पेंटिंग  – विनय कुमार मिश्रा

“तुम नमिता रस्तोगी को कैसे जानती हो? और इनके साथ ये आदमी?”

मैं उससे उसकी बनाई पेंटिंग के बारे में पूछ रही थी।कल एग्जीबिशन में इन बच्चों की पेंटिंग्स ही लगने वाली है। वो दूसरे पेंटिंग्स को बनाने में लगी थी। मैं उसे देख आश्चर्यचकित थी। ये तो कभी मिली भी नहीं उनसे। मैं खुद सिर्फ दो बार मिली हूँ,वो भी एग्जीबिशन में। सालों पहले।

“तुम सुन रही हो?”

वो हाथों में कूँची लिए,अब भी रंगों से खेल रही थी। मन सहसा ही डेढ़ साल पहले चला गया जब ये हमारे पास पहली बार आई थी।

“नाम क्या है तुम्हारा?”

इसने सामने रखे पेंटिंग ब्रश से एक आकृति खींच दी थी। दो पंखों के बीच एक लड़की। मेरे मुंह से निकला

“परी?”

ये मुस्कुराई। मगर इसे साथ लेकर आये लगभग सत्तर साल के गरीब बुजुर्ग दंपत्ति की आँखों में आँसू आ गए थे।

“जी ये बोल नहीं सकती। दो साल पहले हमें मिली थी।हमारे घर के पास। रो रही थी। तब से हमारे साथ है। इसके माता पिता का पता नही। हमने पुलिस को बताया था। पर अब तक उनका पता नहीं चला”

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“स्कूल जाती है?”

“जाती है, पर कुछ समझ नहीं पाती, वहां भी बस चित्रकारी ही करती है। हमने सोचा, जिसमे इसकी रुचि है, इसे वही करने देते हैं”

“आप दोनों ने सिखाया इसे?”

“नहीं ये तो जब मिली थी, तब से ही ये सब बनाती है। हम तो चने बेचते हैं, दिनभर उसी में लगे रहते हैं”

उन्होंने उसके बनाये कुछ चित्र मुझे दिखाएं। बहुत कच्चा सा। हर चित्र में एक औरत एक आदमी और एक बच्ची। थोड़ा सा समझी थी मैं। शायद अपने मम्मी पापा को याद कर रही है। आठ साल की थी। पर बोलती कुछ भी नहीं थी। मैंने इसकी आंखों में देखा था। बहुत कुछ बोलना चाहती थी। अपने चित्रकारी के जरिये। बस यही भाषा इसे समझ आती थी। मैंने इसके कच्चे पक्के, आढ़े टेढ़े आकृतियों को रूप देना सिखाया। जल्दी ही ये उन आकृतियों में रंग भरना सीख गई। मगर इसने नमिता जी का चित्र कैसे? इस आश्चर्य से अभी निकलती कि, उसके दूसरे पेंटिंग ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।

दो युवक एक छोटी सी लड़की का किडनैप कर रहे थे। मैंने परी की तरफ देखा। वो खुद की बनाई पेन्टिग देख डर गई। और आकर मुझसे लिपट गई। मेरी आँखों में आंसू आ गए। मैं माजरा समझ चुकी थी। तभी देखा वो बुजुर्ग दंपति इसे लेने आ गए थे।

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“क्या हुआ इसे?”

“इसके हुनर को पहचान कर, आपने आज इसे शायद इसकी माँ तक पहुंचा दिया है “

मैंने उन दोनों को हाथ जोड़ते हुए कहा

“जी, हम कुछ समझे नहीं?

मैंने बिना देर किए।  दिल्ली में नमिता रस्तोगी को फोन मिलाया

“हेल्लो! नमिता जी, मैं आगरा से राधिका दता बोल रही हूँ, आपको एक पेंटिंग की फ़ोटो भेजी है,देख कर बताइए”

“जी ये तो मैं, और मेरे पति हैं। किसने बनाई?

“आप किसी परी को जानती हैं?”

कुछ देर तक उधर से आवाज नहीं आई। फिर

“हां मेरी बेटी..” वे इतना कह कर रोने लग गईं।

“देखिए आप रोइये मत। आपकी परी बहुत नेक लोगों के साथ है, बस आप जल्दी आ जाओ” उन बुजुर्ग दंपति की आंखों में एक बच्ची को उसके माँ बाप से मिलाने की खुशी चमक रही थी। तभी

“मैम! ये पेंटिग्स उठा लूँ, कल के एग्जीबिशन के लिए?”

“नहीं.. इसे नहीं.. इस पेंटिंग की कीमत..कोई नहीं लगा सकता..!”

कहते हुए मेरा गला भर आया

विनय कुमार मिश्रा

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