रिश्तो में तुलनात्मक व्यवहार क्यों? – प्राची अग्रवाल  : Moral Stories in Hindi

सुगंधा अपने परिवार में बड़ी बहू थी शुरू से ही। मायके में साधारण घर से थी। लेकिन यहां भरा पूरा परिवार था। कोई भी किसी तरीके का ताना उलाहना नहीं था लेकिन सुगंधा अपने को कमतर आंकती क्योंकि मायके से कमजोर जो थी। यह उसकी अपनी ही सोच थी।

इसी उधेड़बुन में उसने चीजें खुद से खरीद कर मायके की तरफ से दिखानी शुरू कर दी। उसके ससुराल वाले उससे कहते कि आवश्यकता नहीं है दिखावे की। हमारे यहां सब पहले से ही मौजूद है। क्योंकि जानते तो वह भी थे सच्चाई। 

लेकिन सुगंधा अपनी गलतफहमियों के चलते इसी तरीके की हरकत करती रहती। इसके लिए वह बेवजह अपने पति पर पैसों का भी दबाव बनाती।

सुगंधा के देवर का रिश्ता तय हो गया। लड़की बहुत ही सुंदर और बहुत ही अच्छे घर से आ रही थी। वैसे तो सुगंधा व्यवहार से अच्छी थी लेकिन हमारे भारतीय समाज में कुछ रिश्तो में इतनी कटुता उत्पन्न होती है। जैसे देवरानी के आते ही जेठानी का व्यवहार बदल जाता है। उसको अपना सिंहासन हिलता हुआ दिखाई देने लगता है। जबकि सबका स्थान अलग-अलग है। फिर ऐसी मानसिकता क्यों?

कुछ परिवार के सदस्यों की भी गलती रहती है। बेवजह रिश्तो में तुलनात्मक व्यवहार करके दूरियां बढ़ाते हैं। अधिकांश घरों में देखा ही जाता है मायके से आए सामान को लेकर छींटाकशी की ही जाती है।

सुगंधा भी मन ही मन होने वाली देवरानी के घर से आए हुए तोहफों को देखकर ईर्ष्या कर रही थी जबकि उसमें से काफी सामान तो उसके और उसके बच्चों के लिए ही था। लेकिन उसका मन इसी बात से विचलित था कि देवरानी बड़े घर की है और उसका मायका कमजोर। 

उसने अब और तिकड़मबाजी लगानी शुरू कर दी। अपने जुड़े जकोड़े रूपए पैसे के गहने लाकर मायके की तरफ से दिखाने लगी। अतिरिक्त खर्च के लिए पति से लड़ती अलग। 

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धीरे-धीरे घर का माहौल प्रभावित हो रहा था। कुछ समय पश्चात देवर का विवाह हो गया खुशी-खुशी। देवरानी का व्यवहार भी बहुत अच्छा था। काफी पढ़ी लिखी थी और उच्च पद पर भी थी। देवरानी उसकी बहुत इज्जत करती है। दीदी कहते कहते नहीं थकती थी। उसको अपने पर अब और ग्लानि महसूस होती है क्योंकि पहले तो उसका विरोध मात्र रुपए पैसों से था,स्तर से था लेकिन यहां तो उसे देवरानी हर चीज में ही हो होशियार नजर आ रही थी। अब उसने नया पांसा फेंकना शुरू करा।

देवरानी की हर चीज में कमी निकालना शुरू कर दिया। उसकी सोच यही होती कैसे ही देवरानी को नीचा दिखाकर अपने अहम को शांत कर लिया जाए। इन्हीं बातों में इतनी उलझी रहती सुगंधा कि अपने बच्चों की पढ़ाई पर भी ध्यान नहीं दे रही थी। परिवार में किसी की भी सोच अगर दूषित हो जाए तो प्रभाव सभी पर पड़ता है। यहां पर भी माहौल खराब हो रहा था। 

एक दिन परिवार के सभी लोग शादी में गए हुए थे दूसरे शहर। सुगंधा और उसकी बेटी घर पर ही थी। जबकि देवरानी अपने मायके गई हुई थी जो कि इसी शहर में था।

सुगंधा की बेटी स्कूल से वापस नहीं आई तो सुगंधा को चिंता हुई। उसने स्कूल फोन किया तो पता चला कि सभी बच्चे चले गए हैं। उसकी बेटी आराध्या स्कूटी से आती हैं। लेकिन आज अभी तक घर नहीं आई है। उसने अन्य बच्चों के घर पर फोन किया तो पता चला कि सब बच्चे आ चुके हैं। सुगंधा को बड़ी घबराहट महसूस हुई। घर पर भी कोई नहीं था। फिर उसने अपनी देवरानी को फोन किया। देवरानी फॉरेन स्कूटी लेकर चली आराध्या को देखने के लिए, अपनी जेठानी को बिठाकर। शहरों में बड़ा मुश्किल हो जाता है किसी को ढूंढना।

सभी जगह तलाश करी, लेकिन कहीं भी नहीं मिल रही थी। उसके देवरानी नेहा इसी शहर से थी इसलिए उसे रास्तों की जानकारी भी अधिक थी। नेहा पढ़ी-लिखी भी थी और उसके मायके वाली भी तुरंत खड़े हो गए आराध्य को ढूंढने के लिए। पुलिस स्टेशन में भी सूचना कर दी गई। अस्पतालों में खोजबीन की जाने लगी तब पता चला आराध्या सरकारी अस्पताल में एडमिट है। थोड़ी हाथ पैरों में चोट थी,वैसे सही थी। सुगंधा की तो जान ही निकल रही थी वह तो नेहा संभाल रही थी सब कुछ। 

अस्पताल जाकर पता चला कि आराध्या अपनी सहेली जो अभी नयी बनी थी, के साथ स्कूटी पर दोनों किसी कोचिंग सेंटर में जानकारी करने जा रही थी। हाईवे पर कोई पिकअप वाला पीछे से मार गया इसलिए दोनों ही सहेलियां चोटिल थी। किसी भले मानुष ने भर्ती कराया था दोनों को अस्पताल में। बेहोश होने की वजह से कुछ बता नहीं पा रही थी। थोड़ी फुर्सत मिलने पर उन्होंने ही फोन किया था आराध्या का आई कार्ड देख कर,घर पर।

अस्पताल में नेहा ही सारा काम देख रही थी। एक-दो घंटे बाद अन्य परिवारजन भी आ गये अस्पताल में। सुगंधा की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। नफरत की जो दीवार उसने खड़ी की थी आज वह टूट गई। नेहा ने ही ने तो उसकी मुश्किल घड़ी में उसका साथ दिया था।

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

प्राची अग्रवाल 

खुर्जा बुलंदशहर उत्तर प्रदेश

#नफरत की दीवार

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