अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए – करुणा मालिक  : Moral Stories in Hindi

माँ !  सब अपने मामा के घर जाते हैं, हम क्यों नहीं जाते ……

अरे बेटा , तुम्हारे बाबूजी की छुट्टियाँ थोड़े ही होती हैं….. फिर वहाँ गाँव में टेलीविजन भी नहीं …. फ्रिज भी नहीं…. तुम्हें तो आइसक्रीम भी नहीं मिलेगी….दादी को इतनी गर्मी में खाना बनाना पड़ेगा…… बाबा को घुमाने कौन ले जाएगा?

समीर को याद है कि माँ किस तरह मामा के घर जाने की बात आने पर उसे और दोनों बहनों को बहका-फुसला देती थी …. उस समय भला कहाँ इतना दिमाग़ था कि जो बातें माँ कह रही है, उनका और मानवीय संबंधों का  क्या मोलतोल…..

धीरे-धीरे तीनों भाई-बहन मामा के घर जाने की बात भूल गए पर आज जब समीर की बेटी ने कहा—-

डैड ! इस बार….नो अदर आउटिंग …. हम मामा के घर जाएँगे तो समीर के दिल के किसी कोने में दबा प्रश्न, उत्तर जानने के लिए मचल उठा । वह उसी समय उठा और माँ के कमरे में जाकर बोला—-

माँ, आप कभी मामा के घर क्यों नहीं जाती …. क्या उस घर , उन गलियों, उन परिचितों को देखने – मिलने का मन नहीं करता…जहाँ आपका बचपन बीता ….

 नहीं….. मेरा मन नहीं करता…. बल्कि उस घर के लोगों की याद से ही सर शर्म से झुक जाता है….. कैसे परिचित ….. जो अंधे और गूँगे है….. कैसी गलियाँ….. जो मूक दर्शक…….

इतना कहते-कहते माँ रोने लगी । माँ की हालत देखकर समीर को भी पछतावा हुआ कि क्यूँ उसने पुराने किसी ज़ख़्म को कुरेदकर माँ को दुखी कर दिया …. उसने मन में सोच लिया कि अब वह माँ से उस बारे में कभी नहीं पूछेगा पर मानव स्वभाव होता है कि जिस बात को लेकर कोई संदेह उत्पन्न हो जाए वह उसे तलाश करके ही छोड़ता है ।

हुआ यूँ कि दो दिन बाद ही समीर की बड़ी मौसी और नकुल भैया उनके यहाँ आए । समीर की मौसी का  उनके यहाँ जाना-आना बहुत कम था बल्कि जब तक समीर के दादा-दादी जीवित रहे तब तक मौसी एक बार भी नहीं आई । 

अरे समीर! तेरी बेटी तो बड़ी प्यारी -प्यारी बातें करने लगी । तुम्हें भी कितने सालों बाद देखा है , मैं तो तरस ही गई थी अपनी बहन और बच्चों के साथ मिलने से ….. चलो बेटा, अब  कैसी शिकायत…… सब समय की बात है । 

आप शादी में क्यों नहीं आई ….. मैंने कितनी बार फ़ोन किया … ना ही मेरी शादी में आई और ना ही दीदी की । बस मौसा जी को भेज दिया एक दिन के लिए …… नकुल  भैया भी नहीं आए 

हाँ बेटा, मैं नहीं चाहती थी कि हमारी वजह से मेरी बहन को तुम्हारी दादी और बुआ के ताने सहने पड़े…. घर में कलह हो ।

कैसी कलह  ? मौसी,  अब जल्दी से जाने की बात मत करना … . जी भरकर रहना , दो-चार दिन बाद गुड़िया और रिया भी फ़रीदाबाद जा रहे हैं तो दोनों बहने शांति से इतने बरसों की कमी पूरी ……

हम दोनों के जीवन में कहाँ शांति ? कल फिर तेरे मामा के घर जाना है ….. मैं तो तेरी माँ को लेने आई हूँ…… नकुल के हक़ के लिए अब तो वह जा ही सकती है । पहले तो तुम्हारे दादा-दादी ने कभी इसे बोलने ही नहीं दिया ….. बेटा, अन्याय को सहन करना भी तो ग़लत है ।

नकुल  भैया का हक़ ? अन्याय ? किसने किया ? और क्यों ?

जीजी, बच्चों को आज तक कुछ नहीं पता ….फिर  जब माँ जी और बाबूजी ने सारे संबंध ख़त्म करने को कह दिया था तो बच्चों को बताने का कोई कारण ही नहीं था ।

वंदना ,  तू अपनी ज़बान की बड़ी पक्की निकली ।  सच्ची , तू सब कुछ अंदर ही अंदर सहन करती रही….

समीर, सुन बेटा…… तू हमेशा मामा के घर ना जाने का कारण पूछता था ना तो सुन ——

नकुल तेरी मौसी का नहीं, मामा का बेटा है । नकुल को जन्म देते ही उसकी माँ का देहान्त हो गया था । हम दोनों बहनों के कहने पर तेरे मामा ने तीन महीने के अंदर ही दूसरी शादी कर ली क्योंकि छोटे से नकुल को माँ की ज़रूरत थी और माता-पिता का साया हमारे सिर पर नहीं था ।  नकुल को माँ तो नहीं मिली ….

हाँ , बाप का हाथ भी सर से उठ गया । माया ने ऐसी माया फैलाई कि वे तो बच्चे को मारने की साज़िश रचने लगे , शुक्र था  कि जीजी उन दिनों वहीं थी । उस समय तुम भाई-बहनों का जन्म भी नहीं हुआ था । माया ने अपनी बीमारी का ढोंग करके नकुल को उसकी नानी के घर भेज दिया ।

जब दो सालों तक मामा-मामी ने नकुल की खोज खबर नहीं ली  तथा जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया तो  नकुल के नानाजी तुम्हारे बाबाजी के पास आए क्योंकि वे दूर के रिश्तेदार थे और उन्हें लगा कि बहन के ससुर को बीच में लेकर बात करेंगे तो ज़्यादा असर पड़ेगा । पर माया की संगत में तुम्हारा मामा पूरी तरह ढीठ हो चुका था । उसने संबंध और उम्र का लिहाज़ न करते हुए तुम्हारे बाबा से कहा —

देखो जी , रिश्तेदारी अपनी जगह है , मेरे किसी मामले में दख़लंदाज़ी देने वाले तुम कौन होते हो….. मैं तो उसे अपना बेटा नहीं मानता , कर लो जो करना हो । रिश्तेदारी रखनी हो रखो , नहीं तो जाओ पर मैं किसी का दबाव नहीं मानूँगा ।

बस बेटा …. जिस दिन बाबूजी ने घर आकर ये घटना सुनाई उसी दिन माँ जी ने ऐलान कर दिया—-

बहू … मायके और ससुराल में से एक को चुन ले …. यहाँ तक कि अपनी बहन से भी रिश्ता ख़त्म करना पड़ेगा….. फ़ोन तक नहीं करेगी …… या तो हमें मरा समझ लें या उन्हें…… और मेरा मायका उसी दिन ख़त्म हो गया पर हाँ…. तुम्हारे पापा ने मेरा हमेशा साथ दिया…. यहाँ तक कि अपने माता-पिता से छिपाकर कई सालों तक नकुल के लिए पैसे भी भेजे । 

उसके बाद जीजी नकुल को उसके ननिहाल से कुछ दिनों के लिए लाई थी  क्योंकि वहाँ उसकी नानी की मृत्यु हो गई थी ।  शायद कुदरत का ही निर्णय था कि तुम्हारे मौसाजी ने फिर नकुल को कभी कहीं नहीं भेजा ….. हो सकता है कि नकुल के लिए ही मौसी की गोद  सूनी रही ।

उसके कई सालों तक मुझे अपने भाई-बहन की कोई खबर नहीं मिली पर कुछ सालों बाद एक दिन तेरे मौसा तेरे पापा के पास पोस्ट ऑफिस में आए और उन्होंने दो हज़ार रुपये उधार देने की प्रार्थना की क्योंकि ख़राब आर्थिक स्थिति के चलते वे नकुल की कई महीनों की फ़ीस देने में असमर्थ रहे थे…..

उसके बाद तेरे पापा और मौसी-मौसा की बातचीत होने लगी । क़रीब चार पाँच साल तेरे पापा अपने हिसाब से पैसे भी भेजते रहे । बाद में नकुल को नौकरी मिल गई …. उसकी शादी भी हो गई और अब तो भगवान की दया से सब ठीक ही चल रहा था कि…….

ये तो दादी और बाबाजी की ग़लत बात थी कि मामाजी के ग़लत व्यवहार की सजा आपको दी ।

नहीं बेटा …. वे अपनी जगह सही थे क्योंकि वो ज़माना ही ऐसा था , जहाँ बड़ों की कही बात पत्थर की लकीर होती थी और रिश्तेदारी में भी बड़ों की बात का मान रखते थे ।  

पर मौसी ! अब क्या मामला  है…. आप दोनों मामाजी के घर क्यों जाना चाहती है ?

बेटा, बात यह है कि बाप- दादा की ज़मीन में भी उसने नकुल का हिस्सा नहीं रखा , अरे पिछले महीने नकुल और बहू कुलदेवता को पूजने गए थे तो वहीं चाचा के लड़के ने बताया कि माया ने सारी ज़मीन अपने दोनों लड़कों और अपने नाम लिखवा ली …… बता ! नकुल भी तो उसी घर का लड़का है, सबसे बड़ा है…..

अरे माया तो सौतेली माँ है पर हरीश तो उसका सगा बाप है …. उसे ज़रा भी शर्म नहीं आई….. समीर , मैंने सोच लिया कि नकुल को उसका हक़ दिलवा कर रहूँगी…. चाहे मुझे जो करना पड़े…… ज़्यादा चालाकी दिखाएगा तो मैं और वंदना भी अपने हक़ की बात करेंगे….. हैं तो हम भी उस घर की बेटियाँ । 

हाँ माँ , आपको मौसी का साथ ज़रूर देना चाहिए ।

अरे जीजी , ईश्वर की कृपा से सब कुछ है नकुल के पास …..फिर इतनी तो ज़मीन नहीं कि जिसके लिए मुक़दमे लड़े जाएँ …..

बात कम या ज़्यादा की नहीं, हक़ की है …… चाहे अपनी ज़मीन गाँव पंचायत को दान कर देगा ….. पर लेगा ज़रूर….. तू मुझे ये बता कि मेरा साथ देगी या …..

मौसी ! माँ आपका साथ ज़रूर देगी , पूरे तन-मन-धन के साथ। माँ! पहले मजबूरी रही होगी कि आपने ग़लत के लिए मुँह नहीं खोला पर अब आपको अन्याय के खिलाफ बोलना ही पड़ेगा ।

पहले दोनों बहनों ने अपने भाई-भाभी को समझाने की कोशिश की पर जब वे आँखें दिखाने लगे तो उन्होंने केस करवा दिया और गाँव के बड़े- बुजुर्गों तथा दूसरे लोगों से मिलकर, सिर्फ़ सच्चाई का साथ देने की प्रार्थना की ….. तारीख़ पर तारीख़ लगी  , अंत में सच्चाई की जीत हुई और नकुल को उसका हक़ मिल गया ।  

नकुल ने दोनों बुआ से सलाह- मशवरा करके अपने हिस्से की ज़मीन पर दो कमरों का छोटा सा रहने लायक़ मकान  बनवाया ताकि कम से कम साल भर में त्योहार पर वह दो चार दिन अपने पुरखों की ज़मीन पर रह सके , अपने बच्चों को अपने पैतृक गाँव से मिलवा सके और अपनी दोनों बुआ को उनका खोया मायका लौटा सके । 

करुणा मालिक 

# हक़

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