आज पति को गुजरे लगभग बीस दिन बीत चुके थे। नमिता दीवार पर लगे पति के तस्वीर को सुनी निगाहों से निहार रही थी। उसके दिल दिमाग में झंझावात सी चल रही थी। उसने उन्हें बचाने के लिए किस- किस को फोन लगाया था नमिता को याद नहीं!!
कुछ बहुत करीबी लोगों ने जिनके वक्त पड़ने पर उसके पति ने हर संभव मदद की थी उन्होंने तो फोन रिसीव ही नहीं किया।
हारकर उसने पति के मोबाइल से किनको किनको नंबर डायल किये थे यह भी दिमाग से निकल चुका था।
उसे तो होश ही नहीं था कि कब वह हॉस्पिटल से निर्जीव पति के साथ घर आयी और कैसे उनकी तेरहवीं और बाकी बचे क्रिया -कर्म हुए थे।
पति की सरकारी नौकरी थी पर कमाई बहुत ज्यादा नहीं थी । उसपर चार- चार लोगों खर्चा जैसे -तैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई चल रही थी ।इन सब के अलावे घर का लोन भी तो था जिसे प्रत्येक महीना देना पड़ता था। पैसे बचते ही कहां थे जो किसी बड़े अनहोनी के लिए बचत हो पाते!
अचानक की घटना ने सब तबाह कर के रख दिया। अस्पताल में तीन दिनों के खर्चे ने उसके बचाये सारे बचत को ध्वस्त कर दिया। नमिता ने अपने मन को समझाया कि चाहे जो भी हो पति के प्राण बच जाये चाहे जहां से भी उसे भीख मांगना पड़े। पर सब व्यर्थ…..।
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अनहोनी की खबर सुनकर कुछ ससुराल वाले और कुछ मायके वाले दौड़े -दौड़े आये थे। शायद उन्हीं अपने लोगों के सहयोग से सारा कार्यक्रम हुआ था। नमिता के पास उतनी हिम्मत नहीं थी कि वह किसी से भी इसकी चर्चा करती किसने किया। धीरे-धीरे सभी अपने कहलाने वाले रिश्तेदार दोनों बच्चों को और उसे ढाढस बांधते हुए अकेले छोड़कर चले गए।
नमिता के माता-पिता पहले ही स्वर्गवासी हो चुके थे। शायद वो लोग रहते तो बेटी और उसके बच्चों को यूँ अकेले भंवर में डूबते हुए छोड़कर नहीं जाते। ससुराल वाले पूरे समय इसी टोह में लगे रहे कि जाने से पहले नमिता के लिए पति ने क्या -क्या बटोर कर रक्खा है।
शाम हो चुकी थी पूरे घर में अंधियारा छाने लगा था और उस अंधियारे में नमिता लोगों द्वारा पहनाई गई सफेद सारी में किसी साये की तरह दिख रही थी। बच्चे डर न जाएं इसलिये उसने हिम्मत बटोरी और अपने चौदह वर्षीय बेटे और दस वर्षीय बेटी को आवाज लगा कर पास बुलाया। दोनों भाई -बहन एक दूसरे का हाथ पकड़ निरीह पखेरू की तरह माँ के पास आकर खड़े हो गए । नमिता ने दोनों बच्चों को पिछले पंद्रह दिनों से ठीक से देखा नहीं था। वह उन्हें अपने कलेजे से लगाते हुए वह दहाड़ मारकर रोने लगी।
रोने की आवाज सुन बगल के घर से कई महिलाएं आ गई ।एक बुजुर्ग महिला ने नमिता और बच्चों को चुप कराया। कुछ दुनियादारी की बातें समझाकर अंधेरे घर में एक मोमबत्ती जलाया और समझा बुझा कर चली गई।
बच्चे सुनी आँखों से माँ को देख रहे थे। वे भी इस घटना के लिए तैयार नहीं थे। वे दोनों तो सुबह पिता से मिलकर ही स्कूल के लिए निकले थे उन्हें क्या पता था कि यह उनकी अंतिम भेंट थी। पड़ोसियों ने उन्हें बताया था कि उन्हें हर्ट अटैक आया था। उन लोगों ने उन्हें हॉस्पिटल ले जाकर पड़ोसी धर्म निभाया था पर डॉक्टर उन्हें नहीं बचा पाए। सारी कोशिशें व्यर्थ गई।
पिता की छाया और माँ की खुशी दोनों छीन गयी थी। दोनों बच्चे बहुत देर तक माँ की आंखों से आंसू पोंछते रहे। बेटे ने हिचकते हुए कहा-” माँ एक बड़ी सी गाड़ी में एक ताऊ जी आये थे उन्होंने ही सारे पैसे खर्च किये और जाते समय यह लिफाफा देकर कहा कि माँ को दे देना। ”
नमिता ने कांपती हाथों से लिफाफे को खोला जिसमें सौ रुपये के नोटों का एक बंडल था और एक चिट्ठी थी। नमिता की धड़कन तेज हो गई इसलिये नहीं कि वह कौन देवता बनकर आया था बल्कि इसलिए कि इतने रिश्तेदारों की भीड़ जमा थी और किसी तीसरे ने आकर सब कुछ किया। नमिता की आँखों से बहते हुए आंसू एकबारगी थम गये। दुनियां की कड़वी सच्चाई ने उसके कलेजे में पिघलते दर्द को सूखाकर मरूस्थल बना दिया। उसने दोनों बच्चों को एक बार फिर से कलेजे में समेट लिया।
नमिता को बहुत कुछ समझ में आ गया था । उसने हिम्मत बटोरी उठकर रसोईघर में गई दोनों बच्चों को बचा खुचा हुआ खाना खिला दिया और खुद पानी पीकर दोनों बच्चों के पास ही लेट गई। थके -हारे बच्चे लेटते ही सो गये ।लेकिन नमिता के मष्तिष्क में वह लिफाफा और उसमें नोटों का बंडल हथौड़े की तरह प्रहार कर रहे थे। उसने धीरे से लिफाफे को खोला और चिट्ठी निकाल कर पढ़ने लगी। उसमें
लिखा था-” बहन!
शायद तुम मुझे नहीं जानती। मैं और निशांत बचपन के मित्र थे। वह पढ़ने में अव्वल था। उसने हर तरह से मेरी बहुत मदद की थी। बड़े होकर उसे नौकरी मिली और वह दूसरे शहर चला गया और मैं राजनीति के चक्कर में इसी शहर में रह गया। बाद में मैंने बहुत कोशिश की थी कि वह मेरी पहुंच का फायदा उठाकर अपने विभाग में बड़े पोस्ट पर पहुंच जाए । पर वह बचपन से ही सिद्धान्तवादी और खुद्दार था। उसने साफ मना कर दिया। जब से मुझे पता चला था कि वह फिर इसी शहर में आ गया है। मैं उससे मिलने के लिए बेचैन था । परंतु देखो ना ,काल ने हम दोनों को मिलने नहीं दिया। खैर ,जो होना था वह ऊपर वाले की मर्जी थी। बस मैं यही दुआ करूंगा कि मेरी श्रध्दांजलि किसी भी तरह उस तक पहुंच जाए। तभी मेरी आत्मा मुझे माफ करेगी। इसीलिए मैंने जो कुछ भी किया वह हवन में तिल डालने के बराबर है। तुम अन्यथा मत लेना और जब भी जरूरत हो निःसंकोच इस भाई को याद करना।
ढेरों आशीष!”
एकबारगी नमिता की आँखों से आंसुओ की धारा फुट पड़ी। कौन है जो इस निर्दयी संसार में उसके लिए धरती पर उतर आया है द्रौपदी का कृष्ण बनकर!”
झरते- सूखते बहते आंसुओ के साथ पता नहीं कब उसकी आंखे नींद की आगोश में समा गईं। ”
सुबह दस बजे बेटे ने उसे झकझोर कर जगाया उसके हाथ में वही चिट्ठी थी जिसे नमिता पढ़ते हुए सो गई थी। उसने बड़ी मासूमियत से कहा-” माँ तुम ठीक हो ना! तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न!”
*”दामिनी का दम”* (भाग-30) – श्याम कुंवर भारती : Moral stories in hindi
नमिता ने बेटे को सहलाते हुए कहा कि वह बिल्कुल ठीक है। तब बेटे ने बड़ी मासूमियत से कहा-“माँ
वह ताऊ जी बहुत अच्छे हैं इन्होंने पिताजी के क्रिया- कर्म के सारे खर्चे उठाये किसी को भी एक पैसा खर्च नहीं करने दिया। अब हमें कोई दिक्कत नहीं होगी पैसों की जब भी जरूरत होगी हम उनसे पैसे मांग लेंगे।”
बेटे की बातों से नमिता सहम गई। उसने तुरंत ही टोका- “बेटा” यह तुम्हारे पिताजी के अच्छे मित्र हैं। इसलिए उन्होंने हमारी मदद की है। लेकिन हम ऐसे ही किसी का अहसान नहीं ले सकते क्योंकि इससे तुम्हारे पिता की आत्मा को दुःख पहुंचेगा।”
जिस मित्र का सहारा उन्होंने जीते जी नहीं लिया उसे हम उनके जाने के बाद कैसे ले सकते हैं। इस लिफाफे को लाओ मैं सम्भाल कर रख दूँ बाद में जाकर लौटा दूँगी। और दूसरी बात यह कि भले ही किसी रिश्तेदार ने कुछ नहीं किया लेकिन मैं उनके मित्र के सामने लाचार नहीं दिखना चाहती। आज वो चुप हैं कल को तरह तरह की कहानियां बनाएंगे। ”
बेटे ने रुपये से भरा लिफाफा माँ की ओर बढ़ा दिया। नमिता ने उसके बालों को सहलाया और बोली-” बेटा कोई चिंता नहीं, पिता की कमी तो मैं नहीं पूरा कर सकती पर मैं तुम्हारी माँ हूँ ना !तुम दोनों भाई -बहन के लिए कुछ भी करूंगी पर किसी का अहसान नहीं लूँगी। बेटा माँ से लिपट कर बोला-“ठीक है माँ पर तुम….कभी रोना ….नहीं!
बेटे की बातों ने नमिता के घाव को फिर से हरा कर दिया वह बच्चों की तरह बेटे से लिपट फफक कर रो पड़ी।
जिले के मुख्यालय में अनेकों बड़ी- बड़ी और कीमती गाड़ियां लगी हुईं थीं। नमिता एक एक पग बढ़ाती हुई उसके ऑफिस के मुख्य दरवाजे तक पहुंची। उसे देखते ही दो बंदूकधारी लपक कर उसके पास आये। आते ही उन्होंने नमिता के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
“आप कौन हैं?”
“आप कहाँ से आईं हैं?”
“क्या काम है?”
“आपको किस से मिलना हैं?”
पहले तो नमिता थोड़ी घबराई पर बाद में खुद को संयत करते हुए अपने हाथ में रखे कागज को बढ़ा दिया। एक बंदूक धारी ने उलट-पलट कर देखा और उसे लेकर अंदर चला गया। कुछ देर तक नमिता बाहर खड़ी रही तभी वही आदमी बाहर आकर बोला-” मैडम अंदर चलिए साहब ने बुलाया है। नमिता उसके साथ अंदर चली गई। अंदर एक विशाल हॉल नुमा कमरे में अनेकों बड़े बड़े टेबल और कुर्सियां कतार से लगी हुई थीं। उन सब के बीच एक ऊंचे और विशिष्ट से कुर्सी पर एक सज्जन बैठे हुए थे।
नमिता को देखते ही वे हाथ जोड़े उठकर खड़े हो गए। उनकी आंखें भरी हुई थी। अपनी निगाहें नीचे झुकाकर बोले-” बहन आओ बैठो!”
“बताओ यह भाई तुम्हारे लिए क्या मदद कर सकता है?”
नमिता ने भी अपने दोनों हाथों को उनके सामने जोड़ दिया उसकी आंखे गिली हो गईं और आवाज रुंध गए। सज्जन शायद नमिता की मनःस्थिति समझ गए थे उन्होंने एक परिचारी को इशारा किया।
उसने तुरंत एक ग्लास में पानी लेकर उपस्थित हुआ। नमिता ने पानी लेने से मना कर दिया और बोली-” आपने मेरी जितनी मदद की है वह एक भाई ही कर सकता है। मैं और मेरे बच्चे आपके द्वारा की गई नेकी का कर्ज कभी भी नहीं चुका पाएंगे ।”
“ऐसा मत कहो “बहन” यह मेरे और निशांत की दोस्ती का अपमान होगा। आगे भी यदि मैं तुम्हारे और बच्चों के लिए कुछ कर पाऊँ तो यह मेरे लिए मेरे मित्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ”
नमिता ने कहा -” यदि आपने मुझे सचमुच बहन माना है और मेरी मदद करना चाहते हैं तो मेरे “आत्मसम्मान” की रक्षा कीजिए ।”
हॉल में उपस्थित सभी लोग नमिता की बात सुनकर भौचक हो गए। नमिता ने अपने पर्स से नोटों से भरे लिफाफे को निकाला और उनकी ओर बढ़ाते हुए बोली-” भाई साहब, यह वापस लीजिए और अपने मित्र की आत्मा को सम्मानित कीजिए।”
स्वरचित एवं मौलिक
डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा
मुजफ्फरपुर बिहार