आखिरी फैसला – बीना शुक्ला अवस्थी : Moral Stories in Hindi

मायके से पॉच महीने के हार्दिक को लेकर लौटी मैथिली को स्टेशन पर ही जब परिमल ने अपनी बॉहों में भर लिया तब वह प्रसन्नता से खिल उठी। घर आकर  बुरी तरह गन्दा और बिखरा हुआ घर देखकर उसकी सारी खुशी उड़ गई।

परिमल ने जब उसे बताया कि उसके जाने के बाद कौशल्या ने काम छोड़ दिया है तो उसे कुछ समझ में नहीं आया। 

कौशल्या उसके घर में तीन साल से काम कर रही थी। उसके बेटा – बहू एक सड़क दुघर्टना में मर गये थे। एक बारह साल की पोती के अलावा उसका कोई नहीं था। मैथिली के गर्भवती होने की खबर से कौशल्या बहुत खुश थी।  उसने एक मॉ की तरह पूरे समय मैथिली का ख्याल रखा था।

मैथिली ने परिमल से कौशल्या के काम छोड़ने का कारण जानने की कोशिश की – ” इतने दिन से इतनी अच्छी तरह काम कर रही थी, भरोसा हो गया था उस पर लेकिन अब ऐसी क्या बात हुई कि उसने काम छोड़ दिया और तुमने मुझे फोन पर बताया भी नहीं।” 

” वहॉ जानकर तुम क्या कर लेती? बेकार में चिन्ता करती। मैं दूसरी कामवाली ढूंढ दूॅगा।”

जब मैथिली ने कालोनी के दूसरे घरों में पता किया तो मालूम हुआ कि कौशल्या ने अचानक सारे घरों में काम छोड़ दिया है और अपने गॉव चली गई है। मैथिली को समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक कौशल्या पूरी कालोनी का काम एक साथ कैसे छोड़ कर जा सकती है? 

उसे पता था कि गॉव में उसके पास एक टूटा फूटा घर के सिवा कुछ नहीं है। बेटे बहू की मृत्यु के बाद वह शहर इसी लिये आ गई थी कि दीपाली को पढा लिखा कर किसी योग्य बना देगी। इस समय दीपाली सातवीं कक्षा में पढ रही थी। कभी कभी मैथिली भी उसकी पढने में मदद कर देती थी। 

किसी को अधिक कुछ पता नहीं था। उसका मन कर रहा था कि वह कौशल्या के गॉव जाकर सच्चाई का पता करे लेकिन यह संभव नहीं था, मन मारकर रह गई। 

कौशल्या और दीपाली से उसे भी बहुत लगाव था। कौशल्या को भी उस पर बहुत भरोसा था। वह उसके घर के अलावा दीपाली को किसी के घर जाने नहीं देती थी।प्रसव के लिये मायके जाते समय कौशल्या ने आशीर्वाद देते हुये कहा – ” जल्दी से बच्चे को लेकर वापस आना। मैं बच्चा और घर दोनों सम्हाल लूॅगी साथ ही तुम्हें भी खिला पिला कर थोड़े ही दिनों में फिर से मजबूत बना दूॅगी।”

मैथिली को कौशल्या और दीपाली की बहुत याद आती थी। उसने निश्चय कर लिया था कि जब भी वह मायके जायेगी, बिना परिमल को बताये कौशल्या के गॉव जरूर जायेगी।

हार्दिक एक वर्ष का हो गया। इस बार मायके पहुॅचकर वह जब कौशल्या के गॉव पहुॅची तो उस गरीब स्त्री के समक्ष शर्म से गड़ गई। 

कौशल्या ने बताया कि उस दिन उसकी तबियत ठीक नहीं थी तो उसने दीपाली को काम करने के लिये मैथिली के घर में भेज दिया था और खुद दूसरे घर में काम करने चली गई 

रविवार का दिन होने के कारण परिमल घर में था। जब कौशल्या उसके घर पहुॅची तो दीपाली अस्तव्यस्त कपड़ों में रोती हुई घर के बाहर ही मिल गई। उसने कौशल्या को बताया कि किचन में बरतन धोते समय परिमल ने उसे बॉहों में दबोच लिया था और उसके होंठों को अपने दॉतों से बुरी तरह घायल करके उसे बेडरूम की ओर खींचकर ले जाने लगा तो वह उसे धक्का देकर बाहर भाग आई।

कौशल्या जानती थी कि कुछ कहने पर परिमल साफ इंकार कर देगा और दीपाली की ही बदनामी होगी। इसलिये वह गॉव चली आई कि किसी तरह गरीबी में गुजारा कर लेगी लेकिन दीपाली को किसी घर में काम करने नहीं जाने देगी।

मैथिली ने तुरन्त कोई निर्णय लिया और कौशल्या को कुछ समझा कर मायके वापस जाने की बजाय कानपुर अपने घर लौट आई। परिमल ने पूॅछा भी – ” क्या बात है, इतनी जल्दी लौट आईं? मेरे बिना मन नहीं लगा क्या?”

” कुछ ऐसा ही समझ लो।” मैथिली का उत्तर।

रविवार को परिमल सोकर उठा। उसने बैठक में कौशल्या और दीपाली को देखा तो हतप्रभ रह गया। उसने मैथिली को दूसरे कमरे में बुलाया –

 ” ये लोग •••••। यहॉ क्या कर रही हैं? इन्होंने तो काम छोड़ दिया था।”

” हॉ परिमल,  छोड़ दिया था लेकिन अब ये लोग इसी घर में मेरे साथ रहेंगी।”

” क्यों?” परिमल की कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

” क्योंकि मैं अकेले इतने बड़े घर में कैसे रहूॅगी?”

” अकेले ! ……” परिमल की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ” क्या मतलब है तुम्हारा ?” 

”  मतलब !” मैथिली ने व्यंग्य से उसकी ओर देखा – ” तुम अच्छी तरह जानते हो। मुझे सब पता चल गया है। तुम्हें शर्म नहीं आई बारह साल की बच्ची के साथ यह सब करते हुये?”

” यह लड़की झूठ बोल रही है, मैंने कुछ नहीं किया। इस दो कौड़ी की लड़की का विश्वास करके तुम मुझ पर इल्जाम लगा रही हो‌ ?”

मैथिली की गुस्से से घूरती आंखें देखकर बेशर्मी से बोला – ” चलो, मान लिया कि अगर मुझसे गलती हो भी गई तो क्या हुआ? आखिर मैंने उसके साथ कुछ गलत किया तो नहीं था, केवल करने का प्रयास किया था। तुम इतनी सी बात का तिल का ताड़ क्यों बना रही हो? क्या  एक बाई के लिये अपना खुद का घर बरबाद कर दोगी?”

फिर हॅसकर कहा- ” सोंच लो कि कहीं परोपकार के चक्कर में तुम खुद बेघर न हो जाओ। मेरा क्या है, मैं तो मर्द हूॅ। इस लड़की की ही बदनामी होगी ।”

मैथिली ने बहुत शान्त स्वर में कहा – ” कोई बात नहीं, मुझे स्वीकार है। मेरे साथ विश्वासघात और किसी बच्ची की अस्मिता को भंग करने का अपना कृत्य तुम्हारे लिये केवल इतनी सी बात है? अब मैं और तुम साथ नहीं रह सकती। मुझे तलाक चाहिये तुमसे। “

परिमल पूर्णतः नीचता पर उतर आया -” ” तो जाओ, मेरा बेटा मुझे दे दो और जहॉ मन हो चली जाओ। देखता हूॅ, कितने दिन मायके वाले रख लेंगे। अभी केवल तलाक शब्द सुना है, जब खुद पर पड़ेगी तब पता चलेगा।‌ कहॉ से पालोगी –  खुद को और अपने बच्चे को? कभी एक रुपया तो कमाया नहीं है तुमने।”

बिना आवेश में आये मैथिली ने उत्तर दिया – ” ” तुमसे किसने कहा कि मैं मायके जाऊॅगी। इस गलतफहमी में मत रहना कि मैं ऐसे ही चुपचाप चली जाऊॅगी। पहले मैं अपने दोनों के माता – पिता और रिश्तेदारों को बुलाकर तुम्हारी करतूत दीपाली के मुॅह से सुनाऊॅगी। उसके बाद दीपाली को न्याय दिलवाने के लिये अदालत जाऊॅगी। बदनामी ‌अगर उसकी होगी तो तुम्हारी, तुम्हारे परिवार की भी होगी साथ ही तुम्हारी ‌नौकरी भी जा सकती है।”

परिमल कॉप गया, उसने मैथिली के सामने हाथ जोड़ते हुये कहा- ” ऐसा मत करो,इस तरह तो मैं बरबाद हो जाऊॅगा, कहीं मुॅह दिखाने लायक नहीं रहूॅगा। मेरी नौकरी चली जायेगी,  बदनाम कर्मचारी को कोई भी काम नहीं देना चाहेगा। बदनामी के कारण मेरे परिवार के लोग और रिश्तेदार मुझे त्याग देंगे। मैं इन दोनों से माफी मॉगने को तैयार हूॅ। जितना पैसा ये लोग कहेंगी देने को तैयार हूॅ। तुम जो कहोगी, वह करूॅगा लेकिन अपना यह आखिरी फैसला बदल दो।”

मैथिली सोंच में पड़ गई फिर उसने कहा – ” अगर तुम चाहते हो कि यह बात सिर्फ हम दोनों के बीच में रहे। हमारे अलगाव और दीपाली की कहानी जगजाहिर न हो तो इसी समय यह घर छोड़कर चले जाओ, कभी मेरे सामने मत आना और एक महीने के अन्दर अपना स्थानान्तरण करवाकर यह शहर छोड़ दो। मैं सबको जवाब दे लूॅगी।”

” परिमल की ऑखों से ऑसू बहने लगे – ‘ क्या यही तुम्हारा आखिरी फैसला है? मैं तुम्हारे और हार्दिक के बिना कैसे रहूॅगा? बहुत प्यार करता हूॅ तुम दोनों से। पता नहीं उस दिन कैसे •••••••।”

” कभी सोंचा है कि यदि उस दिन दीपाली तुम्हें धक्का देकर भाग न गई होती तो क्या होता? मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती थी इसलिये यह आखिरी फैसला लेते हुये बहुत तड़प रही हूॅ लेकिन मजबूर हूॅ। इससे अधिक कुछ नहीं कर सकती। मैं तुम्हारी पत्नी हूॅ इसलिये स्वयं को भी सजा दे रही हूॅ कि आज के बाद हम एक दूसरे से कभी नहीं मिलेंगे।” 

परिमल ने मैथिली का हाथ पकड़ना चाहा तो वह उससे दूर हो गई – ” मुझे और अपने बच्चे को छूने का अधिकार तुमने खो दिया है। मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिये। मैं अपनी मेहनत से अपने बच्चे को पाल लूॅगी। मेरी चिन्ता मत करना।पैसा कमाया नहीं तो क्या हुआ? पढ़ी-लिखी हूॅ, आत्मनिर्भर होना जानती हूॅ।”

” मुझे सिर्फ एक बार माफ कर दो, दुबारा ऐसा कभी नहीं होगा। ” परिमल गिड़गिड़ाने लगा।

” कुछ गलतियों की माफी नहीं होती। यह तो अच्छा हुआ कि दीपाली के साथ कुछ गलत नहीं हुआ। यदि तुमने उसके साथ कुछ गलत कर दिया होता तो इतना समझ लो कि अब तक तुम्हें मारकर मैंने आत्महत्या कर ली होती।” मैथिली की ऑखें बरसने लगीं।

अब परिमल के पास कहने के लिये कुछ नहीं था। ‌उसने एक नजर पालने में लेटे हुये हार्दिक पर डाली और बैग में अपने कपड़े रखने लगा। समझ गया कि मैथिली का आखिरी फैसला मानने के सिवा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर

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