अमेरिका चला गया।वह महीने में एक बार विडियो काॅल करके अपने माता-पिता का हाल-समाचार पूछ लेता था।अंजू भी फ़ोन करके अपने बारे में बताती रहती थी जिसे सुनकर सुलोचना जी फूली नहीं समाती थी।जब भी किसी समारोह-पार्टी में जातीं तो बड़ी शान से अपनी सहेलियों को बतातीं कि मेरा बेटा और दामाद विदेश में है।

      जब रंजू के लिये सुलोचना जी वर तलाश करने लगी तब उसने धीरे-से अपनी माँ से कहा,” मम्मी…वो…।” कहते हुए उसकी आवाज़ लड़खड़ाने लगी। गिरधारी लाल जी की अनुभवी आँखों ने सब कुछ समझ लिया था।बेटी के सिर पर उन्होंने अपने स्नेह का हाथ रखा तब रंजू बोली,” पापा…मैं अपनी सहेली नीलू के घर पर सुशांत जी से मिली थी।वो सिटी काॅलेज़ में इकनाॅमिक्स के लेक्चरर हैं और मुझे बहुत पसंद हैं।” कहते हुए उसने अपना सिर झुका लिया।  

 ” हमारा दामाद एक लेक्चरर…तेरा दिमाग तो ठीक है…लोग क्या कहेंगे?…दो दिन में प्यार का भूत उतर जायेगा तब….।” सुलोचना जी बेटी पर भड़की।

   ” शांत हो जाओ…हमारी रंजू समझदार है।लोगों की बातों पर ध्यान न देकर हमें अपनी बेटी की खुशी के बारे में सोचना चाहिए।” गिरधारी लाल जी ने पत्नी को समझाया और इम्तिहान खत्म होने के बाद वे पत्नी के साथ सुशांत के घर गये।

     छोटा घर देखकर सुलोचना जी ने नाक-भौं सिकोड़ लिया लेकिन करीने-से सजा हुआ घर गिरधारी लाल जी को बहुत पसंद आया।सुशांत के साथ-साथ उसके माता-पिता के व्यवहार से भी वे बहुत प्रभावित हुए और एक शुभ मुहूर्त में उन्होंने बेटी का विवाह सुशांत के साथ कर दिया।

      रंजू अपने ससुराल में बहुत खुश थी, फिर भी जब वह अपने मायके आती तो सुलोचना जी उससे कहती,” तू कहे तो निखिल से कहकर सुशांत को भी अमेरिका में कोई काम दिलवा दूँ…यहाँ के लेक्चररशिप में क्या रखा है…।” सुशांत के सामने भी निखिल और अंकित की बहुत प्रशंसा करती।तब गिरधारी लाल जी ने पत्नी को टोका,” ये क्या तरीका है..सुशांत भी तुम्हारा दामाद है..उसका सम्मान करना भी तुम्हारा फ़र्ज़ है।”

     गिरधारी लाल जी अस्वस्थ रहने लगे तो उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति(VRS) ले ली और घर पर आराम करने लगे।एक दिन अचानक वे छाती के दर्द से कराह उठे।उन्हें लगा जैसे अब जी नहीं पायेंगे।पत्नी को बोले कि बच्चों को बुला दो।रंजू-सुशांत तो दौड़े चले आये और उन्हें हाॅस्पीटल में भर्ती कराया।निखिल बोला,” मम्मी..परेशान मत होइये…मैं यहीं से डाॅक्टर का अपाॅइंटमेंट ले लेता हूँ..आप पापा को लेकर अस्पताल चले जाइये और पैसे का टेंशन मत लीजियेगा।मैं सब कर दूँगा।” अंजू ने कहा कि देखती हूँ मम्मी…अंकित को समय..।सुलोचना जी ने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया।बच्चों की गैरजिम्मेदारी ने उनके गुरूर को चूर-चूर कर दिया था।उस दिन वो रंजू का हाथ पकड़कर बहुत रोई थी।उनके आँसुओं में दुख था और पछतावा भी।

        सुशांत काॅलेज़ से छुट्टी लेकर गिरधारी लाल जी के साथ अस्पताल में ही रहा।समय-समय पर उन्हें दवायें-फल खिलाता और इधर-उधर की बातें करके उनका मन भी बहलाता।उसके पिता भी अपने समधी से मिलने अस्पताल जाते थे।

       स्वस्थ होकर गिरधारी लाल जी घर तो आ गये लेकिन उनके जीने की इच्छा खत्म हो गई थी।बैठे-बैठे शून्य में निहारते रहते थे।संतान की अवहेलना का दुख उन्हें अंदर ही अंदर खाये जा रहा था। पति की हालत के लिये स्वयं को दोषी मानकर सुलोचना जी भी दिन-रात आँसू बहाती रहतीं।रंजू दोनों को समझाती रहती थी।

      एक दिन सुशांत के माता-पिता आये और गिरधारी लाल जी से कहने लगे,” भाई साहब…बच्चों की बात को दिल से न लगाये…उनकी नासमझी को माफ़ करके आगे बढ़िये…ईश्वर के दिये गये जीवन को व्यर्थ मत कीजिये… .कुछ काम करते रहिये ताकि आपका मन लगा रहे..। ” उन्होंने ही ‘ काॅफ़ी हाउस ‘ खोलने का आइडिया दिया।छह महीने तक तो दोनों समधियों ने ही इसे संभाला और फिर सुलोचना आंटी ने कमान संभाल लिया।अब ये दोनों महिलाएँ सहेलियाँ बन गईं हैं।यहाँ पर बच्चों के बीच बैठकर हँसती-बोलतीं हैं…उनसे सींचती हैं और उन्हें सलाह भी देती हैं..।उन्होंने कितने ही परिवारों को टूटने से बचाया है।” कहकर मीता ने अपनी काॅफ़ी खत्म की।

   मैंने पूछा,” तो क्या निखिल कभी नहीं आया..।” मीता ने कहा,” दो महीने बाद आया था।कहने लगा,” मम्मी-पापा..यहाँ अकेले रहने से कोई फ़ायदा नहीं है…चलकर हमारे साथ रहिये..।”

  ” फिर…।”

  ” फिर क्या…अंकल-आँटी ठहाका मारकर हँसने लगे, फिर बोले कि अकेले कहाँ हैं हम..सुशांत जैसा बेटा है ना हमारे पास…।कहते हुए उनके चेहरे पर गुरूर था।”

    मेरी जिज्ञासा अभी भी शांत नहीं हुई थी।मैंने पूछा,” दोनों आँटी यहाँ हैं तो अंकल क्या कर रहें हैं और रंजू-सुशांत…।”

    ” गिरधारी लाल जी अपने समधी के साथ बैठकर गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं..अपने पेंशन के पैसों में से कुछ रुपये उनकी किताबों पर खर्च कर देते हैं।रंजू तो अपना घर-बच्चे संभालती है परन्तु सुशांत काॅलेज़ से समय निकालकर यहाँ के प्रबंध को देखता है…घटे-बढ़े को संभालता है।अब समझी…आँटी क्यों मुस्कुरा रहीं थीं।”

      मीता की बात सुनकर मैंने अंकल-आंटी को मन ही मन सैल्यूट किया।मैं काॅफ़ी का बिल देने लगी तो मीता ने मेरा हाथ रोक दिया।मैंने मुस्कुराते हुए सुलोचना आँटी से कहा,” थैंक्स फाॅर काॅफ़ी एण्ड…।” मेरी मुस्कुराहट से आंटी समझ गई थी कि मैंने उनके जीवन को पढ़ लिया है।उन दोनों को ‘नमस्ते-बाय’ कहकर मैं मीता के साथ बाहर आ गई।

        कुछ दिनों के बाद मैंने मीता को बताया कि मेरा बेटा मुंबई चला गया है।उसी शाम सुलोचना आंटी का मेरे पास फ़ोन आया,” अब गर्व से कहना कि बेटा मुंबई में है।”

                              विभा गुप्ता

# गुरूर                     स्वरचित 

            हमारे बच्चे अथवा सगे-संबंधी विदेश में है तो ये खुशी की बात है लेकिन समय पर जो हमारी मदद करे..हमारे दुख को अपना दुख समझे..हमारे साथ खड़े रहे..उस पर हमें गुरूर अवश्य करना चाहिए।

2 thoughts on “बेटा विदेश में है – विभा गुप्ता : Moral Stories in Hindi”

  1. विदेश रह रहे बच्चे अपना तथा अपने परिवार का भविष्य बनाने में व्यस्त हैं l उनसे दौड़कर आना और सेवा की अपेक्षा व्यर्थ है l अच्छे भरोसेमंद दोस्त रिश्तेदारों से संबंध बनाये, उनके काम आये वो भी आप के काम आयेंगे l

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