*बाँसुरी की तान का जादू* –    मुकुन्द लाल

    उस दिन जब तारा की मालकिन श्रद्धा परिभ्रमण पर निकली हुई थी तो सुबह तड़के ही वह मंदिर के बाग से फूल तोड़ने के लिए उसके भवन से निकल पड़ी। बाग से फूलों को तोड़कर उसने दो मालाएंँ गूंँथ ली। फिर उसे एक डलनी(बहुत छोटी सी टोकरी) में लेकर वह उत्तम के पास पहुंँच गई।

 उस समय आकाश में सूर्योदय हो ही रहा था। मंदिर में इक्के-दुक्के लोग ही पहुंँचे थे। उत्तम बाँसुरी के माध्यम से आकर्षक लय और तर्ज पर भजन गा रहा था।

 वह कुछ देर तक सुध-बुध खोकर बाँसुरी की मधुर आवाज सुनती रही। हाथों की चूड़ियों की आवाज सुनकर उत्तम ने पूछा, “कौन?”

 बाँसुरी-वादन बंद हो गया था। तब तारा ने कहा,

 “तुम्हारे पास इतना सबेरे सुबह में कौन आ सकता है?”

 “तो तुम तारा हो!.. तुम्हें रात में नींद नहीं आती है क्या?.. वहांँ शायद मच्छङों के गीत सुनने को मिलते हैं।”

 “मच्छङों के गीत नहीं वहांँ बाँसुरी की आवाजें मेरे कानों में गूंँजती रहती है, मुझे तो ऐसा लगता है कि तुम्हारे सानिध्य में बैठकर तुम्हारे बाँसुरी-वादन को सुनती सुनती रहूंँ हमेशा-हमेशा के लिए। “

” तुम पागल हो गई हो क्या?.. ऐसा होगा तो मैं अपनी बाँसुरी को तोड़कर फेंक दूंँगा और हाथ में भीख का कटोरा थाम लूँगा। “

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” ऐसा भूलकर भी नहीं करना उत्तम, मैं तुमको दिल की गहराइयों से प्यार करती हूँ, तुम्हारे बिना मुझे चैन नहीं है। “

कुछ क्षण तक सन्नाटा छाया रहा, फिर उत्तम ने कहा,” मैं तुम्हें कैसे प्यार कर सकता हूँ, तुम्हीं सोचो!.. अगर कर भी लूंँ तो एक अंधा आदमी तुमको क्या सुख दे सकता है?.. अंधे आदमी के जीवन का क्या अर्थ है?.. क्या मतलब है?.. अंधा और प्यार दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं, चाहने से भी यह संभव नहीं है तारा।”

 “क्या संभव नहीं है?.. चाहने से क्या नहीं हो सकता है? “अंधे को तो अपनी दिनचर्या संपन्न करने में ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिर घर-गृहस्थी कैसे चलेगी?..”



 “सब चलेगा, तुम जवान हो, हिम्मत हार गये, सिर्फ इसलिए कि तुम्हारी आंँखों में रोशनी नहीं है, घबराओ नहीं उत्तम,बिना आंँख वाले अपने मन की आंँखों से देखते हैं, बड़े-बड़े कामों को सफल बनाते हैं। आश्वासन दो उत्तम!.. तुम मेरी आंँखों से देखोगे। मेरी दोनों आंँखें तुम्हारे हर कामों में सहायता करेगी। हिम्मत मत हारो, हौसला रखो। मेरे मालिक आंँखों के बहुत बड़े डाॅक्टर हैं। बहुत से दिव्यांगो ने उनके इलाज से आंँखें पाई है। उनसे तुम्हारी आंँखों का इलाज करवायेंगे। बड़े भले आदमी हैं पति-पत्नी। हर संभव हमलोग कोशिश करेंगे कि तुम्हारी आंँखों में रोशनी आ जाए। मुझे पूरी उम्मीद है कि डॉक्टर साहब तुम्हारी आंँखों में रोशनी लाने में कामयाब होंगे। “

” मुझे क्यों सब्जबाग दिखा रही हो?.. जो संभव नहीं है उसको करने की जिद्द पर अड़ी हो। मेरी मरी हुई चाहत को  क्यों जिन्दा करने की कोशिश कर रही हो मेरे अंतर्मन को कुरेद कर। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। मंदिर की सीढ़ियाँ ही मेरा सहारा है। बाँसुरी ही मेरी जीवन-संगनी है। “

                    बेसहारा और अनाथ उत्तम मंदिर की सीढ़ियों पर बांँसुरी बजाने का काम करता था। बांँसुरी से निकलने वाली तान जितनी मधुर, दिलकश और आकर्षक थ, उतना ही आकर्षक था उसका व्यक्तित्व, लेकिनह अंधा था।

 मंदिर में आने-जानेवाले श्रद्धालु रुपये-दो रुपये दे देते थे। बच्चों और युवक व युवतियों का दल हमेशा उसके पास खड़ा रहता था बांँसुरी से निकलने वाली दिल छू लेने वाली आवाजों को सुनने के लिए।

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 उस दिन सुबह एक लड़की फूलों से भरी एक डलनी(बहुत छोटी सी टोकरी) लिये खड़ी थी। बांँसुरी की मनमोहक आवाज ने उसके पैरों में अदृश्य जंजीर डाल दिया था। वह बांँसुरी से सुन्दर लय और तर्ज पर आधारित निकलने वाले भजनों और गीतों को तन्मयता से सुन रही थी।

 कुछ पल के बाद ही बांँसुरी का बजना अचानक बन्द हो गया।

 “कितनी अच्छी सुगन्ध आ रही है फूलों की.. कौन है?.. कोई है जिसके पास फूलों का गुच्छा या फूलों की माला वगैरह है” उसने अपने ज्ञान-चक्षु से महसूस करते हुए कहा।

” मैं हूँ! “

 “मैं कौन?”

 “तारा!.. पूजा के लिए फूल ले जाती हूंँ मंदिर के बाग से तोड़कर।”

“वाह!.. फूलों की सुगन्ध ने तो दिल खुश कर दिया। “

” अच्छा!.. लीजिए! ” कहती हुई उसने एक गुलाब का फूल उसके हाथों में पकड़ा दिया। “



   ताजे फूल की हृदयस्पर्शी खुशबू का आनन्द लेते हुए दिव्यांग ने हर्षातिरेक में कहा, “तारा.. इसके बदले में तुमको एक खूबसूरत गीत बांँसुरी से सुनाता हूँ।”

 फिर वह उस गीत की पंँक्तियों को लाजवाब धुन पर बांँसुरी-वादन के द्वारा सुनाने में मगन हो गया।

        तारा के उम्रदराज पिता की मृत्यु के बाद उसकी सौतेली मांँ ने उस पर इतना अत्याचार और प्रताड़ित किया था कि उसको अपना झोपड़ीनुमा घर त्यागने के लिए बाध्य होना पङा था।

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 जब वह भूखी-प्यासी सड़क पर तनावग्रस्त होकर योंही बिना किसी प्रयोजन के भटक रही थी, दो-चार युवकों ने लावारिस समझकर उसे छेड़ना शुरू कर दिया। वह परेशान होकर कभी इधर, कभी उधर भाग रही थी किन्तु युवकों ने पीछा नहीं छोड़ा, ऐसे ही मौके पर एक कार आकर उसके पास रुक गई। उसमें बैठी संभ्रांत महिला को वस्तुस्थिति समझने में देर नहीं लगी। उसने उसे तेजी से कार में बैठाया और फिर कार वहांँ से प्रस्थान कर गई। युवकों का दल मुंँह देखता रह गया।

 बेसहारा लड़की को सहारा मिल गया।

 सारी जानकारी हासिल करने के बाद उसने अपने भवन की साफ-सफाई और अन्य कामों को निपटाने के लिए उसने उसको नौकरानी के रूप में अपने यहाँ रख लिया, इस शर्त पर कि उसे वहीं रहना पङेगा, एवज में उसे खाना-पीना, कपड़े और मासिक कुछ नगद रुपये मिलेंगे।

 वास्तव में वह आंँखों के एक प्रसिद्ध डाॅक्टर का घर था। जिसकी धर्मपरायण धर्मपत्नी श्रद्धा ने उसे जो सबसे जरूरी काम सौंपा था वह था प्रतिदिन सुबह उस मोहल्ले के मंदिर के बाग से पूजा के लिए फूल लाना।

 इसी क्रम में जब वह मंदिर जाती थी तो उत्तम द्वारा बजाई जा रही बाँसुरी की मधुर तान उसे चुंबक की तरह अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। वह कुछ देर के लिए ठहरकर बांँसुरी-वादन सुनती थी। उसकी बाँसुरी की मोहक तान में क्या जादू था कि उसकी आवाज़ उसके दिल की गहराइयों में उतरती गई। वह उसकी बाँसुरी की प्रभावशाली व हृदयस्पर्शी आवाज की ऐसी दीवानी हुई कि उसे बिना सुने चैन नहीं मिलता था। इसी सूत्र ने उसे उत्तम के दिल के करीब पहुंँचा दिया था।

                                “ऐसा नहीं हो सकता?.. तुम नहीं मानोगे तो मैं जान दे दूंँगी। अपनी आंँखें भी फोड़ लूंँगी।”



 “पागल मत बनो तारा!”

 “मैं जीऊंँ या मरूंँ तुमको क्या फर्क पड़ता है?”

 “फर्क पड़ता है!”

 “मैं कह रही हूंँ, कुछ महीनों की बातें है, मुझे पूरी उम्मीद है कि डॉक्टर साहेब के इलाज से सब ठीक हो जाएगा!.. खामखा तुम अपनी जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हो। “

वातावरण में खामोशी छा गई थी। कुछ पल के बाद उसने फिर बेबाकी से कहा,” इसी वक्त प्रभात-बेला में भगवान को साक्षी मानकर मैंने तुमको अपना जीवन-साथी बनाने का फैसला ले लिया है” कहते-कहते उसने उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया।

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 उत्तम ने भी उसके फैसले पर कोई एतराज नहीं किया।

 शादी से संबंधित खर्च के बारे में उत्तम ने जब कहा कि मेरे पास तो बहुत कम पैसे हैं, तब तारा ने कहा,” हमलोगों के पास शादी करने के लिए पैसे नहीं है तो क्या हुआ, आपसी विश्वास और आत्मबल हमारी दौलत है।”

 क्षण-भर ठहरकर उसने कहा, “अब कुछ मत सोचो, चलो भगवान के दरबार में जयमाला की रस्मों को निभाने के लिए।”

 तारा मालाओं की छोटी सी टोकरी एक हाथ में लिए उत्तम को सहारा देते हुए मंदिर के अंदर प्रवेश कर गई।

 इस मांगलिक कार्य के शुभ अवसर पर मंदिर के

  अंदर घंटियों की आवाजें गूँजने लगी, इसके साथ ही शंखनाद भी शुरू हो गया।

   स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित

                 मुकुन्द लाल

                  हजारीबाग(झारखंड)

 

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