मोहन (फ़ोन पर)- ललित जी, पाँच बज गए है, सैर पर चला जाए।
ललित- हाँ। मैं बस 10 मिनट में आया, जब तक तुम और लोगों को बुला लो।
ललित-देवकी, गरम पानी तो लाना, फिर मैं सैर पर निकलूँ।
देवकी (पानी देते हुए)-लौटते वक़्त मंडी से फल और सब्ज़ियाँ लेते आना। मैंने लिस्ट बना दी है, कुछ भूलिएगा नहीं।
ललित- तुम्हें शर्म नहीं आती 62 साल के बूढ़े से काम कराते हुए।
देवकी-अच्छा आप बूढ़े, परसों मिश्रा जी के पोते ने बाबा बोल दिया था, तो बहुत बड़बड़ा रहे थे, कि कहा से मैं बूढ़ा दिखता हूँ। अब क्या हुआ?
ललित- सही कहा गया है, एक बार इंसान भगवान से जीत सकता है पर पत्नी से नहीं। अच्छा मैं चलता हूँ।
मोहन और बाक़ी लोग – ललित, सुबह सबको सैर पर चलने का नियम तुमने बनाया हैं, और तुम ही लेट हो जाते हो।
ललित- अच्छा बाबा ठीक है कल से नहीं होगा।
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कहानी में आगे बढ़ने से पहले मैं इस कहानी के मुख्य पात्र देवकी और ललित जी से आप सभी का परिचय करा देती हूँ-
ललित और देवकी जी आनंदपुर कॉलोनी में 40 साल से रह रहे है, बहुत ही सज्जन और ख़ुशमिज़ाज लोग है। ललित जी दो साल पहले कृषि विभाग में अनुभाग अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए है, पेंशन भी मिलती है। समाज में नाम और नेक व्यवहार से जाने जाते है दोनों पति-पत्नी। आज तक ना उनकी किसी से कोई बहस हुई है और ना कोई झगड़ा। मोहल्ले में कोई भी कही जाता है तो निश्चिंत होकर जाता है क्योंकि ललित जी कॉलोनी में किसी अजनबी को आने नहीं देते और कही भी कुछ संदेह लगता है तुरंत पहुँच जाते है जानने कि क्या माजरा है। साथ ही देवकी जी, गृह-चिकित्सिका कह लीजिए, कोई ऐसी चोट या बीमारी नहीं, जिसका उपचार वो ना जानती हो। दो बच्चे है- कार्तिक और कीर्ति। बिटिया की पिछले साल ही शादी की है और कार्तिक पोस्ट ऑफ़िस में जॉब करता है। अब आगे-
देवकी- कार्तिक बेटा, पापा को फ़ोन लगा, देख तो कहा रह गए। पक्का ये किसी के झगड़े को सुलझा रहे होंगे या किसी की मदद कर रहे होंगे।
कार्तिक- लो मम्मी। पापा आ गए।
ललित (हँसते हुए)- क्यों अभी नहीं आना था क्या ?
देवकी-सब्ज़ी का थैला दीजिए, आपको पता है आज कीर्ति और दामाद बाबू आ हैं, इतना कुछ बनाना है।
ललित-कोई पहली बार तो आ नहीं रहे है, जो इतना परेशान हो वैसे भी विक्रम (कीर्ति का पति) को इतनी आवभगत पसंद नहीं। वो अपने आपको घर का बेटा मानता है दामाद नहीं। परेशान मत होइए देवकी जी, कुछ मदद हम भी करा दें।
देवकी- आप कुछ मत करिए, बस अपनी दिनचर्या पूरी करिए, उसे करने में ही आप 12 बजा देंगे।
कार्तिक-मम्मी मिठाई में रसगुल्ले ले आता हूँ, दीदी को बहुत पसंद है।
देवकी- ठीक है ले आ और साथ में सिंधी मठरी भी ले आना। जल्दी आना अपने पापा की तरह लेटलतीफ़ी मत करना।
ललित अपना कुर्ता पैजामा दिखाते हुए- देखिए मोहतरमा, कैसे लग रहे है हम।
देवकी-62 साल के जवान। दोनों हँस पड़ते है।
कार्तिक आवाज़ लगाते हुए- मम्मी-पापा। जीजा जी आ गए।
विक्रम (ललित का दामाद) दोनों के पैर छूते हुए- और कैसे है आप सब।
ललित- कितनी बार कहा है दामाद पैर नहीं छूते है।
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विक्रम (ललित का दामाद)-मैं आपका दामाद कबसे बन गया, मैं तो आपका बेटा हूँ ना।
देवकी की नजरे इधर-उधर अपनी बिटिया को ढूँढ रही है।
देवकी-दामाद बाबू,कीर्ति नज़र नहीं आ रही।
विक्रम- मम्मी, वो साथ नहीं आ पाई, उसके ऑफिस में मीटिंग थी तो इसलिए।
उधर कीर्ति कार्तिक की मदद से पीछे के दरवाज़े से रसोईघर में छुप जाती है।
देवकी बड़बड़ाते हुए ऐसी भी कौन सी मीटिंग कि मम्मी से मिलने नहीं आई।
देवकी जैसे रसोईघर में जाती है वैसे ही कीर्ति सामने आ जाती है, देवकी चौंक जाती है।
कीर्ति बच्चों की तरह खिलखिलाते हुए कहती है- बुद्धू बनाया, बड़ा मजा आया।
देवकी भी उसके सर पर टिप देते हुए हँस पड़ती है और कहती है कि शादी हो गई है पर बचपना नहीं गया।
कीर्ति-बेटी किसकी हूँ, ललित पाठक जी की। पता लगना चाहिए, क्यों पापा।
ललित-बेटा क्यों मुझे डाँट खिलाने के पीछे पड़ी है, वैसे भी सुबह से तेरी मम्मी पीछे पड़ी हुई है।
सब चाय नाश्ता करते है।
कार्तिक- मम्मी मैं कुछ काम से ऑफिस जा रहा हूँ। जल्दी आ जाऊँगा। दीदी को मेरे आने तक रोक कर रखना।
कीर्ति- एक शर्त पर रुकूँगी, जब तू शर्मा जी के यहाँ से चटपटे पानी के बतासे लेकर आएगा।
ठीक है कहकर कार्तिक ऑफिस के लिए निकलता है।
कीर्ति और देवकी कमरे में जाकर बातें करने लगते है ललित और विक्रम मैच देखने लगते है।
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देवकी-सुनिए जी, आपके मोबाइल पर किसी का फ़ोन आ रहा है।
ललित- अगर नाम आ रहा है तो दे जाओ वरना चार्जिंग पर लगा रहने दीजिए। ये कंपनी वाले बहुत परेशान करते है।
देवकी जी तीन चार बार अनदेखा करती है पर जब लगातार एक ही नंबर से फ़ोन आता है तो फ़ोन ले जाकर ललित जी को थमा देती है, और ऊपर कीर्ति के पास आ जाती है।
ललित- हैलो,कौन बोल रहा है?
फ़ोन के दूसरी तरफ़-हैलो,मैं इंदिरा नगर थाने से बोल रहा हूँ। आप कार्तिक को जानते है?
ललित (घबराते हुए)-हाँ जी, वो मेरा बेटा है।
फ़ोन के दूसरी तरफ़- सुभाष चौक पर इनका एक्सीडेंट हुआ है, आप जल्दी गंगाराम हॉस्पिटल पहुँचिए।
ललित-विक्रम जल्दी मेरे साथ चल।
विक्रम- क्या हुआ पापा।
ललित-रास्ते में बताता हूँ।
विक्रम और ललित हॉस्पिटल पहुँचते है। वहाँ डॉक्टर उन्हें बताते है कि लोगो का कहना है कि किसी को बचाने के चक्कर में इनका एक्सीडेंट हुआ है और ट्रक इनके पैर के ऊपर से निकल गया, जिससे इनके कमर से नीचे का हिस्सा काम नही कर रहा है।
विक्रम ललित जी को वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठाता है और कहता है पापा बिल्कुल परेशान मत होइए सब ठीक हो जाएगा।
ललित जी- विक्रम मैं घर जाता हूँ और कीर्ति और देवकी को बताता हूँ, क्योंकि ये बात फ़ोन पर बताना ठीक नहीं।
देवकी और कीर्ति को जब ये पता चलता है तो उनका तो रो रोकर बुरा हाल हो जाता है।
ललित-ये वक़्त रोने का नहीं है, बल्कि कार्तिक के #दर्द को बाँटने का है। कोई उसके सामने रोएगा नहीं।
हफ़्ते भर बाद कार्तिक घर आ जाता है। कार्तिक अंदर से बहुत निराश और दुखी था कि इस समस्या से कब निजात मिलेगी, और वो कब फिर से पहले की तरह बिलकुल ठीक हो पाएगा।
ललित उसके चेहरे पर परेशानी और उदासी को देखते हुए कहते है-तू कह रहा था ना कि तू जॉब से थोड़े दिन छुट्टी चाहता है, बहुत बोर हो गया है, अब थोड़े दिन छुट्टी पर रहेगा तो अच्छा लगेगा और साथ में हम दोनों अपने संगीत प्रेम को भी आगे बढ़ाएँगे। ये कहते हुए ललित जी गाना गाते है-
ओ दिल की तन्हाई को,
दिल की तन्हाई को आवाज़ बना लेते है,
दर्द जब हद से गुज़रता हैं तो गा लेते है।
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ललित जी के साथ सब गाने में उनका साथ देते है, और माहौल थोड़ा हल्का हो जाता है।
मेरे आदरणीय पाठकों, ये बात सत्य है कि संसार में कोई इंसान ऐसा नहीं है जिसने दर्द ना सहा हो, लेकिन सबका दर्द का सामना करने का तरीक़ा अलग होता है। मुझे तो ललित जी का तरीक़ा बहुत पसंद आया, क्योंकि घाव किसी एक को होता है पर उसका दर्द उसके साथ साथ उसके अपनों को भी होता है और अगर हम उस दर्द का ख़ुशी ख़ुशी सामना करते है तो हमें उसे सहने की ताक़त और संबल भी मिलता है, क्योंकि कहा गया है-
ज़िंदगी प्यार का गीत है,
इसे हर दिल को गाना पड़ेगा,
ज़िंदगी गम का सागर भी है,
हँसके उस पार जाना पड़ेगा।
धन्यवाद।
#दर्द
स्वरचित।
रश्मि सिंह