अफ़सर बिटिया – मुकेश कुमार

अरे वो  दिव्या सुनाई नहीं दे रहा है क्या? तुम्हारे बाबूजी कब से घर पर आए हुए हैं उनके लिए पानी तो लेकर आ, दिव्या ने छत से आवाज़ लगाई जी नई माँ आ रही हूं। दरअसल  दिव्या की माँ का देहांत बचपन में ही हो गया था, घर में देखभाल करने वाला कोई नहीं था 

इस वजह से दिव्या के बाबूजी प्रताप ने दूसरी शादी कर ली थी। प्रताप ने तो दूसरी शादी दिव्या की देखभाल करने के लिए की थी।  लेकिन हुआ इसका उल्टा उसकी सौतेली माँ ललिता ने बचपन से ही दिव्या से घर के सारे काम करवाती रहती थी और स्वयं आस-पास के घरों में जाकर पोछा बर्तन करती थी।

धीरे धीरे समय गुजरता रहा  और  ललिता के भी चार बच्चे और हो गए थे।  प्रताप की कमाई बहुत ज्यादा नहीं थी कि इतना बड़ा परिवार आराम से चल सके क्योंकि वह एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था। तंख्वाह भी कम थी इस वजह से ललिता को भी काम पर जाना पड़ता था।

इस महंगाई के जमाने में एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी से घर चलाना बहुत मुश्किल हो रहा था।  दिव्या को शुरू से ही पढ़ाई करने का बहुत ही शौक था तो वह जैसे तैसे करके ग्रेजुएशन फाइनल ईयर तक पहुंची गई थी।

थोड़ी देर बाद दिव्या ने पानी का गिलास लेकर अपने बाबूजी को देने आई पानी का ग्लास देकर दिव्या वापस छत के ऊपर पढ़ाई करने चली गई। क्योंकि थोड़े दिनों बाद ही उसका फाइनल ग्रेजुएशन का एग्जाम था नीचे कमरा एक ही था तो उसको पढ़ाई करने में डिस्टर्ब होता था 

इस वजह से वह छत पर ही जाकर पढ़ा करती थी। उसने  छत पर ही एक छोटी सी झोपड़ी जैसी बना रखी थी उसी में दिव्या पढ़ती रहती थी। दिव्या के जाते ही उसकी सौतेली मां ललिता ने उसके बाबूजी प्रताप से दिव्या की शादी की बात छेड़ दी।   

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“दिव्या की शादी की उम्र होने को आई और तुम्हें बिल्कुल भी चिंता ही नहीं है अगर इसकी शादी नहीं हुई जल्दी से तो हमारे बच्चों की कब होगी क्या उम्र बीत जाएगी तब करोगे शादी।”  प्रताप ने ललिता की बात काटते हुए बोला, “अरे भाग्यवान अभी दिव्या की उम्र ही क्या हुई है उसे ग्रेजुएशन तो पढ़ लेने दे।”



ललिता ने गुस्से में प्रताप से कहा, “देखो जी हम कोई राजा महाराजा नहीं है और ना ही हमारे पास इतना पैसा है कि हम दिव्या को आगे पढ़ा सकें दिव्या जितना  पढ़ेगी उसके लिए हमें लड़का ढूंढने में उतना ही मुश्किल होगा।”

मैं तो कहती हूं मेरी भाभी का एक भाई है कुछ महीने पहले ही उसकी पत्नी की  बीमारी की वजह से मौत हो गई है और वह हमारी दिव्या से शादी करने को तैयार हैं और दहेज मे एक रुपए भी नहीं मांग रहे हैं इससे अच्छा लड़का कहाँ मिलेगा।

यह सुनते ही प्रताप, ललिता पर गुस्सा हो गए बोले, “तुम्हें क्या लगता है कि मैं अपनी बेटी की शादी अपनी बेटी के दुगने उम्र के लड़के से करूंगा और वह भी शादीशुदा मैं भले ही गरीब लड़के से शादी कर दूंगा लेकिन अपनी बेटी की शादी दुगनी  उम्र के लड़के से नहीं करूंगा।”

ललिता बोली घर में एक रुपया नहीं और बातें बाप- बेटी की हमेशा बड़ी-बड़ी होती रहती हैं । मैं भी देखती हूं अपनी बेटी की शादी कहां करते हो । प्रताप अपनी बेटी दिव्या से बहुत प्यार करता था उसको अपनी तनख्वाह में से कुछ पैसे चुपके से पढ़ने के लिए दे देता था और उसको कहता  था 

यह बात ललिता से नहीं बताना कि मैंने तुम्हें पैसे दिया है। प्रताप अपनी बेटी को पढ़ने देना चाहता था। अपनी बेटी के पंखों में पर लगा देना चाहता था आखिर उसने दूसरी शादी भी तो दिव्या की देखभाल के लिए ही किया था।

दिव्या की सौतेली मां ललिता ने दिव्या की शादी एक ऐसे लड़के से तय कर दी जो घर से तो अमीर था लेकिन एक पैर का विकलांग था  और वह दहेज लेने के बदले दिव्या से  शादी करने के लिए ही  पैसे दे रहे थे। ललिता इस शादी के लिए प्रताप को भी मना ली थी

प्रताप ने  भी सोचा कि आखिर बेटी की उम्र हो ही गई है तो शादी करने में क्या बुराई है लड़का अमीर है थोड़ा विकलांग है तो क्या हुआ बेटी तो ठीक-ठाक है घर चला लेगी और जो लड़के वाले पैसे देंगे उस पैसे से अपनी दूसरी बेटी की शादी कर देगा।

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ललिता ने अपने बक्से से एक साड़ी निकालते हुए दिव्या को दिया और बोली ले पहन के तैयार हो जा।  तुम्हें देखने के लिए लड़के वाले आ रहे हैं और हां देख उनके सामने कुछ भी नखरे मत करना और चुपचाप शादी के लिए हां बोल देना।

लेकिन दिव्या शादी करने के लिए राजी नहीं थी। उसने शादी करने से  साफ मना कर दिया था वो बोली कि मैं ग्रेजुएशन कंप्लीट करने के बाद दिल्ली आईएएस की कोचिंग करने के लिए जाऊंगी और आईएएस की तैयारी करूंगी, क्योंकि मेरा सपना है 

एक आईएएस बनना और जब तक मैं अपना सपना पूरा नहीं करूंगी तब तक मैं शादी के बारे में सोच भी नहीं सकती। यह सुन ललिता ने दिव्या को थप्पड़ पर थप्पड़ जड़ दिया था।

कमाना धमाना कुछ नहीं और सपने इतने बड़े कि पूछो मत, दिल्ली जाएगी, कोचिंग करने, कौन देगा तुम्हें पैसे दिल्ली जाने के लिए और वहां रहने के लिए मैं तुम्हें एक रुपये  भी नहीं देने वाली और ना ही तुम्हारे बाबूजी से देने दूंगी इतनी मुश्किल से तो घर चल पाता है और यह महारानी जाएंगी दिल्ली कोचिंग करने।

दिव्या बोली, “मां कुछ भी हो मैं तो दिल्ली जाऊंगी और वहां जाकर मैं ट्यूशन पढ़ाऊंगी या कोई पार्ट टाइम जॉब कर लूंगी लेकिन मुझे आईएएस बनने से कोई नहीं रोक सकता है।  मैंने ग्रेजुएशन इसलिए नहीं की इतनी जल्दी शादी के बंधन में बंध कर अपनी जीवन तबाह कर लूंगी।

ललिता बहुत परेशान हो गई कि लड़के वाले को कैसे वह मना करेगी कितनी बदनामी होगी।  तभी दिव्या के पिता प्रताप भी शोरगुल सुनकर वहां पर आ गए थे ललिता ने सारी बात प्रताप से बताई,  “देख लो तुम्हारी बेटी का मन कितना बढ़ गया है 

कितना अच्छा रिश्ता आया है और यह महारानी शादी करने से मना कर रही है। यह दिल्ली जाएगी, आईएएस बनना है गुड्डे-गुड़िया का  खेल समझ रही है। प्रताप ने भी दिव्या को समझाया कि बेटी जहां तक मेरी औकात थी मैंने तुम्हें पढ़ाया अब मेरी औकात नहीं है



कि मैं तुझे आगे पढ़ा सकूं और तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम शादी कर लो बहुत सुखी रहोगी। दिव्या ने अपने पिता की एक भी नहीं सुनी उसने साफ मना कर दी चाहे जो भी हो मैं अभी शादी नहीं करूंगी।  प्रताप को भी अपनी बेटी के जिद के आगे झुकना पड़ा।

कुछ दिनों बाद दिव्या के ग्रेजुएशन फाइनल का रिजल्ट आ गया था दिव्या ने पूरे कॉलेज में टॉप किया  था ।  अब बारी थी दिल्ली जाने की लेकिन उसके पास एक भी रुपए नहीं थे और ना ही ललिता और उसके पिता प्रताप से कुछ रुपए मिलने की उम्मीद थी दिव्या परेशान थी कि आखिर वह  करें तो क्या करें।

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दिव्या की एक सहेली  भी दिल्ली में IAS की तैयारी करती थी उसने उस से दिल्ली के खर्चे के बारे में बात की तो उसने बताया कि देखो दिव्या यहां पर हर तरह के बच्चे  रहते हैं और जैसा जिसका बजट होता है उस तरह का यहां पर रूम और हॉस्टल भी मिल जाता है।

उससे पूछा कि वहां पर क्या मैं ट्यूशन पढ़ाना चाहूंगी तो ट्यूशन मिल सकता है उसकी सहेली  ने बताया हां हां क्यों नहीं बहुत सारे स्टूडेंट यहां ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं दिव्या को एक हौसला मिल गया था।

दिव्या के पास अपनी मां की निशानी के तौर पर उनकी एक सोने की अंगूठी थी जो  बहुत संभाल के रखी हुई थी उसने उसे बेचने का निश्चय किया और उसी पैसे से दिल्ली जाने के  बारे में सोचा अंगूठी ₹10000 में बिका और पैसे लेकर अगले ही दिन दिल्ली के लिए रवाना हो गई।

स्टेशन छोड़ने उसके पिता प्रताप साथ आए थे।  ट्रेन आने से पहले उन्होंने अपने बेटी से कहा, “बेटी मैं मजबूर हूं मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पा रहा हूं तुम ही सोचो एक दस हजार  कमाने वाला इंसान कितना मुश्किल से तो घर चला पाता है। 

मैं तुम्हें दिल्ली कैसे पढ़ाने भेज सकता था लेकिन मुझसे जितना भी बन सकेगा मैं तुम्हें भेज  दिया करूंगा।वो  बोली कि पापा आप चिंता मत करो मैं सब मैनेज कर लूंगी अब मैं वापस तभी आऊंगी जब मैं आई ए एस बन जाऊंगी।

कानपुर से दिल्ली मात्र 6 घंटा ही लगता है तो अगले दिन दिव्या दिल्ली पहुंच चुकी थी। वह अपनी सहेली के पीजी में पहुंची उसके लिए उसकी सहेली  ने   मुखर्जी नगर के बगल में ही एक सस्ता सा रूम ढूंढ लिया था वह कुछ देर बाद अपने कमरे में पहुंच गई थी और जो जरूरत का सामान था 

वह भी उसकी सहेली  ने खरीदवा दिया था और वो बोली  कि दिव्या तुम्हें इसके पैसे देने की जरूरत नहीं है तुम जब आई एस बन जाओगी मेरे पैसे वापस कर देना।  दिव्या ने अपनी सहेली प्रिया को बहुत-बहुत धन्यवाद कहा । प्रिया ने भी दिव्या से कहा  कि तुम्हें किसी भी चीज की



जरूरत हो तो तुम मुझसे बेहिचक बोल सकती हो जितना हो सकेगा मैं तुम्हारी हेल्प करूंगी और हां मैं बहुत जल्दी ही तुम्हें ट्यूशन भी दिलवा दूंगी मैंने एक आंटी से बात करी है तुम्हारी ट्यूशन के लिए फिर तुम्हें रहने मे कोई भी दिक्कत नहीं होगा।  

दिव्या अपने कमरे के बालकनी में खड़ी थी तभी नीचे शोरगुल  सुनाई दिया।  मकान मालकिन ने अपने बच्चे को डंडे से पीट रही थी और बोल रही थी कि तू इस बार फिर  फेल हो गया अब मैं तुम्हारी पढ़ाई को कंटिन्यू नहीं करूंगी।

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दिव्या नीचे उतरी और बच्चे को पकड़ लिया और उसने बोला इस बार अपने बच्चों को मुझे पढ़ाने दीजिए मैं आपको गारंटी देती हूं यहजरूर पास  हो जाएगा। आंटी बोली, “रहने दे बेटी मैंने इसे कितने सारे ट्यूशन लगाए जब यह खुद ही नहीं पढ़ेगा तो पढ़ाने वाले क्या कर  पाएगा।

दिव्या बोली कि आंटी मुझे एक मौका तो दीजिए।  दिव्या उसको पढ़ाने लगी धीरे-धीरे उस लड़के की पढ़ाई में भी सुधार होने लगा वह भी मन लगाकर पढ़ने लगा मकान मालकिन को भी विश्वास हो गया इस बार हमारा बेटा पास हो जाएगा क्योंकि अब वह  बाहर  खेलने  भी नहीं जाता था 

पढ़ाई में उसका ध्यान लगने लगा था।एक दिन मकान मालिक ने कहा  जब तक तुम हमारे बेटे को पढ़ाओगी तब तक तुम्हारे रूम का किराया माफ।दिव्या के लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती थी  अब वह यही सोच रही थी

कि एक और ट्यूशन का इंतजाम हो जाएगा तो उसे रहने खाने का भी टेंशन खत्म हो जाएगा क्योंकि वह जो पैसे रखी हुई थी उससे वह कोचिंग में एडमिशन लेना चाहती थी। अगले दिन अपनी सहेली प्रिया के साथ वह कई सारी कोचिंग में बात करने गई लेकिन सब जगह फ़ीस  इतना ज्यादा थी। 

दिव्या परेशान हो गई थी दिव्या एक कोचिंग के रिसेप्शन पर बैठी हुई थी और सोच रही थी वह यहां पर कोई पार्ट टाइम जॉब कर लेगी और पैसे इकट्ठा करके तब जाकर कोचिंग में एडमिशन करवाएगी।  उसको सोचते हुए देख उसी कोचिंग के एक टीचर ने दिव्या से पूछा बेटी क्यों इतना परेशान हो।  

दिव्या ने अपनी सारी कहानी उसको बता दी.  किस्मत से वह आदमी उस कोचिंग का डायरेक्टर था। उसने दिव्या का सर्टिफिकेट देखा उसने कहा. “अरे तुम तो अपने कॉलेज की टॉपर हो। देखो अगर तुम्हारे पास पैसे की कमी है



तो हमारी कोचिंग संस्था हर साल एक स्कोलरशिप एग्जाम करवाती है जो भी उस एग्जाम को क्वालीफाई करता है उस स्टूडेंट्स  की हम आधा फ़ीस माफ कर देते हैं।” यह दिव्या के लिए एक सुनहरा मौका था दिव्या ने वह स्कॉलरशिप फॉर्म ली और भर के जमा करा दिया।

लेकिन डायरेक्टर ने बोला कि दिव्या आईएएस बनना इतना आसान नहीं है अभी तो तुम्हारा मुश्किल दौर शुरू हुआ है । दिव्या बोली सर जिसे आप मुश्किल कहते हैं वही मेरी जीने की सबसे बड़ी वजह है

अगर मेरी लाइफ में कठिनाइयां नहीं होती तो मैं कभी अपने आप को पहचान नहीं पाती.  जब भी कोई चैलेंज मेरे सामने आता है और वह मुझसे कहता है कि तुम यह नहीं कर सकती तब वह मेरे लिए और मोटिवेशन लेकर आता है 

और मैं अपने आप को उत्साहित कर लेती हूं कि मुझे किसी भी हाल में यह काम को करना है और मैं उससे मुकाबला करती हूं और आखिर में जीत मेरी होती है। दिव्या के आत्मविश्वास पर डायरेक्टर ने ताली बजा दिया।

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उसने भरोसा दिया कि मैं तुम्हें आईएएस बनने में बहुत हेल्प करूंगा क्योंकि मुझे पता है तुम जरूर आइ ए एस  क्वालिफाइ करोगी क्योंकि आईएएस बनने के लिए पढ़ाई से ज्यादा अपने आप पर भरोसा होना ज्यादा जरूरी है और वह तुम्हारे में है।

दिव्या का कोचिंग में एडमिशन हो गया था।   डायरेक्टर साहब उसकी पढ़ाई में बहुत हेल्प करते थे कुछ दिनों के बाद IAS प्री का फॉर्म निकला डायरेक्टर साहब तो उसे अगले साल देने के लिए कह रहे थे लेकिन दिव्या नहीं मानी और उसने फॉर्म फिलअप कर दी।  

उसने पहले अवसर में ही प्री मेंस निकाल लिया लेकिन इंटरव्यू पास न हो सकी अगले दुगनी एनर्जी से अपनी कमियो को दूर कर मेहनत किया इस बार  इंटरव्यू भी  क्वालीफाई कर लिया था। अब दिव्या आई एस बन चुकी थी। दिव्या ने फोन करके यह खुशखबरी सबसे पहले उसने अपने पिता प्रताप को दिया उसके पिता को खुशी का ठिकाना ना रहा।



घर आकर प्रताप ने अपनी दूसरी बीवी ललिता से बोला देख लिया ललिता मैंने बोला था ना कि मेरी बेटी दिव्या जरूर कुछ ना कुछ बड़ा करेगी क्योंकि जिनके सोच बड़े होते हैं सपने बड़े होते हैं वह अपने जीवन में कुछ न कुछ बड़ा तो करते ही हैं, लेकिन उसे करने के लिए धैर्य होना चाहिए और वह मेरी बेटी में था।

ट्रेनिंग के बाद दिव्या की पोस्टिंग केरल में हो गई थी।  वह अपने सभी भाई बहनों से भी उतना ही प्यार करती थी उन्हें कभी भी महसूस नहीं होने देती थी कि वह उसकी सौतेली बहन है अपने मां-बाप को भी उसने केरल ही बुला लिया। 

दिव्या ने शादी नहीं करने का सोच लिया था वो अपने भाई बहन को अपने जैसा ही बनाना चाह रही थी उन सब का एडमिशन एक अच्छे स्कूल में करवा दी थी। दोस्तों इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है

कि अगर आपके अंदर आत्मविश्वास हिम्मत और धैर्य हो तो आप बड़े से बड़ा कार्य भी चुटकियों में कर सकते हैं।  आज जितने भी महान लोग आप देखते हैं उनके पास भी बहुत सारी परेशानियां और कठिनाइयां आई थी 

लेकिन उन्होंने उसको  अपने राह मे रोड़ा नहीं बल्कि अपना हिम्मत बनाया था और और दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था ।

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