“सुना काव्या?”तुमने
“किस बारे में बात कर रही हैं स्पष्ट बताइए ना।”
“यही राकेश जी के बारे में..!”
“ओह,मुझे लगा कोई खास बात होगी।अच्छा भाभी, धरा के आने का समय हो गया, मैं चलती हूं।”
काव्या तो कुछ ही पलों में आंखों से ओझल हो गई पर आंखों के सामने पूरी फिल्म गुजरने लगी।
बीस वर्षों का अंतराल कम तो नहीं होता,इतने वर्षों से साथ रहते हुए हम सभी सोसाइटी वाले एक परिवार की तरह ही हो गए थे।
गाहे बेगाहे कुछ खींचातानी भी कभी कभार हो ही जाती थी।
याद आते रहे ,पुराने दिन जब पजेशन मिलने के बाद धीरे धीरे सभी अपने फ्लैट में रहने आ रहे थे।
नया घर ,नई उमंगे ,नया वातावरण,सभी बहुत प्रसन्न थे उन दिनों।
काव्या जब भी मिलती बहुत अपनेपन का अहसास कराती थी,पूरी बिल्डिंग में ही सबके घर बहुत जल्दी आना जाना शुरू हो गया उसका।
निस्संतान दम्पत्ति राकेश और रीमा के घर तो अक्सर अपनी बेटी के साथ नजर आ जाती थी।
धीरे धीरे उनकी कमजोर नस पकड़ ली और बेटी को अधिकाधिक समय उन्हीं के यहां छोड़ने लगी,छोटी बेटी भी बहुत घुलमिल गई थी रीमा जी से।
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कई बार उन्हीं के यहां खाना खाकर सो भी जाती थी दोपहर को।
रीमा जी का अतृप्त मातृत्व पूर्णता पाने की चाह में काव्या की बेटी धरा से जुड़ता ही गया।
अब धरा उन्हीं के साथ ज्यादा नजर आती।
उन्हीं दिनों काव्या को कहीं नौकरी का ऑफर भी मिला,जिसे रीमा जी और राकेश के समझाने पर उसने तुरंत स्वीकार कर लिया। धरा के जन्म से पूर्व भी उसी कंपनी में नौकरी करती थी वो।
अब तो धरा की जिम्मेदारी स्वीकार करने को भी रीमा जी सहर्ष तैयार ही थीं।
मुंबई में फ्लैट सिस्टम का एक बड़ा फायदा यह भी होता है कि किसी बाहर वाले को आपकी घनिष्ठता की भनक भी नहीं लगती।
काव्या के पति अक्सर टूर पर रहते थे ,और राकेश जी बैंक में मैनेजर होने से सर्व सुविधा युक्त फ्लैट और अन्य सभी जीवनोपयोगी वस्तुओं के स्वामी थे।
धरा के साथ ने रीमा जी के बरसों से शुष्क पड़े जीवन और स्वभाव दोनों में ही स्निग्धता भर दी थी।
एकाध बार मैंने या किसी और ने दबी जुबान से कुछ आगाह करना भी चाहा तो रीमा जी और काव्या दोनों को ही नागवार गुजरा।
अब सभी बिल्डिंग वाले भी उनकी एकता से परिचित हो चुके थे,पीछे कभी कोई कुछ कह भी देता पर सामने सभी ने उन दोनों परिवारों की घनिष्ठता स्वीकार ली थी।
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दिन गुजरते रहे,अब काव्या को धरा का रीमा जी से घुलना मिलना खटकने लगा था,बड़ी भी हो चुकी थी और हरदम किसी सहारे या देखभाल की उतनी जरूरत भी नहीं रही थी।
रीमा जी उन दिनों अनेक शारीरिक परेशानियों से जूझ रही थीं,कुछ बढ़ती उम्र और हार्मोनल परिवर्तन के दौर ने उन्हें कुछ हद तक चिड़चिड़ा भी बना दिया था।
धरा के प्यार में डूबी रीमा जी उसका सान्निध्य चाहती थीं,उसे अपने पास बुलाने के अनेक बहाने गढ़ा करतीं।
सुनने में आया था कि जिद करके उसकी शादी के लिए अच्छी खासी रकम भी उसके नाम से फिक्स डिपॉजिट में रखवा दी थी उन्होंने।
उनकी कुछ ज्वेलरी भी अपनी ही खुशी से वो धरा को दे चुकी थीं।
काव्या के बदलते तेवर राकेश जी भांप चुके थे,रिटायरमेंट
के बाद अधिकतर घर पर ही रहा करते थे।
कभी एक परिवार जैसे रहने वाले काव्या और उसके पति रीमा जी और राकेश के सामने से कई बार कतरा कर निकलने लगे थे।
बुलाने पर कई बहाने और अति व्यस्तता का नाटक।
धरा कितने ही दिन अपनी रीमा आंटी से मिल ही नहीं पाती थी,नई उम्र,नए संगी साथी उसे व्यस्त रखते,पढ़ाई भी थी ही।
उम्र के इस दौर में मानसिक और भावनात्मक लगाव आंटी को खोखला करता रहा,अपनी पीड़ा मन ही मन में दबाए हुए एक दिन भीषण हृदयाघात से वो चल बसीं।
हम सभी के बार बार कहने पर भी काव्या ने धरा को आंटी के अंतिम दर्शन के लिए नहीं बुलाया।
कोई किस हद तक अपने स्वार्थ के लिए किसी की भावनाओं से खिलवाड़ कर सकता है,हम सभी देख रहे थे,पर बात दो परिवारों के आपसी व्यवहार की थी सो सभी शांत ही रहे।
दिन बीतते रहे, रीमा जी को गए हुए भी दो वर्ष से अधिक का समय हो गया,राकेश जी अपने आप को बागवानी और दोस्तों में व्यस्त रखते,घर की देखभाल के लिए एक पूर्णकालिक नौकर भी रख लिया था ।
कुछ दिनों से काव्या और उसके पति फिर से अक्सर अंकल के घर नजर आने लगे थे। हम सभी को यही लगा,शायद उन्हें अपने किए का पछतावा हो रहा है,और आंटी को दिए जख्मों की भरपाई अंकल की देखरेख से करना चाहते हैं।
किंतु अफसोस!हम सभी फिर एक बार गलत साबित हुए,
एक दिन अंकल और काव्या के पति की ऊंची आवाजें हम सबने सुनीं।
उनके नौकर से जानकारी मिली दोनों पति पत्नी अंकल से उनका फ्लैट अपने नाम करवाना चाह रहे थे,उनकी देखभाल का आश्वासन देकर।
नौकर ने ही बताया कि इन दोनों की बातों में आकर अपने दूर दराज के सगे संबंधियों से भी रिश्ते तोड़ चुके थे अंकल आंटी।
अब अंकल ने खरी खरी सुनाकर दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।
उसीकेे दो चार दिन बाद अत्यधिक ब्लड प्रेशर बढ़ जाने से
अंकल पैरालिसिस के शिकार भी हो गए।
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नौकर दौड़ा हुआ आया और बिल्डिंग वाले ही उन्हें हॉस्पिटल लेकर गए।
करीब महीना भर हॉस्पिटल में बिताकर अंकल कुछ स्वस्थ होकर घर लौट आए।
हम सभी बारी बारी से उनके पास आते जाते रहे,उनका भरोसेमंद नौकर भी खूब सेवा करता ही रहा।
करीब चार माह की फिजियोथेरेपी से अंकल ने छड़ी की सहायता से थोड़ा चलना फिरना भी सीख लिया है।
इतना सब कुछ हो जाने पर भी काव्या न तो खुद उन्हें देखने आई ना ही धरा को भेजा।
ये बात अंकल को भी बहुत कचोटती रहती है।
आज मैंने जिक्र किया तब भी उसका बात टाल जाना मुझे भी बुरा लगा।
टहलते हुए सोसाइटी के बगीचे में आ गई मैं।
वहीं बातों बातों में पता चला काव्या और उसके पति आजकल सी विंग में नए रहने आए चौधरी साहब के यहां अक्सर देखे जाते हैं जो अपने इकलौते बेटे की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने से अपना बंगला बेचकर इस बिल्डिंग में रहने आए हैं।
किसी की संवेदना में शामिल होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले लोगों के बारे में सुना तो कई बार था।
करीब से देख भी लिया।
इस बार हम कुछ महिलाओं ने तय किया है कि अब काव्या की दाल नहीं गलने देंगे।
रीमा जी को भी यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी,हम सभी की ओर से।
और स्वार्थ लोलुप काव्या के लिए एक सबक भी।
मौलिक/वर्षा गर्ग