” क्या हुआ बेटा, चल ना अंदर ,,
अंजलि के पैर घर की देहरी के बाहर ठिठक गए तो उसकी मां रमा जी ने उसके हाथ को कस के पकड़ लिया और बोली, ” चल बेटा… तूं किसी बात की फ़िक्र मत कर.. तेरी मां तेरे साथ है …. सबके सवालों का जवाब मैं दूंगी… तूं बस अब अपने आगे की सोच … बहुत सह चुकी है अब और नहीं….. ये घर तेरा भी है । ,,
मां के दृढ़ विश्वास को देखकर अंजलि में भी हिम्मत आ गई और उसने अपनी मायके की देहलीज पर पैर रख दिया। शायद इस बार हमेशा के लिए क्योंकि ससुराल से तो वो सारे रिश्ते और बंधन तोड़ आई थी।
अंदर आते हीं दादी और भाई – भाभी की तिरछी नजरें उसे अंदर तक भेद रही थीं। भाभी रीटा तो मुंह मोड़कर अपने कमरे में जा बैठी। भाई पंकज सामान्य दिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन स्वीकार करना उसके लिए भी बहुत मुश्किल था।
सबको आशंका तो थी कि आज रमा जी शायद अंजलि को अपने साथ ले कर आएंगी लेकिन फिर भी ये बात घर में किसी के गले से नीचे नहीं उतर रही थी । और कोई तो कुछ नहीं बोला लेकिन अंजलि की दादी से चुप रहते नहीं बन रहा था , ” ले आई इसे उठा कर इस घर में वापस…. अरे तेरे जैसी मां तो हमने कहीं नहीं देखी जो अपनी बेटी का घर उजाड़ रही हो…. समय के साथ सब ठीक हो जाता लेकिन तूने हीं इसे सर पर चढ़ा रखा है। अब मूंग दलेगी ये हमारी छाती पर….. ना अपने परिवार की चिंता है ना समाज की शर्म.….,,
” बस अम्मा जी, बहुत चिंता कर ली घर और समाज की तभी पूरे तीन सालों से मेरी बच्ची अपने ससुराल में इतने अत्याचार सह रही थी। लेकिन अब और नहीं…. अगर आप लोगों को लगता है कि मैंने अपनी बेटी का घर उजाड़ दिया तो .….. हां… , मैंने अपनी बेटी का घर उजाड़ दिया .…. क्योंकि ऐसे घर के बसे रहने से अच्छा है कि वो उजड़ जाए ..
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. जिस बेटी को इतने नाजों से पाल पोस कर बड़ा किया था उसे यूं तिल तिल मरते नहीं देख सकती। आप सब को शायद अंजलि के जिस्म और आत्मा पर पड़े निशान नजर नहीं आ रहे लेकिन मैं मां हूं अपनी बेटी को इस दर्द में नहीं देख पाई इसलिए ले आई इसे अपने घर में वापस ,,
” अपना घर….. अरे शादी के बाद ससुराल हीं लड़की का घर होता है। कहा था हमने बात – चीत से मामला सुलझा लेते हैं लेकिन तूं तो सीधे थाना- पुलिस करने लगी। ,,
” अम्मा जी, कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं होती । क्या करती मैं..!! अपनी बेटी को जींदा लाश की तरह जीते देखती या उसकी लाश देखने का इंतजार?? ,,
दोनों सास बहू की बहस सुनकर अंजलि बहुत आहत थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि खुद उसका परिवार हीं उसे इस हालत में भी स्वीकार नहीं कर पा रहा। ” मां, मैं इस परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहती..… ,, रोते हुए अंजलि बोली। ,,
” तूं कोई बोझ नहीं है बेटा इस घर पर तेरा भी उतना ही अधिकार है जितना बाकी सब का.… और हां यदि किसी को अंजलि के यहां रहने से दिक्कत है तो ये उसकी समस्या है अंजलि की नहीं। याद रखो इसके पिता की सम्पत्ति पर बेटी का भी आधा अधिकार है। और ये मेरा आखिरी फैसला है कि अंजलि अब इसी घर में रहेगी, अपने घर में रहेगी।,, ये बात रमा जी ने बेटा बहू के लिए कही थी ताकि उनका उतरा हुआ मुंह ठीक हो जाए और वो समझ जाएं कि अंजलि उनपर बोझ बनकर नहीं रहेगी बल्कि अपने अधिकार से इस घर में रहेगी।
रमा जी के दृढ़ निश्चय के आगे पंकज और बहू भी समझ गए कि अब यदि ज्यादा कुछ कहा तो घर के दो हिस्से होते देर नहीं लगेगी। मां के निर्णय से अंजलि में भी हिम्मत आ गई थी। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वो जल्दी ही इस हादसे से उबर कर अपने पैरों पर खड़ी होगी और अपनी मां के भरोसे और सहयोग को जाया नहीं जाने देगी।
सविता गोयल 🙏