दामिनी – शालिनी श्रीवास्तव : Moral Stories in Hindi

अरे दामिनी…. यह क्या… तुम घर के कपड़े ही पहन कर कीर्तन में आ गई???? तुम्हें पता है ना, शादी वाला घर है… कितनी चहल-पहल है… सब लोग कितने महंगे महंगे कपड़े पहन कर घूम रहे हैं ….और तुम साधारण कपड़े पहन कर यहां आ गई…. शांति काकी ने सभी के बीच दामिनी को यह सब बोल दिया …

मैं एक तरफ खड़ा सब सुन रहा था… शांति काकी की उम्र 60 के करीब होने वाली थी…. परंतु सजने सवरने का बहुत शौक था उन्हें… एक बेटे की शादी कर चुकी थी और दूसरे बेटे की शादी तय कर दी गई थी… और आज इस शादी के उपलक्ष में उन्होंने अपने घर पर कीर्तन रखा था…. दामिनी को भी बुलाया गया था …

पड़ोस के घरों में ही तो दामिनी भी रहती थी… उसे भी न्योता देना ही था…. दामिनी बहुत हल्के फुल्के और साधारण कपड़े पहनती थी और एक साधारण जीवन ही जीती थी… परंतु वहीं दूसरी तरफ शांति काकी ने तो आसपास के घरों में अपना एक रुतबा बना रखा था …कपड़ों के नाम पर डिजाइनर कपड़े ही पहनती थी…

अक्सर वह दामिनी को कहती रहती थी कि कुछ अच्छे कपड़े पहना करो और अपना लिविंग स्टाइल मेंटेन करो …दामिनी को यह सब कहां भाता था…. उसे तो हमेशा यही लगता था कि मैं लोगों को दिखाने के लिए इतने भारी भरकम कपड़े क्यों पहनो ????क्या सिर्फ महंगे कपड़े पहनने से ही लोग आपको पसंद करते हैं ???

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  आपका अच्छा व्यक्तित्व …अच्छी विचारधारा …कोई मायने नहीं रखती??? बस यही सोचकर दामिनी दिखावे की दुनिया से दूर रहती… और अपना साधारण जीवन जीती …शांति काकी तो किटी पार्टी में भी जाती थी… पूरी तरह से शहरी माहौल में ढल गई थी…. उनको देखकर कोई कह नहीं सकता था कि इन पर कभी बुढ़ापा आ भी सकता है .

..परंतु यह तो कुदरत का नियम है… सब पर आना ही होता है और वैसे भी महंगे और भारी कपड़े पहनने से आप चेहरे पर झलकती उम्र की परछाई को नहीं छिपा सकते ….जब भी कोई नई डिजाइन का कपड़ा बाजार में आता तो शांति काकी झट से दर्जी से वैसा ही सिलवाने चली जाती….

दोनों बेटों की शादी होने के बाद शांति काकी जो थोड़ा बहुत घर की जिम्मेदारी संभालती थी उससे भी मुक्त हो गई… बस फिर क्या था ,अपने द्वारा बनाए गए सर्कल में बिजी रहती ….बजरंगी काका भी उन्हें कुछ नहीं कहते थे …उन्हें लगता था कि शांति  काकी का शौक है यह सब करना …तो क्यों टोका टाकी की जाए…

एक दिन किटी पार्टी से आते-आते शांति काकी को एक ऑटो वाला धक्का देकर चला गया और काकी वहीं सड़क पर गिर गई…. जब उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया ,तो पता चला कि उनकी दाहिनी बाजू में फ्रैक्चर है …बजरंगी काका को टेलीफोन किया गया तो वह भी अस्पताल पहुंच गए …शांति काकी की बाजू पर प्लास्टर लगा ..

.फिर काका उन्हें लेकर घर आ गए.. बाजू में काफी दर्द भी हो रहा था …दोनों बहूओ ने जब देखा कि काकी की बाजू पर प्लास्टर लग गया है ,तो दोनों आपस में बातें करने लगी कि इस बुढ़िया को पता नहीं इतनी क्या पड़ी रहती है…. इतना सज सवर के निकल जाती है रोज किसी न किसी पार्टी में ….जैसे तैसे हम पूरा घर संभाल रही थी…

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अब इसको भी संभालना पड़ेगा… शांति  काकी की दाहिनी बाजू पर प्लास्टर होने की वजह से उन्हें ज्यादा दिक्कत आ रही थी… धीरे-धीरे आस पड़ोस में भी यह खबर पहुंच गई कि शांति काकी का एक्सीडेंट हो गया… दामिनी भी उनका पता पूछने आई …मगर जिन किटी पार्टियों में शांति काकी जाया करती थी ,

वहां के लोगों ने बस टेलीफोन करके पता ले लिया और सोशल मीडिया पर गेट वेल सून लिख दिया… अब शांति काकी की सजावट की दुनिया तो इतना ही साथ देती …इससे ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती थी… पड़ोस के लोग दिन में दो-तीन बार चक्कर लगा जाते… दामिनी तो कुछ देर शांति काकी के पास रुकती….

कभी-कभी तो उन्हें खाना खिला कर ही जाती… शांति काकी अपने हाथ से खाना भी नहीं खा पाती थी… दो महीने बाद शांति काकी का प्लास्टर खुल गया… वैसे भी इस उम्र में हड्डियां टूट जाए तो जुड़ने में समय लेती हैं …जब शांति काकी का प्लास्टर खुल गया तो, उन्होंने दामिनी को अपने पास बिठाकर कहा कि इस एक्सीडेंट से मुझे एक बात तो समझ में आ गई…

मुसीबत के समय में दिखावे की दुनिया काम नहीं आती… कुछ लोगों का अच्छा व्यक्तित्व ही हमें सहारा दे सकता है ….जिन लोगों के साथ बैठकर मैं हस्ती खेलती और होटल में खाना खाती थी ,वह लोग मेरे साथ कभी अपनी भावनाएं नहीं जोड़ पाए …बस सिर्फ कुछ पलों को अच्छे से बिताने के लिए इकट्ठे होते थे…

इन सब के चक्कर में मैंने अपनी बहूओ के साथ कभी समय नहीं बिताया… मैं तो अपने ही घर में होटल की तरह रहने लगी थी… कितना समय मैंने इस दुनिया में दिखावा करते-करते बर्बाद कर दिया… दामिनी ने शांति  काकी को हौसला दिया और कहा कि काकी समाज में उठना बैठना बुरी बात नहीं है…

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परंतु हर समय खुद को बड़ा दिखाने के चक्कर में हम भावनाओं से दूर हो जाते हैं… जिसका प्रभाव हमारे रिश्तों पर पड़ता है… यदि हम महंगे कपड़े देखकर और बड़ा रुतबा देखकर चुनाव करेंगे कि हमें किससे बात करनी है और किससे नहीं ,तो यह सही नहीं है… क्योंकि समय एक जैसा नहीं रहता…

इंसान ही इंसान के काम आता है और यह जरूरी नहीं कि महंगे कपड़े पहनने वाले आपके साथ उन पलों में भी खड़े हो ,जब आप किसी मुसीबत से जूझ रहे हो… वैसे भी इंसान के अच्छे कर्म ज्यादा मायने रखते हैं …मैं तो इसी बात पर विश्वास रखती हूं….

स्वरचित रचना

शालिनी श्रीवास्तव

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