मुस्कान और खुशी दोनों बहनें अपने पापा की धड़कने थीं। माँ की मौत के बाद पापा ने ही तो माँ-बाप दोनों बनकर अपनी बच्चियों की परवरिश की। मुस्कान शायद अपनी माँ को याद करती हो, पर खुशी के लिए तो माँ भी और पापा भी दोनों एक ही थे। तब खुशी छे साल की रही होगी और मुस्कान ग्यारह साल की। पिता सारी दुनिया को भूल चुके थे। याद थी तो अपनी बेटियाँ और अपना रोजगार। कैसे हर समय मेरी बेटी खुश रहे इसी प्लानिंग में रहते थे। कोई भी त्योहार हो या किसी का जन्मदिन बड़े ही जोर-शोर से मनाया जाता था। तीनों के दोस्त आते थे।
हाँ, पड़ोस की एक आँटी भी आती थी, जो शहीद फौजी की पत्नी थी। किरण आँटी शादी के चार साल बाद ही विधवा हो गयी थी। उनकी कोई संतान भी नहीं थी। मुस्कान और खुशी के साथ काफी घूल-मिल गयी थीं। हर त्योहार पर आकर रस्में, परम्पराएँ आदि मुस्कान और खुशी के साथ साझा करती थी।———
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बेटियों को अपनी माँ की कमी कभी महसूस ही नहीं होने दिए पिता। परिवार वाले और रिश्तेदारों ने काफी दबाव डाला था दूसरी शादी के लिए, लेकिन पिता ने यही कहा कि- मैंने इनकी माँ से वादा किया है कि इनपर सौतेली माँ की छाया नहीं पड़ने देंगे और समय गुजरता गया।——–
मुस्कान डाॅक्टर बन गयी और खुशी व्याख्याता।—-
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दोनों बेटियाँ पिता की सहमति से अपने-अपने पसंद के साथी का चुनाव कर घर बसा लिया। उनका घर तो बस गया, लेकिन पिता का घर खाली हो गया। बेटियों की खातिर पिता ने हमेशा अपने दर्द को सीने में दफन कर दिया था।
खुशी की शादी के अभी तीन महीने ही बीता था कि एक दिन पिता जी दोनों बेटियों से फोन पर बात किए।
” बेटी, मुझे तुम दोनों से कुछ कहना है।”
” हाँ पापा, कहिए।”
“तुम्हारी माँ से किया गया वादा तो मैंने निभा दिया। एक वादा मैं किरण से भी किया था। उसे पूरा करना चाहता हूँ।”
“पापा! तो क्या आप इस उम्र में शादी करने को सोच रहे हैं। लोग क्या कहेंगे? अपनी नहीं तो हमारी सोचिए। हमलोगों के ससुराल वाले क्या कहेंगे?आपने तो हमें शर्मसार कर दिया।”
कहकर बेटियों ने फोन रख दिया।
दोनों बहन एक ही शहर में रहने के कारण अक्सर मिला करती थी। पिता से बात करने के बाद दोनों बहनों को पापा की सोच पर शर्मिन्दगी महसूस होने लगी। तो क्या किरण आँटी से पापा का अफेयर पहले से साथ, जिसे हमलोगों को भनक तक नहीं लगी। हम ने तो उन्हें एक आदर्श पिता मान कर देव तुल्य बना दिया था। पर……..
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देर रात गयी फोन की घंटी घनघना उठी। मुस्कान ने फोन उठाया-
” मैं किरण बोल रही हूँ।”
” अब बोलने के लिए बाकि ही क्या रह गया जो इतनी रात गये…”
” नहीं—नहीं मुस्कान गलत समझ रही हो। तुम्हारे पापा को माइनर हार्ट अटैक आया है। तुम लोगों ने तो सिर्फ अपने बारे में सोचा और एक पल में पापा को नायक से खलनायक बना दिया। कई बार मेरे प्रणय निवेदन को उन्होंने ठुकरा दिया, क्यों कि तुम दोनों को सौतेली माँ की छाया से दूर रख सकें। उनका कहना था कि जब-तक मेरी बेटियाँ अपना घर नहीं बसा लेती तब-तक यदि तुम इंतजार कर सकती हो तो करो और आज तुमलोग——-
घर में अकेले हैं, आज कुछ हो जाता तो….”
हिचकियाँ लेकर किरण आँटी रोने लगी। मुस्कान तुरत खुशी को सूचित कर अस्पताल पहुँची। पापा की हालत देख उसकी चीख निकल गयी।—–
” पापा! हमने आपके साथ गलत व्यवहार किया। हमें माफ कर दीजिए। “
नहीं बेटा, तुम लोगों ने ठीक ही कहा। मैं ही भूल गया था कि भले ही मैं समाज की परवाह न करूँ, पर सबको तो नहीं रोक सकता। मेरी बेटियों पर मेरी वजह से ऊँगली उठे, ये मैं बर्दास्त नहीं कर सकता।”
और तीनों ने खूब आँसू बहाए।——–
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“खुशी, तुम किरण आँटी को तैयार कर सीधे होटल में आ जाना। मैंने सारी व्यवस्था कर दिया है।”
दो महीने बाद ही पापा का जन्मदिन आया। बेटियों ने इस बार होटल में जन्मदिन मनाने का फैसला किया। एक बड़े से पार्टी का आयोजन हुआ था। सारे दोस्त और रिस्तेदार आये थे, लेकिन पापा इन सभी आयोजनों से बेखबर थे। वो तो सिर्फ जन्मदिन का उत्सव जानते थे, जो हमेशा होता था। हाँ ,इस बार घर पर न होकर होटल में है……
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जैसे ही मुस्कान पापा को लेकर हाॅल में आई तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया गया। इधर खुशी भी किरण आँटी को दुल्हन के लिहाज में सामने खड़ा कर दिया।
“पापा, अब हम सब मिलकर आपके दूसरे वादा को पूरा करेंगे। हमारी तरफ से यह आपके जन्मदिन का अनमोल तोफा रहा।”
चारों की आँखों में खुशी के आँसू थे।
पुष्पा पाण्डेय
राँची,झारखंड।