नंदू एक बरह बारह वर्षीय सातवीं कक्षा का छात्र था।वह मेहनती मेधावी अनुशासनप्रिय था।हमेशा कक्षा में प्रथम आता था जवकि वह साधनों के अभाव में पढ़ाई कर रहा था कारण वह निर्धन परिवार से था। उसकी मां दूसरों के घरों में झाड़ू पोंछा करके उसे पाल रही थी। उसका पिता शराबी था जो मेहनत मजदूरी कर के कमाता उसे शराब में खर्च कर देता। फिर पत्नी से पैसे माँगकर खर्च करता। वह तो जिन घरों में वह काम करती थी दो परिवार ऐसे थे जो उसके बेटे की पढाई में लगन देखकर उसकी अतिरिक्त मदद कर देते थे। कभी उसकी फीस भर देते ।अपने बच्चों की पुरानी पुस्तकें दे देते कभी स्टेशनरी पेन पेंसिल दे देते, यूनिफॉर्म बना देते ।
नंदू गरीब तो था किन्तु स्वाभिमानी भी बहुत था। वह कभी भी अमीर बच्चों के द्वारा दिया नाश्ता खाना नहीं खाता था क्योंकि यह जानता था कि बदले में उसके पास खिलाने के लिए कुछ भी नही है। अतः उसके कोई दोस्त नहीं थे। सब उसे हिकारत की नज़र से देखते वह झुग्गी झोपडी से आता था। वह इन बातों पर ध्यान न देकर केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता और समय निकाल कर अपनी माँ की मदद करता।
उसके पिता उसकी पढाई छुडाने के लिए बार-बार मां से कहते बड़ा हो गया है कितना पढाएगी | पढ़ा कर क्या कलेक्टर बनायेगी । काम पर भेज जो दो पैसे कमाए।
माँ बोलती उसके पढ़ने के दिन है उसकी तो पढ़ाई छुड़ा दूँ और तुम्हारी जो कमाने की उम्र है तुम पीकर पडे रहो। तुम्हें कुछ शर्म भी है। बेटा होशियार है पढना चाह रहा है तो क्यों न पढ़ाऊं।
वह विद्यालय का काम समय पर करता शिक्षकों को कभी शिकायत का मौका नहीं देता। सभी उसके व्यवहार से प्रसन्न थे ।
एक दिन उसकी मां बहुत बीमार हो गई, और वह काम पर नहीं जा पाई। वह एक घर सूचना देने गया और बोला आंटी आज मां नहीं आ पायेंगी और उन्होंने कहा है कि आप औरों को भी खबर कर दें।
फिर घर का काम करके विद्यालय जाता। उसे समय ही नहीं मिल पा रहा था गॄहकार्य करने का।
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शिक्षिका ने कक्षा में उससे बहुत कुछ कहा कि तुम झुग्गी झोपड़ी वाले पढ़ने के काबिल नहीं, तुम तो काम करने के लिए ही पैदा हुए हो वही करो,यह कहकर उसे कक्षा में बैंच पर खड़ा कर दिया।
यह बात नंदू के दिल को लग गई उसका स्वाभिमान आहत हुआ। तभी उसने निर्णय लिया कि अब वह विद्यालय नहीं आयेगा।काम करेगा जिसके लिए वह पैदा हुआ है। इसी कारण जब वह तीन दिन तक विद्यालय में नहीं आया तो दूसरे शिक्षको को चिंता हुई उसकी। जब उन्होंने बच्चों से पूछा तो वे बोले सर उसने पढ़ना छोड़ दिया है, अब वह कभी नहीं आयेगा।
जब यह बात प्राचार्या जी के पास पहुँची तो उन्होने कारण पता करने को कहा। जब शिक्षकों ने अन्य छात्रों से पूछा कि वह क्यों नहीं आ रहा है तब उन्होने तीन दिन पूर्व कक्षा में घटी घटना बता दी । प्राचार्या जी ने उस नई आई शिक्षिका को बुला कर पूरी जानकारी ली,और उसे समझाया कि किसी की विषम परिस्थिती के लिए उसे उत्तरदायी ठहराकर उसे इतना जलील करना, वो भी पूरी कक्षा के सामने क्या यह उचित हैॽ आप अभी नई आईं हो ।वह इन परिस्थितियों में भी अपनी पढाई पूरी लगन से करता है। प्रथम आता है।
शिक्षिका अपने अपने व्यवहार पर लज्जित थी, बोली मेम आगे से अब कभी ऐसा नहीं करूंगी ।
प्राचार्या जी ने नंदू को घर से बुलवाया उससे प्यार से पूछा कि तुमने यह पढ़ाई छोडने का निर्णय क्यों लिया । पहले तो चुप रहा फिर प्राचार्या जी के उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरने पर वह फफक पड़ा। रोते हुए बोला मैं गरीब हूं मेरे को पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। मुझे तो काम ही करना चाहिये क्योकि मेरी मां भी घरों में काम करती है ।
मुझे इतना जलील किया अब यहाँ मेरे को आने में डर लगता है।
प्राचार्या जी ने पूछा कि क्या कारण था जो तुम काम नहीं कर पाए।
वह रोते हुए बोला- मेरी माँ बहुत बीमार है मैं घर का काम भी करता हूं । मां को चाय दवाई देता हूं, फिर विद्यालय आता हूं। यहाँ से जाकर मूंगफली बेचता हूं क्योकि माँ की दवा की लिए पैसे नहीं है। मैं पैसे इकट्ठे कर रहा हूँ। इस सब में समय ही नहीं मिला गृहकार्य करने का ।
तो तुमने यह बात अपनी मेम को क्यों नहीं बताई।
मेम ने मेरी बात सुनी नहीं और डांटना शुरू कर दिया और सजा देदी। कक्षा मे सब मेरे ऊपर हंस रहे थे मुझे बहुत
बुरा लगा।
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प्रार्चायाजी ने उसकी मदद करनी चाही दवा के लिए पैसे देकर किन्तु वह विनम्रता से बोला मेम ,मैं आपसे ऐसे बिना काम किए पैसे कैसे ले सकता हूं।
प्रार्चायाजी जी ने उसे समझाकर दूसरे दिन से विद्यालय आने को कहा।
वह बोला – मेम सब मेरे ऊपर हंसेंगे। प्रार्चायाजी बोली कोई नही हंसेगा मैं सबको समझा दूंगीं । यह सुनते ही वह खुश हो गया और बोला कल से मैं जरूर आऊंगा।
प्राचार्य जी ने उसकी मां के लिए दवाइयों की व्यवस्था कर दी ,और दूसरे दिन प्रार्थना सभा में उसकी मेहनत और मां के प्रति आदर एवं सेवा भाव की सराहना कर सब बच्चों से उसका मजाक उड़ाने के बजाए उससे कुछ सीख लेने की सलाह दी।
और नंदू की पढ़ाई शुरू हो गई।
शिव कुमारी शुक्ला
स्व रचित मौलिक अप्रकाशित
28-10-23
कई शिक्षक पढ़ाई में कमजोर एवं गरीब छात्रों का कक्षा में उपहास उड़ाकर उन्हें जलील कर कठोर दण्ड देते हैं इससे वे हतोत्साहित हो पढ़ाई तक छोड़ देते हैं,यह सही नहीं है।शिक्षक को कक्षा में सब छात्रों को साथ लेकर चलना चाहिए। होशियार तो होशियार है ही कमजोर छात्रों का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।