औरत त्याग की मूरत  – मीनाक्षी सिंह 

माँ शब्द ही अपने आप में त्याग का सम्पूर्ण रुप हैं ! माहेश्वरी जी के पति फौज में सूबेदार थे ! अब माहेश्वरी जी की उम्र 45 साल हो गई थी ! पति बनवारी भी 48 के हो गए थे !

जब माहेश्वरी जी बनवारी जी के घर में ब्याह के आयी थी तो सोचा नहीं था कि उनका जीवन इतना संघर्ष भरा होगा ! ऊँचे घराने की होने की वजह से चूल्हे चौके के काम में पारांगत नहीं थी ! उनके पिता के यहा नौकरों की कमी नहीं थी !

पति की सरकारी नौकरी  देखकर उनका ब्याह इस घर में हो गया ! जब  भी चूल्हे पर रोटी बनाती वो सारी रोटियां लकडी चुभने से पिचक जाती ! वो रोटी पर आटे की मोटी सी परत रख के उसे बड़ी मशक्कत से फुलाती और जो रोटी फूल जाती वही ससुर जी को देकर आती !

पूरे मोहल्ले में उनकी खूबसूरती का मुकाबला नहीं था ! और लखनऊ घराने से होने की वजह से बोली कोयल सी मीठी ! देवर शराब पीने के आदी थे ! इसलिये उनकी सास ने ऊंहे सबक सिखाने  के लिए सबको अलग कमरा दे दिया !

और कहा अपनी अपनी ग्रहस्थी संभालो सब ! माहेश्वरी जी के पति बाहर रहते थे ! वो तीन बच्चों को लेकर अकेले कमरे में रहती ! सामान लेने  भी ऊंहे ही लम्बा सा पल्लू करके जाना पड़ता ! जैसे तैसे दिन गुजरे!

वो अपने पति के साथ उनकी नौकरी वाली जगह पर आ गई ! पति फिर भी ट्रेनिंग के लिए कभी फौज के लिए बाहर ज़ाते रहते ! फिर वो तीनो बच्चों की ज़िम्मेदारी अकेली ही निभाती ! बच्चों के बिमार होने पर ऊंहे गोदी में लेकर भागना !

चक्की से आटा पिसाकर लाना ! अब बच्चे  बड़े हो रहे थे ! बड़ी बेटी एम .एस .सी कर रही थी ! बनवारी जी जब भी आते  ! माहेश्वरी जी के पास कुछ समय बैठना चाहते ! माहेश्वरी जी बहुत सुलझी हुई महिला थी ! वो जानती थी बेटी युवावस्था में प्रवेश कर चुकी हैं !

और पूरी  रात मन  लगाकर पढ़ती हैं ! अगर मैं अपने पति के कमरे में जाऊंगी तो उसके मानसिक स्तर पर प्रभाव पड़ेगा ! उसके मन में गलत विचारों का समावेश होगा और पढ़ाई  से उसका मन भटक जायेगा ! वो पूरी रात बेटी के कमरे में रहती !

उसे समय समय पर चाय,खाने के लिए कुछ देती रहती !  बेचारे बनवारी जी पत्नी के साथ दो प्यार भरे पल भी ना बिता पाते और लौट जाते अपने  नौकरी पर ! वो भी समझते थे कि मेरी बीवी में समझदारी कूट कूट कर भारी हैं ! ज़िसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता हैं !


ईश्वर की कृपा से उनके बच्चे कुशाग्र बुद्धि थे !

समय गुजारा बेटी की शादी का वक़्त आ गया ! खुशियों को पता नहीं किसका ग्रहन लगा ! बीटिया के ब्याह से 5 दिन पहले बनवारी जी का ट्रैन दुर्घटना में स्वर्गवास हो गया ! कहा माहेश्वरी जी बेटी की शादी के बाद उनके साथ 1 महीने के टूर पर जाने वाली थी !

उनकी ज़िन्दगी रूक सी गयी ! बेटी का ब्याह किसी तरह हिम्मत करके कर दिया ! कभी कभी आत्महत्या का ख्याल भी आता था पर आगे उनके दो छोटे छोटे बच्चों  की ज़िम्मेदारी थी !  फिर उन्होने कमान संभाली !

आज उन्होने अपनी दूसरी बेटी को भी डोली में बिठा दिया  हैं ! दोनो बेटियां सरकारी नौकरी में हैं ! बस बेटे की नौकरी लगने का ऊंहे बेशबरी से इतंजार हैं ! अब शरीर में ताकत नहीं रही ! बेटियां भी अपने घर हैं ! खाना खुद ही बानाना पड़ता हैं !

सांस फूल जाती हैं उनकी ! बेटे की नौकरी लग जाये तो शायद  कुछ साल ख़ुशी के मिल जायें ऊंहे ! पूरा जीवन उनका परिवार पर ही समर्पित हो गया ! कभी कभी बनवारी जी की बात याद करके खूब रोती हैं – कहते थे मेरी सोना ,

बच्चों में खुद को इतना मत झोकों ! मेरे लिए भी समय निकालो ! और वो हंसकर कहती मेरे जानू ,पूरा जीवन पड़ा हैं हमारा ! बच्चे सेटल हो जाए पूरी दुनिया घुमेंगे ! और उनकी फोटो को जोर से सीने से लगाकर फड़फडा जाती हैं ! आज तक उन्होने बनवारी जी की फोटो पर माला नहीं डाली ! सोचती हैं नौकरी पर गए हैं मेरे जानू ! एक दिन आयेंगे  ! और इसी के सहारे जीए  जा रही हैं !

साथियो ये मेरी माँ की कहानी हैं ! उनके त्याग के आगे मैं नतमस्तक हूँ

स्वरचित

मीनाक्षी सिंह

 

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