“बेटा! जरा फ्री हो तो … मेरे पांव दबा दो… बहुत दर्द है ।”
“हाँ -हाँ तुम्हारी तरह ही फालतू बैठे है… ना…दिनभर तुम्हारे पाँव दबाए… और कोई काम तो है नहीं हमें ।”
“रोज-रोज कहाँ कहते है… उमर हो गई है तो … कभी-कभार दर्द होता है तो कहते है…”सरिता रुवाँसी हो गयी और बोली।
“बस रोने लगी तुम…मैं भी थक जाती हूँ माँ… वर्क फ़्राम होम है तो क्या… काम तो है ना …”कहते हुवे तीन -चार हाथ पाँव में लगाये और फिर… आपने काम में लग गयी प्रीता ।
सरिता जी सोचने लगी…हम जब इस उम्र में थे तो… घर का सारा काम… बाहर का सारा काम…. बच्चों को घर में भी देखना… स्कूल की “पेरेंट्स-टीचर मीटिंग “ अटेंड करना.. बच्चों को की पढ़ाई पर ध्यान देना… सास-ससुर तो हमारे भी थे … उनका ख़याल रखना…पति और ससुर को तो अपने ऑफिस के काम के अलावा घर के कामों से कोई मतलब नहीं रहता था…
हम सास-बहू मिल कर सब करते थे।सास के पैरों में तेल लगाना…कभी-कभी नहाते समय आवाज़ देती…”बहुरिया… जरा.. पीठ ओर साबुन लगा कर पीठ रगड़ दे.. हाथ नहीं पहुंचता ।“ हम सब काम हँसते हुवे करते ।
और आज का समय है…ऑफिस का काम घर से है… और हम पूरा घर देखते हुवे बेटा-बहू और बेटी से कुछ भी नहीं कहते … बस पैंसठ बरस के हो गए है…तो गठिया की वजह से सर्दियों में पैर-हाथों में दर्द कभी अधिक हो जाता है ।घर के अन्य काम के लिए मेड है पर रसोई का काम हम ही करते और देखते है… किसको कब क्या खाना है… कब पीना है…
मैं नहीं थकती????
पेंशन पाती हूँ… पर खर्च करने से पहले दस बार सोचती हूँ…कि… कब किसको क्या ज़रूरत पड़ जाए…. घर की एक मेंबर हूँ… मेरी भी कुछ जिम्मेवारी है घर के खर्च में हाथ बँटाने की…
एक तो ये मंहगा शहर और रहन-सहन इतना मंहगा….अकेले भी नहीं रह सकती कि… अपने पुराने छोटे शहर में…।यहाँ तो जरा सी मालिश के लिए दो सौ रुपए माँगती है… यहाँ की नाऊन… अपने उस शहर में बीस से पचास में जो काम हो जाता था ।
लेकिन…. बार-बार अपने ही लोगों से अपमानित होने से अच्छा है ना … वो अपना छोटा सा शहर???
क्या हम जैसे सभी लोग उम्र को इस पड़ाव में अपनों से ऐसे ही #अपमान मिलता रहेगा या कभी आज की ये युवा पीढ़ी कभी समझेगी कि… तुम “वर्क फ़्राम होम “ करते हो तो हमने भी “वर्क-होम “ करते हुवे तुम्हारी परवरिश की है और उफ़्फ़ तक नहीं किया ।
लेखिका : संध्या सिन्हा