अंजना जी की जेठानी कुछ समय के लिए उनके घर आईं थीं। वे उम्र में काफी बड़ी थीं और अपने जीवन के कठिन दौर से गुजर रही थीं। जीवन में समय का पहिया ऐसे घूमा कि अब वे खुद किसी के सहारे की तलाश में थीं। वे पहले से ही काफी धनवान थीं और अपने आर्थिक स्थिति के कारण उन्होंने अंजना जी और उनके परिवार को हमेशा तुच्छ समझा था। लेकिन आज उन्हें अपने अतीत की गलतियों का एहसास हो रहा था और वे किसी न किसी प्रकार से अपनी गलतियों को सुधारना चाह रही थीं।
चाची सास के जाने के बाद, अंजना जी की बहू गरिमा, जो हमेशा शांत रहती थी और किसी भी मामले में हस्तक्षेप करने से बचती थी, आज खुलकर बोल पड़ी। उसने अंजना जी से कहा, “माँ, आपको तो चाची जी को इतनी देर तक बिठाना ही नहीं चाहिए था, ऊपर से आपने उनकी हर बात की हामी भर दी… अपना समय भूल गई क्या जब उन्होंने कैसे हम सब पर झाड़ू मारकर अपने घर से निकाल दिया था और आज आप उनको ही इतना मान-सम्मान दे रही हैं।”
गरिमा हमेशा सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करती थी। उसे यह डर होता था कि यदि वह कुछ बोलेगी, तो बात बिगड़ सकती है। लेकिन आज वह अपने मन की बात बोलने से खुद को रोक नहीं पाई। उसे अपने परिवार के प्रति उस समय के अपमान और तिरस्कार की याद आ गई, जब चाची सास ने उनके ऊपर तरह-तरह के कटाक्ष किए थे। उस समय गरिमा और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, और उनके पास चाची सास की तरह अधिक संपत्ति नहीं थी। चाची सास ने हर अवसर पर उन्हें अपमानित किया था और उनकी आर्थिक स्थिति का मजाक उड़ाया था।
गरिमा की बात सुनकर अंजना जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बहू, मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ… सब कुछ ताजे चलचित्र की तरह मेरे सामने घूम रहा था। पर मैं सोच रही थी कि क्या सच में ऐसे दिन भी आ सकते हैं किसी के… जब हम साथ में रहते थे तब उनके पास हमसे ज्यादा धन-दौलत थी। उनकी संपत्ति का घमंड इतना था कि वह किसी को भी बिना सोचे-समझे अपमानित कर देती थीं। मुझे याद है जब हमने अलग होकर अपना घर बसाया, तब उन्होंने कैसे हमारा मजाक उड़ाया था। जब वे हमारे घर की टीवी देख कर कह रही थीं कि ‘हूंऽ इससे ज्यादा की औकात थी भी ना दीदी आपके बच्चों की… भाई साहब ने तो कभी कुछ जमा ही ना किया, सब बच्चों पर लगा दिया।’ उनके इन शब्दों से मुझे बहुत चोट पहुँची थी, पर मैं चुप रही।”
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अंजना जी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा, “आज समय बदल गया है। मेरे बच्चे अपने जीवन में आत्मनिर्भर हो चुके हैं और अपनी जिंदगी बना ली है। उनके अपने परिवार, अपने व्यवसाय हैं और वे खुश हैं। दूसरी ओर, चाची सास के बच्चे, जिन पर उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति लुटाई, आज उन्हें पूछते तक नहीं हैं। उनके पति के जाने के बाद उनके बच्चों ने सब कुछ अलग कर लिया और उनकी परवाह भी नहीं करते। अब वही चाची सास, जो कभी हमें तुच्छ समझती थीं, हमारे पास आकर अपने दर्द की कहानी सुनाती हैं। ऐसे में, जब उन्होंने हमारे सामने अपने दुखड़े रोए और राशन तक की कमी बताई, तो मैं कैसे मना कर देती?”
अंजना जी ने आगे कहा, “मैंने उनकी मदद का आश्वासन इसलिए दिया क्योंकि यह सोचकर ही उनकी हालत पर तरस आया कि किसी दिन किसी का इतना अहंकार टूट सकता है। उन्हें हमारे पास आकर सहायता माँगने में कितनी हिम्मत जुटानी पड़ी होगी, यह सोचकर ही मुझे उनके लिए सहानुभूति हो गई।”
गरिमा ने अंजना जी की बातों को ध्यान से सुना और अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था।
उसे समझ में आ गया था कि जो इंसान अपने घमंड के कारण दूसरों की तकलीफों को न समझ पाए, जब वही व्यक्ति खुद तकलीफ में आकर मदद माँगता है, तो यह उसकी मजबूरी का प्रतीक है। गरिमा ने भी अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए कहा, “माँ जी, आप सही कह रही हैं। जो हमेशा अपनी अकड़ में रहता हो और दूसरे की परिस्थितियों को कभी न समझे, उसका इस तरह मदद की गुहार लगाना उसकी मजबूरी ही दर्शाता है। अच्छा किया जो आपने उन्हें वही झाड़ू मारकर बाहर नहीं निकाला जैसा उन्होंने हमारे साथ किया था।”
अंजना जी ने गरिमा को समझाते हुए कहा, “बहू, सही में जीवन बहुत ही अनिश्चित है। कब किसकी जिंदगी किस दिशा में करवट ले ले, यह कोई नहीं जानता। हमें हर अतिथि का स्वागत करना चाहिए, चाहे वह हमारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करे। यह सोचकर कि कब किसे किसकी जरूरत पड़े, हमें दूसरों के प्रति दया और सम्मान बनाए रखना चाहिए।”
यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि हमें दूसरों की परिस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए और उन्हें सहारा देना चाहिए। यह संभव है कि आज हमारे पास सब कुछ हो, लेकिन किसी दिन हालात बदल सकते हैं और हमें दूसरों की मदद की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए, हमें हमेशा विनम्रता, सहानुभूति और आदर के साथ जीना चाहिए।
रश्मि प्रकाश