कीमत – स्वाती जितेश राठी : Moral Stories in Hindi

जहां कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थी, जहां कभी पायल की झंकार सुनाई पड़ती थी ….. आज वो घर अकेला, जर्जर खड़ा है। 

अपने मायके के घर के बाहर आँगन में खड़ी वान्या यही सोच रही थी कि एक समय था जब यहाँ उसकी और भाई की  हँसी,  मस्ती और लड़ाईयाँ गूँजा करती थी।

पापा और मम्मी का लाड़, दुलार, नसीहतें ,प्यार भरी डाँट  बरसती थी।

हर त्यौहार पर घर सजता था। पकवान बनते थे।

गीत, संगीत ,खुशियाँ होती थी।

दोस्तों की टोली की शैतानियों , पड़ोस की आँटीयों की बातों से गुलजार इस घर की शामें होती थी ।

फिर पापा के ऑफिस  से आने के बाद दिन भर के किस्सों की महफिल सजती थी।

माँ के हाथ के गरम खाने के स्वाद और पापा की सीख भरी कहानियों के साथ  निंदिया  की नगरी की सैर की जाती थी और सुबह माँ की प्यारी बोली के साथ होती थी।

फिर उन प्यारे दिनों को नजर लग गई जैसे हमारी खुद की ही शायद।वान्या की शादी के बाद पापा का गंभीर बिमारी से लड़ते हुए  जिंदगी की जंग हार जाना।

कुछ संभलने से पहले ही भाभी का भाई और भतीजे को लेकर देश छोड़कर  चले जाना और माँ का उस घर में अकेले रह जाना। वान्या आती जाती रहती पर माँ का अकेलापन कम ना कर पाती फिर एक दिन माँ भी उसे अकेला कर चली गई। 

जाने से पहले माँ यह घर वान्या को दे गई।  पर अब यहाँ आने का उसका मन ना करता यादें दर्द  जो देती थी।

घर अकेला रह गया था। पुराना और जर्जर  हो गया था।

वान्या  सोच में गुम थी कि तभी सरोज माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोली क्या सोच रही बेटा?

सोच रही हूँ माँ कि आखिर घर परिवार किसे कहते है?

अरे बिटिया **

एक  परिवार  जहाँ रहता है उस स्थान को  घर कहते है।

और माँ   ये परिवार और घर कैसे बनता हैं ?

ईंट, पत्थरों से, महंगी-महंगी चीजों से ?

  माँ  मुझे लगता है कि घर बनता हैं एक परिवार के साथ होने से |

कोई पुछेगा कैसे?

तो मैं कहुँगी कि….

पिता होते हैं घर की छत,जो हमे हर बुराई से बचाते हैं|

माँ होती हैं घर की जमीन ,जो हमे एक मजबूत आधार देती हैं|

भाई -बहन होते हैं इस घर की दिवारे , जो हमे सुरक्षा प्रदान करते हैं |  ये साथ ही तो परिवार  की एकता कहलाता है ,जो उसे हर विघटन से बचाता है।

हम अपना पूरा बचपन  इस घर मे

बिताते है बिना किसी चिंता के |

तो फिर  बड़े होने के बाद हम हमारे घर की छत और जमीन यानि माता – पिता और दीवारो यानि भाई – बहन को अपने आप से और अपने परिवार से अलग क्यों मान लेते है ? 

माना कि हम अपने जीवनसाथी को अपने बच्चों को एक नया उनका मनचाहा आशियाना देते हैं |

पर हमारा वो आशियाना जहाँ हमारा प्यारा बचपन बिता है, जहाँ हमारी खट्टी – मीठी यादे  बसी है , उसे हम खुद ही क्यों और कैसे तोड़ देते हैं ?

माता – पिता , भाई  – बहनो को अपने आप से अलग कर के हम उन्हे बेघर बेसहारा  नहीं करते हैं, बल्कि

सच तो  ये है कि एक नया आशियाना बनाते – बनाते हम  अपना खुद का ही आशियाना   खुद से ही छीन लेते हैं  , कही ना कही हम खुद को ही बेघर और बेसहारा कर लेते है | अपना ही परिवार  अपने ही हाथों बर्बाद  कर देते है।

कहाँ खो जाती है हमारी वो  एकता और प्यार?

क्या हमारे संस्कारों पर हमारी  सोच हमारी थोड़ी सी खुदगजीऺ इतनी  भारी पड़ जाती हैं कि हम अपना ही घर  परिवार तोड़ने से पहले एक बार भी नहीं सोचते |

हम कैसे अपने ही हाथों अपनी सबसे कीमती वस्तु गँवा देते है माँ।

दुनिया का दस्तुर यहीं है बेटा तु क्यों अपना मन छोटा करती है। हम सब  है ना तेरे साथ।

हाँ माँ 

आपकी वजह से आज मेरा घर मकान से फिर घर बन गया, मेरा मायका फिर बस गया।

उसे याद आया कैसे कुछ समय पहले उसे सरोज माँ सड़क पर बेहोश मिली थी। वो उन्हें घर ले आई पूछने पर पता चला कि उनका कोई  नहीं । कोई  ठिकाना नहीं।

वो सोच में पड़ गई  थी और तब उसके पति और बच्चों ने उसका साथ दिया ।

अपने मायके के घर को सही कराकर उसने उनके रहने की व्यवस्था की थी। फिर धीरे धीरे कुछ  बेसहारा औरतें और बच्चें वहाँ अपना आशियाना बनाने आ गए  थे। 

आज उसका वो उजड़ा मकान फिर उसका मायका बन चुका था। 

यहाँ कोई  उसे बेटी कहता तो कोई  बहन या बुआ ।

मायके के खोए रिश्तें फिर मिल गए  थे उसे।

जो घर खुद को खोकर अपनों को खोकर सुनसान हो गया था  आज वही  घर फिर जी उठा  है, वही खिलखिलाहटें और अपनापन वहाँ फिर रच बस  गया था।उसका  बचपन फिर लोट आया था। वान्या  की आँखो में आँसु और होठों पर मुस्कान थी क्योंकि उसके जीवन की सबसे कीमती पूँजी उसके पास थी।

स्वरचित 

स्वाती जितेश राठी

 

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