चमकदार पत्थर

एक बार की बात है गुरु नानक देव महाराज के पास एक व्यक्ति आया और उनसे बोला बाबा मैं आत्महत्या करना चाहता हूं मैं अपने जीवन से अब थक चुका हूं कुछ भी काम करता हूं मुझे अपने काम में सफलता नहीं मिलती है यह जीवन मेरे अब किसी काम का नहीं है इसका कोई भी मूल्य नहीं रहा गया है मेरे लिए यह निरर्थक हो गया है.

गुरु नानक देव  जी ने तो पहले उस व्यक्ति की बातें सुनी उसके बाद उन्होंने एक चमकता हुआ  पत्थर दिया और बोला इसे ले जाकर बाजार में बेचो लेकिन याद रखना सिर्फ इसका कीमत पता करना है इसे बेचना नहीं है.

वह व्यक्ति ऐसा ही किया उसने उस  पत्थर को ले जाकर सबसे पहले एक कसाई  की दुकान में बेचने लगा कसाई ने देखा कि बड़ा चमकता हुआ पत्थर है इसे मांस काटने में बड़ा अच्छा रहेगा उसने उससे बोला कि भाई मैं उसे 1 किलो मांस में इस पत्थर को खरीद लूंगा क्या तुम देने को तैयार हो.  

व्यक्ति अब वहां से आगे बढ़ गया अब वह कुछ देर के बाद एक सब्जी वाले के पास गया और सब्जी वाले ने देखा कि यह बड़ा अनोखा पत्थर है उसने बोला कि भाई यह पत्थर मुझे दे दो इसके बदले में कोई भी 5 किलो सब्जी ले जाओ।  



व्यक्ति ने वहां से भी पत्थर उठा कर चल दिया और अब एक सुनार की दुकान में ले गया बेचने के लिए सुनार  पत्थर को देखा तो वह देखता ही रह गया क्योंकि उसने अपनी जिंदगी में इतना चमकदार पत्थर नहीं देखा था उसने सोचा कि अगर इस पत्थर को मैं खरीद लूंगा तो मैं इसके टुकड़े कर कर बहुत सारी अंगूठियां बनाऊंगा और बहुत सारे पैसे कमा लूंगा।

 सुनार ने उसे बोला कि भाई मैं इस पत्थर के 100 स्वर्ण मुद्राएं दूंगा।  क्या तुम बेचने को तैयार हो। उस व्यक्ति ने सुनार को जवाब दिया कि मेरे गुरु महाराज ने सिर्फ इसका दाम पता करने के लिए मुझे बोला है इसीलिए मैं इसे बेच नहीं सकता हूं क्योंकि यह कीमती पत्थर मेरा नहीं है बल्कि मेरे गुरु महाराज गुरु नानक देव के हैं।

जैसे ही वह व्यक्ति गुरु नानक देव जी के पास पहुंचा उन्होंने उससे पूछा कि तुम्हें अपने जीवन का मूल्य समझ आया या नहीं व्यक्ति ने अभी भी ना बोल कर कहा कि मुझे अभी भी समझ नहीं आया।  

गुरु नानक देव महाराज जी ने व्यक्ति से कहा कि अभी जो पत्थर तुम बेचने के लिए ले गए थे तुम्हारे साथ क्या हुआ व्यक्ति ने बताया कि अलग-अलग व्यक्तियों ने इसके अलग-अलग मूल्य बताएं।  गुरु नानक देव ने कहा यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है जिसकी जितनी क्षमता होती है वह उतना उसकी कीमत लगाता है इसीलिए तुम्हारा शरीर निरर्थक नहीं बल्कि सार्थक है और तुम्हारे जीवन का भी मूल्य है बस उस खरीदने वाले की नजर अभी तक तुम्हारे पर नहीं पड़ी है।

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