नही अब और नही – किरन विश्वकर्मा

कुछ फैसले अचानक ही लिए जाते हैं…. और वह फैसला मैं ले चुकी हूं…. बस अब मैं बेवकूफ नहीं बनूंगी ना ही अपने बच्चों को छोड़कर किसी की तीमारदारी करने जाऊंगी अगर तुम्हारे घर में सिर्फ मेरा काम सबकी मदद करना और बातें सुनना है तो अब मुझसे यह सब और नहीं हो पाएगा…. हां तुम अभी भी स्वतंत्र हो…. मैं तुम्हें कुछ भी करने से नहीं रोक रही क्योंकि अभी तक जो भी खोया है वह मैंने खोया है….आपको तो अहसास भी नहीं है…क्योंकि आपने तो अपने घर वालो के सिवाय मुझे और मेरे बच्चों को तो कभी कुछ समझा ही नहीं। अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर दिन-दिन भर अस्पताल में आपके घर वालों की तीमारदारी में रही हूं पर आपको उससे कोई फर्क नहीं पड़ता… अंकिता ने कहा।

पर अगर हम भी उनकी तरह ही बन जाएंगे तो हममें और उनमें क्या फर्क रहेगा।  मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी दीदी हॉस्पिटल में हैं तो मैं सोच रहा था…. कि तुम दीदी के पास चली जाना और रात में मैं आ जाऊंगा…. प्रतीक बोला।

” क्यों प्रतीक क्यों मैं ही क्यों घर में और भी तो बहुएं हैं क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं है तो फिर जिम्मेदारी मेरे ही हिस्से ही क्यों?”… अंकिता बोली।

प्रतीक जी आपके घर वालों का काम सिर्फ अपना मतलब हल करना है…. वह यह तो देखते हैं जब वह मुसीबत में हैं तो आप उनकी कितनी मदद करते हैं पर जब हम मुसीबत में होते हैं तब वह यह भूल जाते हैं कि उनका भी फर्ज होता है…. मुसीबत में दूसरे की सहायता करना। अब देखो ना इतने वर्षों में सभी को पढ़ाना- लिखाना और सभी का शादी ब्याह करना…. सारी ही जिम्मेदारियों को निभाया मैंने। यहां तक की जब जिसके बच्चे हुए तो मुझे हॉस्पिटल की जिम्मेदारी दे दी। तब किसी ने भी नहीं सोचा कि मैं अपने छोटे -छोटे बच्चों को घर में अकेले छोड़ कर कैसे जाती  हूं….

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और सबसे ज्यादा दुख तो मुझे तब हुआ जब आपके भाई का मकान बनाने के लिए मां जी ने मुझसे मेरे ही जेवर मांग लिए और आपने भी वह जेवर देने के लिए कह दिया और उन जेवरों को बेचकर आपके भाई का मकान बन गया। एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीत रही होगी। वह तो स्त्री धन होता है…. चाहती तो मैं नहीं देती लेकिन घर में सुख शांति बनी रहे इसकी वजह से मैंने चुपचाप दे दिया।आज मेरा बेटा साल भर से बीमार है… उसके लीवर में इंफेक्शन के कारण हम लोग उसका इलाज कराने के लिए कहां कहां नही भटके… कितने दिन अस्पताल में भर्ती भी रहा।

उसके इलाज के कारण हम कर्जदार भी हो गए।  तब क्या किसी ने आपकी मदद के लिए हाथ आगे बढाया। अपने बेटे के सिर पर हाथ फिराते हुए अंकिता कहने लगी कि…. अब मेरे लिए सबसे ज्यादा जरूरी है अपने बेटे की देखभाल करना और तुम्हारे मतलबी घर वालों के लिए मैं अपने बेटे के साथ अन्याय नही करूँगी….प्रतीक जी!!!! इंसान को उतना ही झुकना चाहिए जितना वाजिब हो… ज्यादा झुकने वालों के ऊपर यहां लोग पैर रखकर निकल जाते हैं। अब मेरा उन मतलबी लोगों से कोई संबंध नहीं है… हां आपको नही रोकूंगी.. आपकी आंखों पर अंधभक्ति की पट्टी चढ़ी हुई है… आपका नही कुछ बिगड़ा है अगर बिगड़ा है तो सिर्फ मेरा।

 

किरन विश्वकर्मा

#अन्याय

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