” क्या बात है संदीप बेटा परेशान नजर आ रहे हो सब ठीक तो है ?” ऑफिस में संदीप से उम्र और ओहदे दोनो में वरिष्ठ सिन्हा जी ने पूछा।
” जी सिन्हा साहब बहन की शादी करनी है पर कोई रिश्ता अभी समझ नही आया !” संदीप ने कहा।
” क्यों बेटा ऐसी क्या बात है जो रिश्ता समझ नही आ रहा तुम्हारी क्या उम्मीदें है लड़के से ?” उन्होंने फिर पूछा।
” सिन्हा साहब उम्मीदें मुझे तो बस इतनी है कि हमारे जैसा ही परिवार हो अच्छे लोग हो जहां मेरी बहन खुश रहे पर ..!” संदीप ये बोल चुप हो गया।
” पर?” सिन्हा जी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से संदीप को देखा।
” पर लड़के वालों की उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतर पा रहे …जो भी आता यही बोलता लड़की का पिता तो है नही भाई भाभी ने कल को कोई संबंध ना रखा तो उसका तो मायका ही खत्म हो जाएगा !” संदीप निराश हो बोला।
” ओह ये बात है…बेटा यहां लोगों की सोच बड़ी अजीब है पिता हो भाई न हो तो लोग बोलते हैं पिता के बाद तो लड़की का मायका ही नही रहना क्योंकि मायका तो भाई भाभी से होता है…पिता ना हो तो भाई भाभी पर उंगली उठाते मतलब ये कि उन्हें बात बनानी है बस वजह कोई हो चाहे !” सिन्हा जी बोले।
” जी आपने बिलकुल ठीक कहा पर लोगों की सोच हम नही बदल सकते… पता नही बहन के लिए कब सुयोग वर ढूंढ पाऊंगा मैं!” संदीप बोला।
” बेटा लोगों की सोच नही बदल सकते पर खुद को तो बदल सकते…खैर अभी तुम काम करो !” सिन्हा जी ये बोल अपने केबिन में आ गए।
संदीप एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर की पोस्ट पर है घर में मां , पत्नी और बहन है पिता का स्वर्गवास चार साल पहले हो चुका है। संदीप की बहन रितिका के लिए वो लड़का तलाश कर रहा है पर अभी तक जो रिश्ते देखे उसमे ये अड़चन रही कि संदीप के पिता नही है और ऐसी लड़की से वो लोग अपने बेटे का रिश्ता नही कर सकते जिसके पीहर का कोई ठिकाना नहीं कि आज है कल नही…जी हां ऐसी सोच आज भी कुछ लोगों में है…भाई नही तो भी पीहर नही पिता नही तो भी समझ नही आता लड़के वाले ऐसे मामलों को तूल क्यों देते जो किसी के बस में नही होते। वैसे रितिका एक बैंक में नौकरी करती है।
दो दिन बाद रविवार था। संदीप उसकी पत्नी स्वाति बहन रितिका और मां उमा जी चारों बैठे चाय पी रहे थे तभी दरवाजे की घंटी बजी !
” इस समय कौन आ गया ?” स्वाति ये बोलती हुई दरवाजे की तरफ बढ़ी।
” नमस्ते बेटा मैं संदीप से मिलने आया हूं क्या अंदर आ सकता हूं !” गेट पर आए शख्स ने स्वाति से पूछा।
” जी आइए !” दरवाजे पर एक प्रौढ़ शख्स को देख स्वाति बोली।
” अरे सिन्हा साहब आप इस वक्त यहां सब ठीक तो है ना ? कोई काम था तो मुझे बुला लेते ।” उस शख्स के अंदर आते ही संदीप सोफे से उठकर बोला।
” बेटा बैठने तो दो ….असल में मैं आपकी माताजी से मिलने आया हूं !” सिन्हा जी सोफे पर बैठते हुए बोले। संदीप ने सबसे उनका और उनसे सबका परिचय करवाया। रितिका इतने सिन्हा जी के लिए चाय नाश्ता लेने चली गई।
” बहनजी मेरे बारे में तो आपने जान लिया आपके और आपके घर परिवार के बारे में मैं बहुत अच्छे से जानता हूं तो मैं यहां आपसे कुछ मांगने आया हूं अगर आप दे सके तो ?” सिन्हा जी बोले।
” सिन्हा साहब आप ये कैसी बात कर रहे है आप मुझे हुकुम कीजिए !” उमा जी के कुछ बोलने से पहले संदीप बोला। इतने रितिका चाय नाश्ता लगा लाई।
” अरे बेटा आप बैठो तुम भी यहां हां तो बहनजी मैं आपसे जो मांगने आया आप देंगी ?” सिन्हा जी रितिका से बोल फिर उमा जी से मुखातिब हुए।
” भाई साहब जो मेरे बस में होगा उसे इनकार नही करूंगी !” उमा जी असमंजस में बोली।
” बिल्कुल आपके बस में है बहनजी असल में मैं चाहता हूं कि… अगर आपकी इच्छा हो तो … मैं अपने बेटे के लिए रितिका बेटी का हाथ मांगता हूं अगर रितिका बेटी को मेरा बेटा वंश पसंद आता है तो ..? वरना कोई बात नही।” सिन्हा जी बोले।
” भाई साहब ये क्या कह रहे है आप कहां आप कहां हम ….और फिर …!” उमा जी इतना बोल संदीप की तरफ देखने लगी । रितिका उठकर अंदर चली गई।
” सिन्हा जी आप तो जानते है हमारे पिता नही है और एक बगैर पिता की बेटी को आप अपने घर की बहू बनाना चाहते है !”” संदीप हैरानी से बोला।
” देखो बेटा पिता नही है तो ऐसा तो नहीं की रितिका बेटी सारी जिंदगी कंवारी रह जायेगी फिर तुम हो ना उसके बड़े भाई और बड़ा भाई पिता के समान ही होता है। अब अगर तुम लोगों की इजाजत हो तो मैं बाहर से अपनी पत्नी और बेटे को बुला लूं वो लोग रितिका से और तुम लोग उनसे मिल लोगे!” सिन्हा जी बोले।
” क्या ….आपने उन लोगों को बाहर क्यों बैठा रखा पहले क्यों नहीं बताया की वो लोग भी आए हैं !” ये बोल संदीप तेजी से बाहर निकल गया और सिन्हा साहब की पत्नी मिताली और बेटे वंश के साथ वापिस आया। स्वाति उन लोगों के चाय नाश्ते के इंतजाम को अंदर चली गई।
” ये आपने सही नही किया भाई साहब…बहनजी और वंश बेटे को बाहर जो छोड़ दिया मेहमान भगवान होते और भगवान बाहर इंतजार करे ये गलत है !” उमा जी बोली।
” कोई बात नही बहनजी असल में हम लोग चाहते थे पहले ये आपसे बात कर ले अगर आप 1% भी तैयार हो इस रिश्ते को तभी हम अंदर आए !” मिताली बोली।
” हां तो वंश तुम रितिका से अकेले में बात करोगे या हम सबके सामने ही उससे मिलोगे ?” सिन्हा जी ने बेटे से पूछा।
” पापा आप लोग पहले बात कर लीजिए !” वंश ने उतर दिया।
इधर उधर की बातों और चाय नाश्ते के बाद रितिका को बुलाया गया। बिना मेकअप के भी रितिका बहुत सुंदर लग रही थी वंश ने एक नजर उसे देखा और मुस्कुरा कर निगाह झुका ली।
” रितिका जाओ तुम वंश जी को अपना टेरेस गार्डन दिखा लाओ इतने हम लोग बात करते है !” संदीप रितिका से बोला तो रितिका ने सिर हिलाया और उठ खड़ी हुई पीछे पीछे वंश भी चला गया।
” वाह रितिका जी कितना सुंदर गार्डन है ये !” गार्डन देख वंश बोला।
” जी शुक्रिया !” रितिका मुस्कुराते हुए बोली।
” रितिका जी क्या मैं आपको पसंद हूं ?” अचानक वंश ने पूछा।
” जी …!” वंश के सवाल पर रितिका झेंप गई।
” जी इस जी का क्या मतलब निकालू हां या .. !” वंश मुस्कुराते हुए बोला!
” और यही सवाल मैं करूं तो आपसे ?” रितिका ने शालीनता से कहा।
” तो हमारा जवाब होगा हमे तो आप पहली नजर ही भा गई थी बस पता नही था आप संदीप भैया की बहन है वरना तो रिश्ता पहले ही भिजवा देते …वो तो पापा ने आपकी फोटो दिखाई तो पता लगा वरना तो हम शायद आते भी ना यहां!” वंश शरारत से बोला।
” पर आपने मुझे कहां देखा ?” रितिका हैरानी से बोली।
” आपके बैंक में मेरा अकाउंट है कई बार देखा है आपको मैने !” वंश बोला।
” ओह!” रितिका के मुंह से केवल इतना निकला।
” हां तो बताइए आपको मैं पसंद हूं ?” वंश ने रितिका से फिर पूछा।
” जैसा भैया और मां का फैसला !” ये बोल रितिका नीचे भाग आई पीछे पीछे वंश भी आ गया।
” हां तो बेटा क्या फैसला है तुम्हारा ?” सिन्हा जी बेटे से बोले।
” पापा जो रितिका जी का फैसला हो मुझे मंजूर है !” वंश बोला।
सबकी निगाहें रितिका की तरफ उठ गई । उसके चेहरे पर हय्या और चमक ने उसकी चुगली कर ही दी और सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
” सिन्हा जी …नही नही अंकल जी मैं आपके वादा करता हूं रितिका का पीहर हमेशा सलामत रहेगा क्योंकि यहां उसकी दो दो मां है भाभी और मां के रूप में और भाई के रूप में एक पिता भी !” संदीप हाथ जोड़ कर बोला।
” बेटा मुझे पता है ये वैसे भी रितिका को अब ससुर के रूप में एक पिता और सास के रूप में एक और मां मिल जायेगी …क्यों मालती !” सिन्हा जी बोले।
” जी बिल्कुल मुझे तो अब इंतजार है अपनी बेटी के घर आने का !” मालती जी रितिका के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली।
उसके बाद सबने मुंह मीठा किया और लड़के वालों ने विदा ली। शादी की तारीख पंद्रह दिन बाद की तय हुई । विवाह वेदी पर बैठी रितिका किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी और वंश एक राजकुमार ! रितिका का कन्यादान संदीप और स्वाति ने करके सच में एक पिता और मां का फर्ज निभाया।
दोस्तों पिता का साया हर बेटी के लिए भगवान का साया होता है पर अगर बड़ा भाई संदीप जैसा हो तो पिता की कमी कुछ हद तक भर सकती है पर हमारे समाज में आज भी कुछ जगह लड़की के विवाह के लिए पिता और भाई दोनो का होना जरूरी समझा जाता जो सरासर गलत है।
आपकी दोस्त
संगीता