औकात – मनीषा सिंह : Moral stories in hindi

“मां _! मुंह मीठा कीजिए ।पैर छूकर शैलेश मिठाई अपनी मां के मुंह में डालते बोला 

“बता तो सही की किस खुशी में मिठाई खिलाई जा रही है!

  मालती जी बेटे के सर पर हाथ रखते बोली 

“मां आज फाइनली मैं लेक्चरर के लिए सेलेक्ट हो गया 

 कई सालों से मेरी कोशिश थी इस जॉब के लिए । आज मुझे यह जॉब मिल ही गई।

 ‘मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा  कि ये नौकरी तुझे मिल गई।’

 मैंने तो  इस  बारे में सोचना ही छोड़ दिया था।

 मालती जी प्रसन्नता से बोली ।

 हां मां—- यह सच है !

शैलेश की आंखें चमक रही थी हो भी क्यों ना, सालों बाद जाने कितनी कोशिश  के बाद ये खुशी उसके झोली में आई थी।

शैलेश आज अपने अतीत के पन्नों को पलटने से  खूद को रोक न सका।

पिता की आकस्मिक मृत्यु के कारण घर की सारी जिम्मेदारियां शैलेश के कंधों पर आ गई ।

घर में मां के अलावा एक छोटी बहन शालू थी जो आठवीं कक्षा में पढ़ती थी।

अब वह दिन भर ट्यूशन पढ़ाता और रात में पढ़ाई भी करता ।

MA करने के बाद उसने पीएचडी की तैयारी शुरू कर दी  । क्योंकि उसका सपना था कि वह एक प्रोफेसर बने। धीरे-धीरे समय बीतता गया उसका  पीएचडी भी कंप्लीट हो गया पर  लेक्चरर की वैकेंसी नहीं आने के कारण उसने अपना ट्यूशन वाला काम कंटिन्यू रखा।

 इधर शालू ने भी बोर्ड एग्जाम देकर 11वीं में दाखिला ले लिया । बहन के सुनहरे भविष्य को बनाने के लिए उसे बाहर भेजना  था, लेकिन खर्च की वजह से वह मन मसोस के रह जाता।  उसे लगता  कि इस समय अगर नौकरी मिल जाती तो शालू को भी वह बाहर भेज सकता था। 

 जैसे तैसे घर का खर्च तो निकल जाता पर सुनहरे भविष्य के लिए वह दिन रात ट्यूशन पढ़ाने में व्यस्त हो गया। 

” शैलेश के लिए कई रिश्ते भी आने लगे थे “।

पर शैलेश सभी रिश्तों के लिए ना कर देता ।

एक दिन  शैलेश की दूर की बुआ उसके लिए एक रिश्ता लेकर आई।

” अरे भौजी” देखो—कहीं देती हूं की ऐसा रिश्ता तुम्हें फिर नहीं मिलेगा! लड़की पढ़ी लिखी है 

अच्छे सभ्य घर से है ।

वैसे वो भी शादी के लिए राजी नहीं थे लेकिन भाई साहब ने मेरी शादी करवाई थी तो मैंने सोचा कि  भैया के नहीं रहने के बाद शैलेश के प्रति मेरी भी  कुछ जिम्मेदारी बनती है इसे भी अच्छी पत्नी और तुम्हें अच्छा कुटुंब मिल जाए।

 आखिर दूर की सही पर हूं तो इसकी बुआ ना ।

 मैं  तो चाहूंगी ना कि मेरे भतीजे को अच्छा परिवार मिले पार्वती बुआ  चाय की प्याली रखते हुए  बोली।

 ठीक है पार्वती बहन अब तुम इतना बोल रही हो तो भेजो यह रिश्ता ।

बाकी भगवान की मर्जी।

मालती जी सर की पल्लू खींचते हुए बोली।

 “आज सुबह से पूरे घर की सफाई चल रही थी। रसोई में मालती जी व्यंजन बनाने में व्यस्त थी ।

शालू दौड़ दौड़ के कभी घर की सफाई तो कभी रसोई में मालती जी की हाथ बटा रही थी।

 इधर शैलेश काफी नाराज था क्योंकि इस बार मालती जी ने शैलेश की एक ना सुनी । 

“पिता की मौत के बाद इस बच्चे ने तो जैसे अपनी जिंदगी जीना ही छोड़ दिया।

 हम सबके चलते कब तक ये शादी से दूर भागेगा ।अब इसकी उम्र भी तो हो गई है ।मालती जी अपनी सोच को विराम देते हुए शैलेश को समझाते हुए बोली बेटा यह रिश्ता जैसी तेरी बुआ ने बताया है की अच्छा है एक बार उन लोगों को आ तो जाने दे ।

“अगर लड़की अच्छी नहीं होगी तो हम इस रिश्ते से इनकार कर देंगें ।”

” पार्वती बहन ने तो बताया है हमें कि शैलेश की सरकारी नौकरी तो पक्की है आज नहीं तो कल मिल ही जाएगी “।

 “वैसे हमें तो लड़का काफी अच्छा लगा हमारी तरफ से तो रिश्ता पक्का है  अब आपकी क्या राय है बहन जी ‘”?

 सुदर्शन जी जो लड़की के पिता थे लड़की की तस्वीर मालती जी को देते हुए बोले यह है हमारी बेटी  संचिता। 

“जी हम आपको खबर करेंगे फोटो लेकर हाथ जोड़ते हुए मालती जी  बोली” ।

अरे वाह !भैया —! भाभी तो बहुत  सुन्दर है!

 शालू फोटो शैलेश को दिखाते हुए बोली।

 ‘पर मां आप तो जानती हैं कि मुझे अभी शालू को दिल्ली पढ़ने के लिए भेजना है ।

फिर आप मुझे इस बंधन में क्यों बांध रही हैं।’

“सब भोलेनाथ की महिमा से ठीक चलेगा तू बस इस शादी के लिए हां बोल दे ।”

मालती जी शैलेश की गाल खींचते  बोली।

 शैलेश शर्म से सीर नीचे झुका लिया।

सारे घर में खुशी का माहौल था देखते देखते शादी की तैयारी भी चलने लगी ।

और एक दिन मालती जी के घर , संचिता  बहू बन कर आ गई ।

“संचिता के आने से घर में जैसे रौनक सी आ गई थी ।

 “शैलेश अब कुछ ना कुछ बहाना कर संचिता के इर्द-गिर्द घूमते रहता ।

 शैलेश को इतना खुश देखकर मालती जी मन ही मन खुश होती थी और भगवान को धन्यवाद देती  कि संचिता जैसी लड़की हमारे घर की बहू बनी ।

  धीरे-धीरे 6 महीने गुजर गए  इधर कई दिनों से संचिता उखरी- उखरी  सी रहने लगी थी। आजकल किचन के काम में हाथ भी नहीं बटाती मालती जी बहू की तबीयत खराब समझ, किचन का सारा काम खुद ही कर लेती थीं ।

क्या बात है संचिता ।

तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना इतना सुनते ही संचिता बिना कुछ बोले वहां से चली गई ।

 मालती जी ने सोचा कि शायद मियां बीवी  के बीच कुछ अनबन हुई होगी ।

जब शैलेश घर आया तो बोली बेटा तुम दोनों में कुछ  कहा सुनी हुई हो तो जाकर संचिता को सॉरी बोल  दे ।

आजकल देख रही हूं उसका मूड  सही नहीं रहता ।

 मालती जी ने शैलेश को बोली।  मेरी तो कोई अनबन नहीं हुई उसके साथ ।मैं भी देख रहा हूं कि आजकल वह मुझसे सीधे मुंह बात नहीं करती मैं  आज बात करता हूं।

 शैलेश बोलकर वहां से चला गया।

” क्या बात है आजकल इतनी गुमसुम क्यों रहती हो ।पहले तो तुम इतनी खुश रहा करती थी क्या मुझसे कोई गलती हुई है ।”

इतने सुनते ही संचिता गुस्से से शैलेश पर  बरस पड़ी।

” गलती तो मुझसे हुई है कि  मैंने  तुम जैसे फटीचर के साथ शादी की”।

 क्या—- बोल रही हो तुम?

 जो तुम सुन रहे हो।

” तुम्हारी औकात ही क्या है “दिनभर ट्यूशन पढ़ाते हो और उतने ही पैसे से घर चलाते हो इतनी सी औकात में, मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ मैंने शुरू से ही एक अच्छे घर का सपना देखा था लेकिन यहां तो मेरे सपनों की वाट लग गई। 

 ” मेरी तो किस्मत फूट गई “तुमसे शादी करके संचिता चिल्लाते हुए बोली। 

“मैंने तो नहीं कहा , तुम्हारे पापा से कि मुझसे  ही शादी करने को। जब पता था कि मेरी कोई औकात नहीं तो शादी नहीं करनी चाहिए थी तुम्हें ।

 शैलेश गुस्से से बोला।

 हां हां यह तो तुम्हारी उस बुआ ने मेरे पापा को फसा दिया कि आज नहीं तो कल लड़के की सरकारी नौकरी तो लगनी ही लगनी है। लेकिन नौकरी तो छोड़ो यहां खाने के लिए भी खर्च जोड़ना मुश्किल हो जाता है।

  “हमने तुम्हारे पापा से कुछ भी नहीं छुपाया जो हम हैं वह उनको भी पता था।

 शैलेश ने समझाने के तौर पर कहा ।

“मैं अब अपने घर जा रही हूं”

लेकिन संचिता लोग क्या कहेंगे की शादी के कुछ ही महीने हुए और तुम इस घर से जा रही हो। 

 कम से कम ” मां का तो ख्याल” करो उन पर क्या बीतेगी।

 जो भी हो । इससे मुझे क्या । संचिता अपना सामान लेकर दरवाजे की तरफ चल पड़ी ।

शैलेश !संचिता ऐसा क्यों कर रही है तू उसे जाने से रोकता क्यों नहीं  खड़ा-खड़ा क्या  देख रहा है जा  उसे रोक। 

 मां —-। उसे मैं अब नहीं रोक सकता। जो मुझे मेरी औकात दिखा इस घर को छोड़कर चली गई।मैं कितना टॉर्चर हुआ । कहते हुए शैलेश की आंखें भर आई।

 जिस दिन उसे अपनी गलती का एहसास होगा तब वह खुद-ब-खुद आ जाएगी अब आप मुझे ज्यादा मजबूर ना करें ।

बेटे की ऐसी बात सुनकर अंबिका जी चुप रह गई  ।  

6 महीने गुजर गए संचिता को घर से गए। शैलेश हर दिन अपने आप को कोसता कि न जाने क्यों मैंने यह शादी की इधर संचित को भी अब अपनी गलती का एहसास होने लगा था

” पिताजी मुझे माफ कर दीजिए” मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी  अपना घर छोड़कर ।

चलिए मुझे अपनी गलती की माफी मांगनी है सबसे।

“तुझे समय रहते अपनी गलती का एहसास हो गया इससे बड़ी बात क्या हो सकती है “देर आए  दुरुस्त आए” कल ही हम चलते हैं!

” मुझे माफ कर दीजिए मांजी  मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया शैलेश मैं आपसे भी अपनी गलती की  माफी मांगती हूं आपसे दूर रहकर मुझे यह एहसास हुआ कि हमारा रिश्ता पैसे तथा धन दौलत से बढ़कर है जहां आपकी खुशी होगी वही मेरी खुशी कहते हुए संचिता शैलेश के पैर पर गिर पड़ी !

“उठो संचिता “सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए” तो उसे भूला नहीं कहते! कहते भी उसने संचिता को अपने हृदय से लगा लिया।

अरे शैलेश कहां खोया है तू।

अंबिका जी ने शैलेश से पूछा।

नहीं मां —!बस पिछली कुछ बातें मुझे याद आ गई!

  इतनी बड़ी खुशी आज सुनने को मिली है अब जा —जाकर संचिता को भी यह खुशखबरी सुना आ।

“क्या तुम्हारी जॉब लग गई! “

 कहते हुए संचिता शैलेश के गले से लिपट गई। कितनी खुशी की बात है आज हम लोगों के लिए

 संचिता आज इस बात से ज्यादा खुश थी कि उसका वैवाहिक जीवन में खटास होने से बच गया आज नौकरी हो जाने के बाद मेरा माफी मांगना बेकार जाता क्योंकि तब तक शैलेश के मन में मेरे प्रति एक लालची औरत की भावना आ जाती।  शायद वह मुझे अपनाते भी नहीं या उनके मन में मेरे प्रति

 जिंदगी भर की करवाहट बनी रहती।

” भगवान ने सही समय पर मेरी आंखें खोल दी”!

 तो दोस्तों औकात की बात करें तो कोई नहीं जानता कि जिंदगी कब कहां और किसे उसकी औकात दिखा जाए ।

अगर इंसान में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश हो तो  मंजिलें भी कदम चूमती है ।

 अगर आपको मेरी कहानी पसंद आए तो प्लीज लाइक और शेयर जरूर कीजिएगा।

 धन्यवाद।

 मनीषा सिंह

1 thought on “औकात – मनीषा सिंह : Moral stories in hindi”

  1. बहुत ही प्रेरणादायक कहानी इस शिक्षा के साथ कि हमको कभी भी अपने अपनों का उनकी औकात के बारे में कहकर तिरस्कार नहीं करना चाहिए नहीं तो कहीं ऐसा ना हो कि आपके तिरस्कार के कारण आपका रिश्ता ही टूट जाये 😊

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!