ओडिटोरियम में व्हीलचेयर पर बैठी स्मिता के आते ही तालियों की गड़गड़ाह से स्मिता का स्वागत किया गया , कुर्सियों पर चारों तरफ़ बैठे हुए लोग अपनी अपनी जगह उठ कर खड़े हो गए और उन्होंने तालियां बजाकर स्मिता का स्वागत किया। मंच तक पहुंचते पहुंचते स्मिता के गले में फूलों की कई मालाएं डल चुकी थी। मंच पर भी स्मिता का भव्य स्वागत किया गया। मुख्य अतिथि के डीप प्रजव्वलित करने के बाद स्मिता को उनके पास की कुर्सी पर बैठाया गया।
कुछ देर तक मुख्य अतिथि का भाषण चला , उन्होंने स्मिता के हौसले की जमकर तारीफ की , वही और लोगों ने भी स्मिता के लिए अपने विचार सबके सामने रखे।
सबके विचार रखने के बाद अब बारी आई स्मिता के बोलने की , मंच पर स्मिता को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया गया। स्मिता ने माइक के पास आकर पहले तो सबका धन्यवाद और आभार जताया , उसके बाद उसने कहा कि आज मैं जो कुछ कहने जा रही हूँ , उन्हें न तो सिर्फ दो शब्दों में बयान किया जा सकता है न ही उस के लिए मेरे पास शब्द हैं। आप सब बस इतना समझ लीजिये कि आज मैं जो कुछ कहूँगी , वो मेरी भावनाएं हैं मेरी ज़िंदगी की सच्चाई है।
इतना कहकर स्मिता ने आगे अपनी बात कहनी शुरू की।
मैं एक बहुत छोटे से गांव से आती हूँ , मेरे गाँव में बिजली पानी सड़कें सब नाम मात्र हैं। सुविधाओं के अभाव में हमने अपना बचपन गुज़ारा है और हमारे माता पिता ने अपनजी जवानी। गाँव में कोई स्कूल भी नहीं था , जिसके चलते हमें पैदल ही 5 किलोमीटर आगे बने एक छोटे से स्कूल में जाना पड़ता था।
मुझे बचपन से पढ़ने का बहुत शोक था तो ये 5 किलोमीटर पैदल आना और इतना ही पैदल जाना , मैंने इसे कभी मुश्किल या मुसीबत नहीं समझा।लेकिन स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब आगे की पढ़ाई की बात आई तो गांव के आसपास दूर दूर तक कोई कॉलेज नहीं था , आगे की पढ़ाई के लिए शहर आना ही एकमात्र विकल्प था। मैं आगे पढ़ना चाहती थी , कुछ बनना चाहती थी लेकिन घर में दादी, माँ,भाई शहर में भेजकर अकेले रहने और पढ़ने के सख्त खिलाफ थे। मैं अंदर ही अंदर घुटती जा रही थी , मेरी इस घुटन को किसी ने महसूस नहीं किया और आगे की पढाई का न सोचकर मेरे लिए रिश्ते ढूंढे जाने लगे। मैं पूरी तरह से टूट चुकी थी और शादी को ही अपनी नियति समझकर चुपचाप हाँ करदी।
लेकिन मेरे अंदर पढाई को लेकर एक तूफ़ान मचा था , जिसे किसी ने अगर महसूस किया तो वो तो या मैं खुद थी या मेरे पिता जी।
मेरे पिता जी जो एक बहुत सीधे सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं, जिन्होंने कभी घरवालों के आगे अपनी कोई इच्छा व्यक्त नहीं की। यहां तक कि उन्होंने हर किसी की बात को सर झुका के माना और सबकी हर इच्छा पूरी की , उन्होंने मेरे अंदर पढाई के जूनून को महसूस करके पहली बार घरवालों के फैसले को मानने से इंकार कर दिया और मुझे आगे की पढ़ाई के लिए शहर में अच्छा कॉलेज देखने की इजाज़त दे दी।
हालंकि उनके इस फैसले से सारा घर नाराज़ था लेकिन इस बार उन्होंने मेरी पढाई की इच्छा को घरवालों की मर्ज़ी की बलि नहीं चढ़ने दिया और मेरा साथ दिया।
सबकी नाराज़गी मोल लेकर पिता जी अगले ही दिन मुझे शहर ले आये , मेरे नंबर अच्छे आने की वजह से शहर के एक बड़े कॉलेज में मुझे एडमिशन मिल गया , पिता जी ने मेरे रहने खाने किताबों आदि की व्यवस्था अपनी जमा पूंजी में से कर दी। मेरी आँखों में पिता जी के लिए आंसू भर आये , उस वक़्त पिता जी ने मुझे सीने से लगा लिया और ढेरों आशीर्वाद देते हुए कहा कि “बेटा, घरवालों के खिलाफ़ जा कर मैंने आज जो फ़ैसला तेरे लिए लिया है , उसका मान रखना , सबको कुछ बन कर दिखाना “. मैंने पिता जी का हाथ थामकर उनसे मुझपर भरोसा बनाये रखने की बात कही।
सारा इंतेज़ाम करने के बाद दो दिन पिता जी गाँव लौट गए , इधर मैं दिन रात पढाई में लग गई। लेकिन शहर में रहकर पता चला कि यहाँ रोज़ाना के खर्चे भी बहुत ज़्यादा है , पिता जी अपनी जमा पूंजी में से काफी पैसे मेरी पढ़ाई पर लगा चुके थे और वो एक छोटे से किसान थे , गांव में रोज़ना का कमाने खाने वाले व्यक्ति थे ,जो कुछ उन्होंने जोड़ा था, उसका अधिकांश हिस्सा घर बनाने , दादी के इलाज और अब मेरी पढाई के लिए शहर में खर्च हो चुका था , भाई का भी कोई ख़ास काम नहीं था और फिर उसका अपना परिवार बच्चे थे।
यही सब सोचकर मैंने फ़ैसला किया कि मैं कोई पार्ट टाइम नौकरी करुँगी ताकि पिता जी पर बोझ भी न पड़े और मेरी पढाई भी होती रहे , मैंने एक छोटी सी कंपनी में इवनिंग जॉब करनी शुरू करदी। वहां से मुझे जो पैसे मिलते उससे मेरी पढाई का और रहने का ख़र्च निकल जाता था।
घर में जब सबको मेरी नौकरी की बात चली तो पिता जी ने एक बार फिर मेरा साथ दिया, लेकिन उन्होंने मुझसे कहा कि बेटा, नौकरी की ज़रूरत नहीं है , अभी मैं ज़िंदा हूँ लेकिन मेरे समझाने से पिता जी मान गए।
मेरी नौकरी और पढाई चलती रही और मैंने अपना MBA कम्पलीट कर लिया और अब मुझे एक बड़ी कंपनी में एक अच्छे पैकेज पर नौकरी भी मिल गई। इतनी अच्छी पोस्ट पर नौकरी मिलने के बाद मेरे घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई, माँ पिता जी ने मुझे सीने से लगा लिया , दादी ने ढेरों आशीर्वाद दे डाले , भाई भाभी ख़ुशी से फुले नहीं समा रहे थे.
शहर में नौकरी के साथ साथ मुझे घर , गाड़ी भी कंपनी की तरफ से दी गई। मैं अपने परिवार को भी शहर ले आई और यहाँ आकर पिता जी और भाई ने भी अपनी एक दूकान खोल ली जो कुछ ही दिनों में अच्छी चलने लगी। सब कुछ सही चल रहा था , अब घर में मेरी शादी की बात चलने लगी और एक अच्छा लड़का देखकर मेरी शादी उससे कराने का फैसला लिया गया। मेरी शादी की तैयारियां ज़ोरों शोरों से चल रही थी कि एक दिन ऐसा आया जिसने मुझे अंधकार में धकेल दिया।
मैं ऑफिस से निकल कर अपनी कार में बैठकर घर की ओर जा ही रही थी कि अचानक से एक तेज़ रफ़्तार ट्रक ने मेरी कार को पीछे से ज़ोरदार धक्का मार दिया , इसके बाद क्या हुआ कैसे हुआ , मुझे कुछ पता ही नहीं चला। जब होश आया तो मैंने ख़ुद को हॉस्पिटल में पाया।
मेरे घरवाले मेरे दोनों तरफ़ खड़े थे और ज़ार ज़ार रोये जा रहे थे। मैंने दर्द से कराहते हुए उठने की कोशिश की तो मुझसे उठा नहीं गया , कुछ देर में ही मुझे महसूस हो चुका था कि मैंने अपने दोनों पैर इस हादसे में खो दिए हैं। मैं फूट फूट कर रोने लगी। किसी तरह पिता जी और बाकि घरवालों ने मुझे संभाला
कुछ दिन बाद मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई , मैं घर आ गई ,,रोते तड़पते मेरे दिन बिस्तर पर गुज़रने लगे , मेरा शादी का रिश्ता भी ख़त्म हो गया , हालांकि कुछ पैसों की मदद कंपनी से मिली लेकिन मुझे नौकरी से हटा दिया गया ,,,घर गाड़ी सब वापस ले लिए गए।
जो घर वाले मेरी नौकरी, घर, गाड़ी को देखकर फुले नहीं समाये थे, वही घरवाले मेरी दादी,भाई , भाभी और कभी कभी माँ भी मुझे अपाहिज देखकर मुझे बोझ समझने लगे थे , इसका क्या होगा , अब तो शादी भी नहीं हो पायेगी , सारी ज़िंदगी हम कैसे संभालेंगे इसे ,,,यही सब बातें हर रोज़ पल पल मेरे कानों में पड़ती रहती थी , लेकिन पिता जी के मुंह से मैंने कभी अपने लिए ये शब्द नहीं सुने , वो सिर्फ मेरी दवाई टाइम से देने , मेरे खाने पीने का ध्यान रखने की बात किया करते थे , मेरे कमरे में आकर उन्होंने कभी मेरे कटे हुए पैरों का ज़िक्र तक नहीं किया , बस मुझसे बहुत सी ऐसी बातें करते थे जिन्हें सुनते सुनते मैं अपना दर्द अपना दुख कुछ देर के लिए भूल जाती थी और हंसने लगती थी।
इस बार भी मेरे साथ सिर्फ मेरे पिता जी ही खड़े थे।
मेरी सेहत में सुधार होने लगा था लेकिन पैर तो नहीं रहे थे , मुझे एक अपाहिज की ज़िंदगी जीनी पड़ रही थी। घरवालों की बातें मुझे अंदर तक चीर देती थी।
एक दिन मैंने पिता जी से कहा कि मैं जीना नहीं चाहती , मुझे आप सब पर बोझ नहीं बनना।
पिता जी बिना कुछ बोले उठाकर चले गए , कुछ दिन बाद पिता जी मुझे व्हील चेयर पर बैठाकर घर के दूसरे हिस्से में ले गए। वहां जाकर मैंने देखा कि कुछ गरीब और मजबूर महिलायें वहां बैठी हैं , मैंने पिता जी की तरफ़ देखा तो उन्होंने कहा कि आज से तुम इन सब को हाथ की कढ़ाई और बुनाई सिखाओगी , पिता जी जानते थे कि माँ ने मुझे बहुत अच्छे से सिलाई कढ़ाई और बुनाई सिखाई थी। साथ ही इनके बच्चो को पढ़ाई भी करवाओगी।
पहले तो मैंने पिता जी को न बोला लेकिन पिता जी के हौसला देने पर मैंने हाँ कर दी।
मैंने व्हीलचेयर पर बैठे बैठे उन औरतों को ये हुनर सीखाना शुरू कर दिया , और दूसरी तरफ उनके बच्चों को पढ़ाना भी शुरु कर दिया। उनके लिए मैंने एक स्कूल खोलने का निर्णय लिया और पिता जी के दिन रात मेहनत करने और दफ्तरों के चक्कर काटने से मुझे सारी फॉर्मलिटीज पूरी कर एक स्कूल खोलने की परमिशन मिल गई। पिता जी ने मेरी शादी में लगने वाले पैसों को मेरे स्कूल और मेरे सिलाई कड़ाई के बिज़नेस में लगा दिया।
अब एक तरफ मेरा छोटा सा स्कूल था ,तो दूसरी तरफ मेरी मदद से उन औरतों द्वारा तैयार किये गए सूट, साड़ी, शाल , जिनकी डिमांड न सिर्फ शहर बल्कि बाहर भी होने लगी। अब मैं अपाहिज नहीं रही , मेरी पहचान एक कामयाब बिज़नेस वुमन के रूप में होने लगी।
मेरा बिज़नेस बहुत तेज़ी से आगे बढ़ा गया, औरतों को रोज़गार मिलता रहा, बच्चों को स्कूल मिल गया और मुझे मेरे जीने का मक़सद।
आज मुझे इस व्हीलचेयर पर 10 साल हो गए हैं लेकिन आज मैं अपाहिज नहीं हूँ। आज मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ , और ये सब हुआ है मेरे पिता के मुझ पर विश्वास और मेहनत की वजह से। आज आप लोग मेरा सम्मान कर रहे हैं कि मैंने गरीब औरतों को हुनर सीखा कर उन्हें रोज़गार दिया , उनके बच्चो को पढ़ाई की तरफ़ लाई लेकिन आज मैं चाहती हूँ कि ये सम्मान उसके असली हक़दार को मिलना चाहिए और वो हैं मेरे पिता , जो आज भी मेरी व्हीलचेयर खुद मंच तक लाये हैं।
इतना बोलकर स्मिता आंसू भरी आँखों से पिता की तरफ देखा , सभी की आँखों में जहाँ एक तरफ़ आंसू थे वही दूसरी तरफ स्मिता और उसके पिता के लिए भरपूर सम्मान। स्मिता का पूरा परिवार भी आज यहां मौजूद था और उनकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे और साथ ही बेटी के लिए ख़ुशी भी थी।
मंच पर मौजूद मुख्य अतिथि ने स्मिता के पिता का सम्मान किया उन्हें बधाई दी और साथ ही स्मिता का सम्मान भी किया गया।
स्मिता के पिता आज बहुत फ़क्र महसूस कर रहे थे , वो भरे गले से सिर्फ इतना ही कह पाए कि अगले जन्म भी स्मिता ही बेटी के रूप में उनके घर जन्म ले।
एक बार फिर से सारा हॉल तालियों की गड़गड़हट से गूंज उठा।