ज्योति- हे ! भगवान आज मेरे समीक्षा अधिकारी की परीक्षा का परिणाम आने वाला है, अबकी बार निराश मत होने देना, बहुत मेहनत की है।
सोनू ( ज्योति का भाई)- दीदी रोल नंबर बताओ रिजल्ट आ गया है।
ज्योति- सोनू, ये रहा रोल नंबर। तू ही देखना मुझे ख़ुद देखने में डर लग रहा है।
ज्योति भगवान के पास हाथ जोड़कर खड़ी सोनू के मुँह से सकारात्मक टिप्पणी का इंतज़ार करती है।
सोनू ( ज्योति का भाई)- दीदी आपका रोल नंबर लिस्ट में नहीं है। कटऑफ़ 168.75 गयी है और आपके 167.25 मार्क्स है।
ज्योति बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली जाती है।
रजनी (ज्योति की माँ) – ये कैसा अन्याय है भगवान। मेरी बिटिया ने अपने पापा के चले जाने के बाद पूरे घर की जिम्मेदारियों के बख़ूबी निभाया है साथ अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देती है फिर क्यों एक दो नंबर से रह जाती है। आपकी भी दिन रात पूजा करती है, वृहस्पतिवार का व्रत भी करती हूँ फिर उसकी नौकरी क्यों नहीं लगती ।
अगले दिन सुबह रोज़ की तरह ज्योति समय पर उठती है नहाकर पूजा के बाद मम्मी और भाई के लिये नाश्ता बनाकर पढ़ने बैठ जाती है।
सोनू ( ज्योति का भाई)- मम्मी चाची का फ़ोन आया है।
रजनी ( ज्योति की माँ) – और सविता कैसी हो बड़े दिन बाद याद किया ।
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सविता- हाँ जीजी। इधर समय नहीं मिला क्योंकि आरती (सविता की बेटी) के लिए लड़का ढूँढने में व्यस्त थे। जीजी लड़का तो बहुत अच्छा है पर अम्मा (ज्योति की दादी) कह रही है जब तब बड़ी छोरी (ज्योति) की शादी के बाद ही हम अपनी आरती की शादी कर सकते है, तो क्या आपने कोई रिश्ता ढूँढ़ा है ज्योति के लिये।
रजनी ( ज्योति की माँ) – नहीं सविता अभी तो भी ढूँढा। तुम तो जानती ही हो बिना बाप के लड़की के लिए रिश्ता ढूँढना कितना मुश्किल होता है।
सविता (ज्योति की चाची) – जल्दी करिए जीजी कही मेरी आरती का इतना अच्छा रिश्ता हाथ से ना चला जाए।
फ़ोन रखने के बाद रजनी ज्योति को बुलाकर चाची की कही सब बात बताती है। बात सुनकर ज्योति कहती है माँ मैं तब तक शादी नहीं करूँगी जब तक मेरी सरकारी नौकरी नहीं लगती। आप चाची को कह दीजिये की वो आरती की शादी करदे, मेरा इंतज़ार ना करे।
ये बात सुनकर ज्योति की चाची खुश हो जाती है और अपनी बेटी की धूमधाम से शादी करती है, पर शादी में ज्योति नहीं जाती है क्योंकि वहाँ सब उस से शादी ना करने का कारण पूछेंगे।
ज्योति फिर नये उत्साह के साथ पढ़ाई में लग जाती है। ज्योति 69000 शिक्षक भर्ती परीक्षा में 150 में से 112 अंक प्राप्त करती है और उसे लखीमपुर जनपद मिलता है , पर वो अपनी माँ और भाई को छोड़कर कैसे जाए।
ज्योति कहती है कैसा अन्याय करते हो भगवान। कैसी दुविधा में डाल दिया है अब मैं नौकरी और परिवार में किसे चूनू।
इसी बीच उसकी लेखाकार परीक्षा का परिणाम आ जाता है और उसे अपने मन मुताबिक़ अपना जनपद मिल जाता है उसके घर से कार्यालय की दूरी मात्र 15 मिनट की दूरी पर था। सैलरी ज़रूर शिक्षक की वेतन से कम थी पर वो अपने परिवार के साथ थी।
सरकारी नौकरी के बाद अब अच्छे अच्छे रिश्ते आने शुरू हो गए। कहते है जब भगवान देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है, ऐसा ही ज्योति के साथ हुआ। उसे अपने शहर में ही एक अच्छा सरकारी नौकरी का लड़का मिल गया। घर परिवार बहुत अच्छा है ज्योति हर रविवार अपने पति के साथ अपनी माँ और भाई से मिलने आती है।
सही कहा गया है भगवान के घर न्याय है अन्याय नहीं।
मेरी ये पहली कहानी है पसंद आये तो अपने क़ीमती शब्दों से हौसला बढ़ाइएगा। पसंद ना आए तो क्या कमी रही वो भी बताइएगा, क्योंकि आपके आलोचक आपके शुभचिंतक होते है।
धन्यवाद। श्री शिवाय नमस्तुभ्यम
आपका दिन शुभ हो।
रश्मि सिंह