अब इससे ज्यादा करने की सामर्थ नहीं है मुझमें – किरन विश्वकर्मा

आभा घर के काम जल्दी-जल्दी निपटा रही थी……आज कपड़े धोने की मशीन भी लगाई थी तो उसमें ही काफी समय लग गया था और स्कूल से बच्चों के आने का समय हो गया था और उसे बच्चों के खाने के लिए खाना भी बनाना था….

कि तभी सासू मां का फोन आया और कुछ सामान उन्होंने आभा से बता दिया कि यह सब खरीद कर लाना है। आभा के देवर की शादी होने वाली थी तो जैसे-जैसे सासु मां को याद आता वैसे- वैसे वह आभा को बता देती और साथ में यह भी कह देती कि……

बहू यह तो तुम्हारा फर्ज है, आभा जो भी सासु मां मंगाती वह लिस्ट बनाती जाती ताकि बार-बार बाजार नही जाना पड़े और फिर वह बाजार जाकर सारा सामान ले आती। सारा सामान वह घर में इकट्ठा रखती जा रही थी कि जब ससुराल जायेगी तो सब एक बार में ही चला जायेगा।

सासू मां को और दोनों ननद को जब भी कोई सामान मंगाना होता तब तो वह बड़े प्यार से बोलती पर जब मतलब निकल जाता तब वह तीनों ही उसे कुछ नहीं समझतीं। दुःख तो उसे तब ज्यादा लगता कि उसकी बुराई तो सबसे करते पर जो वह उन लोगों के लिए करती है वह कभी किसी से नहीं बताते। कभी-कभी सासू मां कह भी देती हैं कि बहू पैसे मैं बाद में दे दूंगी पर वह बाद कभी नहीं आता।

दोनों ननद की शादी में भी हर सामान उससे यह कहकर मंगवाया गया था कि यह तो तुम्हारा फर्ज है और दोनों ही शादी में ज्यादा पैसे खर्च करने के कारण उसका तो पूरा बजट ही गड़बड़ा गया था। वह भी कभी कुछ नहीं कहती और फर्ज समझकर हमेशा करती रहती।

चूंकि वह शहर में रहती थी और ससुराल गांव में थी तो गांव में ज्यादा कुछ ना मिलने के कारण सारा सामान अधिकतर उससे ही मंगवाया जाता उसके पति महोदय उसे तो पैसे जल्दी खर्च करने को देते नहीं पर जब माँ जी और दोनों ननद कुछ भी मंगाती

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तो वह झट से आभा के हाथ में पैसे रख देते। आभा ससुराल में कोई भी काम हो कोई भी कार्यक्रम हो वह सब में आगे बढ़कर सारे कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेती लेकिन वह कितना भी कुछ कर ले उसे हमेशा तिरस्कार ही मिलता।



आज देवरानी के लिए कपड़े खरीदने जाना था तो सभी लोग उसके घर पर ही इकट्ठा हुए थे। देवरानी के लिए साड़ी और लहंगा वगैरह खरीदने के बाद सासू मां अपनी दोनों बेटियों से बोलीं  ..कि तुम लोग भी अपने-अपने लिए साड़ी पसंद कर लो…..

.दोनों ननद ने अपने- अपने लिए साड़ियां पसंद कर ली फिर दोनों ननद ने सासू मां से भी कहा…….कि माँ आप भी अपने लिए साड़ी ले लो। वह बैठी- बैठी सोच रही थी कि शायद उससे भी कहेंगे पर यह क्या सभी साड़ियां पसंद कर ली गयीं

और उससे एक बार भी नही कहा गया….बिल पे करके सभी लोग घर आ गए। उसे मन ही मन बहुत दुख हुआ……आभा सोच रही थी कि अगर महंगी ना सही एक सस्ती ही साड़ी ले लेते तो मुझे भी कितनी खुशी होती पर उसका शायद घर की मुर्गी दाल बराबर वाला हाल था की जरूरत तो सभी को उससे थी पर उसे समझता कोई नहीं था।

कुछ दिनों के बाद देवर का तिलक था……सारे कार्यक्रम होने के बाद देवर के ससुराल से क्या-क्या कपड़े आए हैं वही सब लोग देख रहे थे। सभी कपड़ों में नाम की चिट पड़ी हुई थी जैसे ही उसकी साड़ी देखी गई तो छोटी ननद ने झट से आभा वाली साड़ी ले ली

और मां से बोली…….मां मेरी साड़ी से ज्यादा भाभी की साड़ी अच्छी है इसलिए यह साड़ी मैं रख ले रही हूं। तो सासू माँ बोलीं…..हां हां बेटा तू ले ले वैसे भी बेटियों का हक पहले होता है तुम दोनों पसंद कर लो जो बचेगी वह आभा रख लेगी।

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आभा को बहुत बुरा लगा की जब उससे काम करवाना होता है या पैसे खर्च करवाने होते हैं तो यह लोग यह कहते हैं कि तेरा तो फर्ज है और यह कहकर  आगे कर देते हैं पर जब हक की बात आती है तो बेटियों का हक पहले यह कहते हुए उसको पीछे कर देते हैं।



कुछ दिनों के बाद देवरानी के जेवर खरीदने की बारी आई सभी लोग उसके घर में ही इकट्ठा हुए थे। सर्राफ के यहाँ देवरानी के लिए जब जेवर पसंद किए गए तो यह देख कर उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं…….सोने का हार उसके साथ कान का झुमका,चार सोने के कंगन, मांग टीका, पायजेब और चांदी की कमर पेटी उसकी शादी में तो सिर्फ हार एक जोड़ी कंगन, मांग टीका था

ही नहीं और पायजेब और कमर पेटी ही थी और यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि इस समय उनके पास पैसों की बहुत दिक्कत है वह बाद में बनवा देंगे  और उसके घर वाले मान भी गये पर वह बाद कभी नहीं आया। अब उसे समझ में आ गया था कि घर के सभी सदस्यों का महत्व है सिवाय उसके।

सासु मां ने दोनों दामाद को देने के लिए एक एक सोने की चेन खरीदी और दोनों बेटियों के लिए कान के टफ्स खरीदें पर यहां भी उसके लिए भी कुछ लेना है यह वह यह सब भूल गए थे। घर आकर सासू मां बोलीं…….बहू सारे पैसे तो मैंने दे दिए हैं सिर्फ दो लाख रुपये उधार कर दिये हैं तो ऐसा करना तुम धीरे-धीरे हर महीने जाकर थोड़े- थोड़े पैसे देकर सारा कर्ज चुकता कर देना

और वैसे भी यह तो तुम्हारा फर्ज है यह सुनकर उसे बहुत गुस्सा आया कि……जब से देवर की शादी तय हुई है तब से वह काफी पैसा खर्च कर चुकी थी।  सासु मां उससे यह कह कर कि तुम्हारा फर्ज है…….काफी पैसा खर्च करवा चुकी थीं और अब यह दो लाख का कर्ज उस पर और हो गया था।

वह सासू मां से बोली कि माँ जी वैसे ही अब तक बहुत ज्यादा पैसे खर्च कर चुकी हूँ……अब इससे ज्यादा देने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है। वैसे भी आप लोग मुझे घर की मुर्गी दाल बराबर समझते हैं और यह बात मै अच्छी तरह समझ चुकी हूँ…..मैं कितना भी आप लोगों के लिए कुछ भी कर लूँ पर बदले में तो मुझे तिरस्कार ही मिलेगा और यह बात मैं अच्छी तरह समझ गयी हूँ और जिन लोगों से बार-बार तिरस्कार मिले तो उन लोगों के लिए कुछ करने का औचित्य नही रह जाता……

आप लोगों को यह तो याद रहता है कि बहू का फर्ज क्या है पर उसका हक भी है यह आप लोग भूल जाते हैं। वैसे भी इस साल भी मेरा बजट बिगड़ गया है और मुझे अगले महीने दोनों बेटियों की दो- दो महीने की फीस इकट्ठा जमा करनी है

और बड़ी बिटिया को कोचिंग करानी है……अब मेरे लिए अपने बच्चों की पढ़ाई ज्यादा महत्वपूर्ण  है और अब मेरे अंदर कोई भी कर्ज चुकाने का सामर्थ्य नही है …….. . यह कहते हुए आभा रसोई में खाना बनाने की तैयारी करने लगी। सभी लोगों को सांप सूंघ गया था क्योंकि अब तक तो वह आभा का उपयोग ही तो करते आये थे और अपना उल्लू सीधा करते आये थे……….आज आभा ने उन लोगों को वही बातें कही थीं कि जो वह अब तक महसूस करती आई थी।

#तिरस्कार’

किरन विश्वकर्मा

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