सहारा तो अपने ही बनते हैं !! – मीनू झा 

मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं है कह तो दिया है पापाजी ने पर आपको लगता है कि इस उम्र में उनका ये गुस्सा सही है आपने तो उन्हें यहां बुलाने के लिए फोन किया था ना और बात कहां से कहां चली गई …अकेले हैं दोनों कहीं कोई परेशानी ना आ गई तो?

कुछ नहीं होगा…दो चार दिन बाद करूंगा फिर फोन..अरे मैंने कुछ ग़लत बोला क्या?? आए दिन कभी किसी दोस्त को, रिश्तेदार को सहकर्मी को बुलाते रहते हैं…ठीक है बुलाते हैं तो कोई बात नहीं अब उनके लिए लंबी चौड़ी तैयारियां भी शुरू कर देते हैं…खाने में  विभिन्न व्यंजन, नमकीन और मिठाई तो चलो फिर भी ठीक है जाते वक्त सबको गिफ्ट भी पकड़ाना जरूरी है क्या??

विनीत… शुरू से उन्होंने इतना ही किया है सबका तो अब ये सब उनकी आदत बन चुकी है ।

पर दिव्या…जो आदत तकलीफ़ देने लगे उसे बदलना जरूरी है ..अब पापा रिटायर हो चुके हैं सीमित पैसे उन्हें पेंशन के रूप में मिलते हैं स्वाभिमानी इतने की ना मुझसे लेंगे ना दीदी से…ठीक है पैसों के बारे में नहीं सोचते तो कोई बात नहीं पर मम्मी की भी तो अब उम्र होने चली एक काम करती है बैठ जाती है उसपर उनकी भी आदत ऐसी है कि कामवाली रखना पसंद नहीं है….अब ऐसे हालातो मे दोनों एक दूसरे का ख्याल रख लें यही बहुत है…पर नहीं…सबको बुलाते रहते हैं…और मैंने पैसे से मदद करने और मां के लिए सहायिका रखने की बात की तो गुस्सा हो उठे और फोन भी काट दिया..कहने लगे मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं है…जैसे अब तक कटी जिंदगी आगे भी काट लेंगे।

आप शांत हो जाइए… मैं जीजी से कहूंगी उनसे बात करें..–दिव्या ने समझाया

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जीजी…कल इन्होंने पापाजी को फोन किया था,उनदोनो की तबीयत का हाल कुछ सही नहीं चल रहा…पर पापाजी ने कहा दिया कि परसों दीपक पत्नी के साथ आ रहा है और दो तीन दिन बाद मामीजी और मामाजी आने वाले हैं…उसपर इन्होंने कहा  सबको मना कर दीजिए और कह दीजिए कि आप हमारे पास चेकअप के लिए आ रहे हैं..अभी किसी की आवभगत से ज्यादा जरूरी आपदोनो की सेहत है।

पापाजी मानने और आने को तैयार ही नहीं हो रहे थे तो इन्होंने थोड़े कड़े लहजे में कहा दिया —आपके ये जितने मित्र और रिश्तेदार हैं ना सबके सब सिर्फ हंसने बोलने टाइमपास करने वाले हैं अपने मतलब से आपके पास आते हैं और आपके स्वस्थ रहने पर ही आने वाले है,आपको जब सहारे की जरूरत पड़ेगी ना तो कोई नहीं होगा…बेटे और बेटी के अलावा।



उसी बात पर पापाजी तुनक उठे और कह दिया कि मुझे किसी भी सहारे की जरूरत ही नहीं है,और वो अब हमारे पास आएंगे ही नहीं…अब जीजी आप ही समझाइए ना पापाजी और मम्मी जी को,ये भी बहुत तनाव में हैं कल से..—दिव्या ने ननद विम्मी से कातर स्वरों में कहा।

तुम चिंता मत करो भाभी…बुरा तो मुझे भी लगता है अब चैन से बेटे बहू के साथ रहने की उम्र में वो अपने घर पर रहते हैं और मेहमानों को बुला बुलाकर सबकी तीमारदारी करते रहते हैं… मैं देखती हूं ऐसे पापा का जिद्दी स्वभाव तो किसी से छुपा नहीं है पर मैं कोशिश करती हूं मनाने की उनको–विम्मी ने भाभी को समझाया।

अगले दिन विम्मी ने फोन किया तो उमेश जी बाज़ार में थे..मालती को बुखार था तो उसकी दवा ले रहे थे।

मालती की तबीयत ठीक नहीं वो तो उठ भी नहीं पा रही बेड से…दीपक और उसकी पत्नी आ रहे हैं तो वहीं सामान वगैरह लेने आया था…पर तुम्हारी मम्मी तो मुझे नहीं लगता कुछ बना पाएगी…और मुझे तो खिचड़ी के अलावा कुछ आता भी नहीं–उमेश जी परेशान से थे।

तो पापा खिचड़ी ही बना लीजिए ना…दीपक आपका भांजा है कोई दूसरा थोड़े ही है जो आपकी मजबूरी नहीं समझेगा…और रही बात शाम की तो उसकी पत्नी भी आ रही है ना शाम का खाना वो बना देगी…मम्मी को थोड़ा आराम भी हो जाएगा ,तीन दिन रहेंगे ना वो लोग?

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हां बोला तो है तीन दिन रहने का…तुम ठीक कह रही हो विम्मी बेटा वो कोई दूसरे तो है नहीं मैं बेकार ही इतना सोच रहा हूं…वहीं करता हूं

दीपक और उसकी पत्नी को चाय नमकीन और मिठाइयां दिया उमेश जी ने..मालती तो बेड पर ही पड़ी थी।

खाने में खिचड़ी देखकर दीपक बोला–

कोई बात नहीं मामाजी… अभी तो हम तीन दिन यहां है ना,सोना सबकुछ संभाल लेगी..आप तनाव ना लें,घर पर तो सब यही करती है यहां भी कर लेगी।



उमेश जी प्रसन्नचित हो उठे दीपक की बात सुनकर ,पर सोना का चढ़ा हुआ चेहरा उन्हें नहीं दिखा क्योंकि वो उसकी बगल में बैठे थे।

मैं कबसे कह रही थी कि आफिशियल टूर में आए हो किसी होटल में चलते हैं पर नहीं इनको तो पैसे बचाने थे… वहां तुम्हारे मां बाप की चाकरी करूं यहां इन दोनों की..मेरा टिकट कटा दो मैं वापस चली जाऊंगी…या फिर कभी चलो यहां से किसी होटल में रहते हैं मुझसे नहीं होगा काम…आराम करने आई हूं या किसी की नौकरानी बनने

धीरे बोलो सोना.. चलेंगे पर अभी तो आए हैं अभी निकलना अच्छा नहीं लगेगा…आज भर रह लो कल चलेंगे।

तुम चलते हो या मैं निकलूं… वैसे भी खिचड़ी खाकर मुंह का स्वाद बिगड़ा पड़ा है…अरे बना नहीं सकते थे तो होटल से मंगा लेते… इन लोगों के इसी आवभगत की तारीफ के कशीदे पढता है सारा परिवार?

ठंड का दिन होने के कारण सारे पंखे तक बंद थे तो सारी आवाज उमेश जी तक जा रही थी …मालती बेचारी को थोड़ा सा आराम हुआ था और नींद आई थी उतनी तेज आवाज से वो भी उठकर बैठ गई।

पंद्रह मिनट बाद ही दीपक अपनी पत्नी के साथ निकल गया।उमेश जी जो गिफ्ट पैक करवा लाए थे उनके लिए वो देने की भी इच्छा नहीं हुई उनकी मन इतना टूट गया था उनकी बात सुनकर।

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दो दिन बाद मालती के भाई भाभी आ रहे थे उन्हें अपने बेटे की लड़की देखना था वहां… उमेश जी ने उन्हें फोन लगाया…

भाईजी..मालती की तबीयत आजकल सही नहीं चल रही..आप आएंगे तो अपने सहायक को भी साथ लेते आइएगा…वरना आपको दिक्कतें हो जाएंगी यहां पर!–उमेश जी जानते थे कि उनके घर पर एक चौबीस घंटे वाला सहायक लगा हुआ है।

अरे नौ की लकड़ी नब्बे ख़र्च, हवाईजहाज में सहायक के आने जाने का खर्च कितना लग जाएगा हिसाब है आपको…और आप फ़िक्र ना करें हम कोई कमरा भी बुक कर लेंगे एक दिन की तो बात है…मौका लगा तो ननदजी को देखने आएंगे —जवाब मालती की भाभी ने दिया।

उमेश जी के आगे सब शीशे सा साफ था…लोग उनके घर उनसे मिलते या प्रेम स्नेहवश नहीं आते अपने काम के लिए आते हैं काम ना हो तो कौन आए भला?? सबको अपनी सहुलियत दिखती है…अगले महीने आने वाले रिश्तेदारों और मित्रों ने भी फोन कर दिया है उन्होने पर ये किसी ने नहीं कहा… मालती की तबीयत खराब है तो हम पहले आ जाते हैं या आकर सेवा कर जाते हैं या किसी ने नहीं कहा कि आप दोनों हमारे घर आ जाइए…सच में विपत्ति में कोई सहारा नहीं देता..।

मालती…थोड़ी हिम्मत करो…हम विनीत के घर चलते हैं –उमेश जी ने देखा बुझी बुझी सी मालती के चेहरे पर मुस्कान आ गई है।

जीजी…आपने कौन सा जादू कर दिया…कल पापाजी फोन करके इनसे माफी मांग रहे थे और कह रहे थे….अपने बच्चों के सहारे से बड़ा दुनिया में कोई सहारा नहीं हो सकता…ये में समझ गया हूं और तुम्हारे पास आ रहा हूं

भाभी…ये जादू मेरा नहीं परिस्थितियों का है…कभी कभी छोटी मोटी परिस्थितियां बड़ी सीख दे जाती है जो पापा को दे गई और उन्हें समझा गई कि अपनों से बड़ा कोई सहारा नहीं…!—विम्मी खुश होती हुई बोली।

विनीत और दिव्या पापा मम्मी के आने की तैयारी में खुशी खुशी लग गए… ज्यादा खुशी इस बात की थी कि उन्हें अपने और वक्त के यारों में फर्क समझ आ गया था।

#सहारा 

मीनू झा 

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