आइना भी हैरान था… – उमा महाजन : Moral Stories in Hindi

 आज स्नान की तैयारी करते समय जब वे अल्मारी की बायीं तरफ से अपने वस्त्र निकालने लगीं तो अचानक ध्यान दायीं तरफ के हिस्से में लगे हैंगरों पर लटकते रंग-बिरंगे नये- नये सूटों की तरफ चला गया। एक पल को उन्हें लगा जैैसे वे सुस्त- मुरझाई सी आवाज में उन्हें कह रहे हैं,

       ‌ ‘शुक्र है मैडम ! आपके दीदार हुए। भला हमने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया कि आपने हमारी गलियों में आना ही छोड़ दिया। घर में रह कर तो आपने हमारी दुनिया में मायूसी ही घोल दी है। क्या ही दिन थे वे, जब आप बारी-बारी हम सबके हाल-चाल पूछती थीं, कभी हमें धोने के बहाने ,कभी प्रैस करने के बहाने और कभी इतरा- इतरा कर फिटिंग देखने के बहाने। कितना प्रसन्न रहती थीं आप हम सबके साथ ! लेकिन क्या यह प्रसन्नता केवल बाहर के लिए थी ? क्या अब हमारा जीवन यहीं लटके- लटके समाप्त हो जाएगा ?’

       वे सजग हुईं। उन्होंने सभी हैंगरों पर लटके सूटों पर बड़ी हसरत भरी निगाह डाली। बेचारों के पांव चादर से बाहर निकल रहे थे। अधिकांश हैंगर तो एक दूसरे को सहारा देते हुए बड़ी मुश्किल से रॉड पर टिके थे। कई बेचारे तो तीन- तीन सूटों का बोझ उठाए अपने कर्तव्य- पथ पर टिके थे, रंंतु उनकी निगाह मात्र पड़ते ही लाल, नीले, पीले, काले,मेंहदी हरे, हल्के हरे, नारंगी, फिरोजी, ग्रे, स्टील ग्रे, गोल्डन, ,पिंक, बेबी पिंक बैंगनी,  मैरून, ब्राउन, वाइट, ऑफ वाइट, रायल ब्लू, स्काई ब्लू आदि रंगों में वे मुस्कुरा उठे। (नहीं, नहीं ! वे रंगों संबंधी अपना ज्ञान नहीं बघार रहीं अपितु ‘हरि अनंत हरि कथा अनंंता’ की भांति हम नारियों की ड्रैसेज के रंग भी अनंत होते हैं)

    असल में हुआ यूँ कि नौकरी का सेवाकाल पूरा होते ही, कुछ स्वास्थ्य कारणों से उनका घर से बाहर निकलना बिल्कुल बंद हो गया। सफर पर भी पाबंदी लग गई। यह काल काफी लंबा चला । सो, घर में रहते हुए, उन्हें ढीले-ढाले, थोड़े घिस चुके और नए कपड़ों की बनिस्पत, रंगों में अपना थोड़ा यौवन खो चुके (थोड़े फेडेड-से) आरामदायक कपड़ों में रहने की आदत पड़ गई। 

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     ‌वैसे भी हम मध्यमवर्गीय परिवारों का अपने कपड़ों को ले कर एक अपना बनाया फॉर्मूला होता है। ‘घर में पहनने वाले कपड़े’ और ‘बाहर पहनने वाले कपड़ों’ में बांट कर हम यहां भी अपने लाभ की राजनीति करते हैं । इसके दो पहलू हैं। पहला बचत करने का तरीका तथा दूसरा बार-बार धुल कर अपने जीवन की चमक खो चुके कपड़े जब हमारी बाहरी दुनिया की चमक-दमक से तालमेल बिठाने में असमर्थ हो जाते हैं तो हम उन्हें घर तक सीमित कर देते हैं । ठीक वैसे ही, जैसे ताउम्र संघर्षरत रहकर हमें दुनिया में जीना सिखाने वाली हमारी पुरानी पीढ़ी,एक वक्त पर आकर, हमारी बाहरी दुनिया से तालमेल बिठा पाने में असमर्थ होकर अपने ‘मन के घर’ तक सीमित रह जाती है।

    साधारणत: लोगों की यही धारणा होती है कि घर से बाहर निकलते समय ही ढंग का पहनने और ढंग से तैयार होने की जरुरत है और बाहर वालों की प्रसन्नता का ध्यान रखने की धुन में हम अपने घर में अपनी प्रसन्नता उपेक्षित कर जाते हैं। बाहरी दुनिया में धाक जमाने के चक्कर में, हम अक्सर मंहगी और सुंदर क्राकरी, बैड शीट्स आदि मेहमानों के लिए संभाल कर रखते हैं ,चाहे वर्षों तक उनके इस्तेमाल की बारी न आ सके। यह बात सिर्फ कपड़ों और अन्य वस्तुओं के संबंध में ही नहीं है। यह हमारे व्यक्तित्व और व्यवहार में भी झलकती है। बाहर सबके समक्ष दिखाई जाने वाली शालीनता प्राय: घर में प्रवेश करते ही न जाने कैसे उग्र रूप धारण कर लेती है। खैर…

       उनके मन में  बार-बार उलाहने के शब्द गूंज रहे थे, ‘क्या यह प्रसन्नता केवल बाहर के लिए थी।’ वे सोचने पर विवश हो गईं कि क्या हमारी वेशभूषा सिर्फ दूसरों के लिए है ? क्या हम सिर्फ दिखावे के लिए अच्छा पहनते हैं ? क्या अपने मन की प्रसन्नता से इसका कोई सरोकार नहीं।

       फिर, सहसा उन्होंने मन ही मन कुछ निर्णय करते हुए तुरंत अपना सबसे अधिक मनपसंद सूट निकाला। जैसे ही अल्मारी बंद करने लगी कि ध्यान फिर बायीं तरफ चला गया। पुराने सूट उदास से कहते से लगे कि          ‘मैडम कोई बात नहीं। यही तो आज का सच है। जब तक यौवन है, संसार तुम्हें सर-माथे पर बिठाएगा और वृद्ध होते ही नीचे उतारकर आगे बढ़ जाएगा।’ उन्होंने मन ही मन उनसे कहा कि नहीं भाई ! परिवर्तन प्रकृति का नियम है। 

         स्नान करने के पश्चात् अपना मनपसंद नया सूट पहन कर उन्हें एक अद्भुत ताजगी भरा आनन्द एवं उत्साह महसूस हुआ। स्नानघर से निकलकर वे सीधी आइने के सामने आईं। खूब  अच्छे से तैयार हुईं । आज बालों को ऊँचे बाँधते हुए जूड़ा भी नए स्टाइल का बनाया। 

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      सहसा आइने में दिखने वाले उनके ‘अक्स’ ने उन्हें इस स्वरूप में देख, हैरान हो कर पूछा, ‘क्यों जी, बड़े बदले-बदले से लग रहे हैं ? कहां जाने की तैयारी है ?’ उन्होंने अपने कंधे उचकाते हुए बड़े आत्मविश्वास से उसे जवाब दिया, ‘क्यों, क्या सिर्फ कहीं जाने के लिये ही तैयार हुआ जा सकता है ?’ 

      उनके बदले हुए तेवर देखकर बेचारा आइना भी हैरान था।  

 

   उमा महाजन

   कपूरथला

   पंजाब।

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