जुड़ गई डोर आखिरकार – सीमा प्रियदर्शिनी सहाय : Moral Stories in Hindi

डॉक्टर नीला अपनी गाड़ी से उतरी और तेजी से अस्पताल की तरफ बढ़ने लगी।

सुबह ही अस्पताल से फोन आया था” एक पेशेंट बहुत ही सीरियस हालत में भर्ती कराया गया है ,तुरंत ही आकर उसे देख लीजिए।”

यह सुनकर उसने अपना ब्रेकफास्ट अधूरा छोड़ा और भागी भागी अस्पताल के लिए निकल गई ।

फोन पर उसने नर्स से बात किया और आईसीयू की तरफ बढ़ गई।

वार्ड के बाहर रोने बिलखने की आवाजें आ रही थीं ।

अचानक डॉक्टर नीला की नजर सामने खड़ी महिला पर पड़ी जो अपना चेहरा अपने साड़ी के आंचल से छुपाए हुए बदहवासी की हालत में सिसक रही थी।

तभी उसके चेहरे से आंचल हट गया और अपने आंसुओं से भरी आंखों से नीला को देखने लगी।

नीला सोच में पड़ गई “ इन्हें कहीं देखा हुआ सा लग रहा है,,,,! क्या यह सुभद्रा चाची हैं ना!”उसने अपने दिमाग को तेज दौड़ाया।

फिर अगले ही पल याद आ गया हां ये वही हैं!! क्या हाल बना लिया है? पूरे बाल सफेद हो गए हैं!! चेहरे पर उम्र का असर उभर आया है!!!”

नीला उनकी तरफ ध्यान से देखते हुए तेज़ी से आगे बढ़ी।

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डॉक्टर को अपनी ओर देखते हुए देखकर सुभद्रा घबराने से ज्यादा चौंक गई।

वह कुछ पूछतीं उससे पहले ही नीला ने सवाल दागा दिया “आप सुभद्रा चाची हैं ना?”

“हां,,, आश्चर्य मिश्रित संदिग्ध नजरों से नीला की ओर देखते हुए सुभद्रा जी ने उससे पुछा 

“आप हमको कैसे जानते हैं डॉक्टर?”

नीला उनके पैरों पर झुकते हुए प्रणाम करते हुए बोली “आपने मुझे पहचाना नहीं चाची, मैं नीला हूं। मोहन शर्मा की बेटी!”

“ अरे नीला,,,, तू इतनी बड़ी हो गई !!डॉक्टर बन गई?देखो ना ये क्या हो गया! इन्हें क्या हो गया, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।”उनके आंखों में घबराहट और पश्चाताप दोनों ही नजर आ रहा था।

तभी पीछे से दो नर्स आकर नीला से बोलीं  “इन्हीं के हस्बैंड बीमार है जल्दी चलिए डॉक्टर रमन आपको भीतर बुला रहे हैं !”

सुभद्रा जी आंखों में आंसू लिए नीला की तरफ याचक भाव से देख रही थीं ।

अपनी चाची का हाथ अपने हाथ में लिए नीला ने कहा “आप डरिए मत, मैं हूं ना!”

सुभद्रा  जी की आंखें फिर से भर आईं और वह फिर से रोने लगीं ।

नीला तेजी से अंदर पहुंची ।डॉक्टर रमन सुंदर लाल जी का चेकअप कर रहे थे।

“डॉक्टर , इन्हें बेहोशी की हालत में यहां भर्ती कराया गया था। सारे लक्षण हार्ट अटैक के हैं!”

पेशेंट को चेक करते समय नीला भूल गई कि यह उसके बड़े पापा है, वही बड़े पापा जिन्होंने दादा जी के श्राद्ध के समय ही जमीन के बंटवारे पर हंगामा खड़ा कर दिया था।

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नीला के पिता मोहन शर्मा ने उन्हें समझाने की अथक कोशिश भी किया था मगर सब नाकामयाब रहा था।

दादा जी के श्राद्ध कर्म के बाद  मोहन शर्मा और सुंदर शर्मा दोनों के रास्ते पूरी तरह से बदल गए थे।

दोनों एक ही घर में रहते हुए अजनबी बन चुके थे।

यहां तक कि मोहन जी उस शहर को ही छोड़कर बीवी बच्चों के साथ दूसरे शहर में जा बसे थे।

बहुत ही जद्दोजहद कर उन्होंने अपना स्थानांतरण करवा लिया था। 

उसके बाद उन्होंने कसम ही खा लिया था कि मुड़कर कभी भी अपने पैतृक आवास पर नहीं जाएंगे।

नीला तब बहुत ही छोटी थी।उसे यह सब कुछ समझ भी नहीं आता था लेकिन बालसुलभ मन में चाचा चाची के सुंदर चित्र आज तक मौजूद थे, वह मिट नहीं पाया था।

नीला ने आते ही जल्दी-जल्दी चेक कर उन्हें आईसीयू में भर्ती करवाया और डॉक्टरों की टीम के साथ पल-पल चेकअप करती रही।

अपनी कुशाग्र प्रतिभा और कुछ घंटों की अथक मेहनत के बाद सुंदरलाल जी खतरे से बाहर तो आ गए थे मगर उन्हें बड़ी हिदायत से रहने की बहुत जरूरत थी।

 बाहर आकर नीला ने अपनी चाची को और सांत्वना देते हुए कहा “चाची,अब खतरे की बात तो टल गई है मगर अभी ऐतिहातन अस्पताल में ही रहना पड़ेगा और उन्हें किसी भी तरह का टेंशन मत लेने दीजिएगा।”

“हां बेटी, ठीक है!”

नीला का भरोसा सुभद्रा जी को एक नई दिलासा दे रहा था कि शायद टूटे रिश्ते फिर से जुड़ने लगें!

उन्होंने भरे गले से पूछा 

“मोहन और आनंदी कैसे हैं बेटी और तुम्हारा भाई उपकार?”

“भैया तो अमेरिका में हैं और मां पापा फिलहाल उज्जैन घूमने गए हैं।”नीला के माथे पर चमकता हुआ सिंदूर और चमकती हुई बिंदी बता रही थी कि नीला की शादी हो चुकी है।

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“अच्छा,,,!”कहकर सुभद्रा जी चुप रह गईं।

“आपके साथ कोई नहीं है?”उसने पूछा।

“नहीं बेटी, तुम्हारे दोनों भाई दूसरी जगह नौकरी पर हैं। आज सुबह तक सब ठीक था फिर न जाने क्या हुआ अचानक बेहोश हो गए! और,,,”वह फिर से रोने लगी।

“नहीं, प्लीज आप रोइए मत। मैं सब देख लेती हूं। मामला बहुत सीरियस नहीं है।बस उन्हें किसी तरह के टेंशन मत दीजिएगा।”

उन्हें समझा-बुझाकर नीला दूसरे पेशेंट देखने चली गई।

उसके जाने के बाद सुभद्रा जी और भी उदास हो गईं।

“लगता है जैसे कल की ही बात है, नीला कैसे उछलती कूदती हुई घूमती थी। 

सब कहते थे कि पूरे खानदान में एक ही बेटी है।इसकी शादी धूमधाम से करेंगे।

आज उसकी मांग भरी हुई है ! किसी ने इसकी शादी में बुलाया तक नहीं!

जब रिश्ते ही टूट चुके हैं तो!!!”वह दबे स्वर में सिसक उठीं।

लगभग एक हफ्ता बीत गया था सुंदर लाल जी को अस्पताल में भर्ती कराए हुए।तबतक उनके दोनों बेटे वहां पहुंच गए थे।

वहां नीला को एक डॉक्टर के रुप में देखकर दोनों बहुत ही ज्यादा खुश थे। उससे भी ज्यादा आभारी महसूस कर रहे थे कि नीला ने उन्हें तथा उनकी मां दोनों का खूब ख्याल रखा था।

तबतक नीला के माता-पिता भी उज्जैन से वापस लौट आए थे। नीला ने उन्हें सबकुछ बताया तो अपने भाई से मिलने की ललक वह नहीं छोड़ पाए।

दोनों पति-पत्नी अपने हाथों में ताजे फूल लेकर अस्पताल पहुंचे।

अपने छोटे भाई को सामने देखकर सुंदर लाल जी की आंखों में आंसू भर आए। वह सिसक उठे।

“छोटे, मेरी आंखों में तो लोभ का नशा चढ़ गया था और तू उसे उतारने के बजाय भाग गया वो भी बिना बोले।

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कैसा भाई है तू मुझे माफी मांगने का भी अवसर नहीं दिया!!!”

“नहीं भैया मुझे माफ कर दो। मैं भी बेवजह नाराज हो गया था।”

“बड़े चाचा आपको टेंशन नहीं लेना है फिलहाल!”नीला ने उन्हें टोका।

“नहीं नीला बेटा,जो अफसोस मैंने जतन से छुपा रखा था, आज आंखों से बह जाने दो। मुझे मेरा भाई मिल गया और क्या चाहिए!”

“हां आप दोनों को मिलवाने में कुछ हाथ मेरा भी है!”नीला ने कहकर हंसने लगी।

उसके साथ सब लोग हंसने लगे।

“मैं भी कायर की तरह गांव से भाग निकला।अपना देश अपनी मिट्टी छोड़कर!”मोहन लाल जी भी रो पड़े।

“भैया, अब आप अस्पताल से छुट्टी लेकर हमारे घर चलिए।आप सबके बिना घर बहुत अधूरा लगता है।”

आनंदी ने कहा तो सुंदर जी कहने लगे “हां दुल्हन,अरसा हो गया तुम्हारे हाथ के अनरसे खाए हुए।बस इस डाक्टर से छुट्टी दिला दो।” यह सुनकर सब हंस पड़े।

प्रेषिका -सीमा प्रियदर्शिनी सहाय 

नई दिल्ली 

# टूटते हुए रिश्ते जुड़ने लगे 

पूर्णतः मौलिक और अप्रकाशित रचना बेटियां के साप्ताहिक विषय # टूटते हुए रिश्ते जुड़ने लगे के लिए।

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