गांव बड़ा प्यारा, – सुषमा यादव

एक, एक करके सबके जाने के बाद, मेरे श्वसुर अकेले हो गए,, गांव से मैं उनको लेकर म, प्र, अपने कार्य स्थल शहर में ले आई, साथ में अपने पिता जी को भी उनका साथ देने और अकेलापन दूर करने के लिए गांव से ही ले आई,,मेरा मायका, ससुराल, पास, पास ही है,, इनके और … Read more

अंत भला तो सब भला – सरला मेहता भाग (1)

विभा मध्यमवर्गीय परिवार की सर्वगुण संपन्न बेटी है। प्रारम्भ से ही प्रतिभाशाली रही विभा ने इस वर्ष बी ए की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है। पिता गुप्ता जी सेवानिवृत्ति के पूर्व उसके हाथ पीले करना चाहते हैं। ताकि छोटी बेटी श्रेया को भी शिक्षित कर  सके। संयोग से उन्हें अच्छी हैसियत वाले एक … Read more

दिल की कील – ज्योति व्यास

ननद रानी आज भात रखने आई है।बड़े बेटे की शादी है यानी परिवार में इस पीढ़ी की पहली शादी ।धीरे से एक लिस्ट भी दे गई कपड़ों और गहनों की  भात में रखने की! बेचारे भाई -भाभी !स्थिति अच्छी नहीं थी फिर भी  लिस्ट में दिए गए कपड़ों ,गहनों की व्यवस्था कर शादी में खुशी … Read more

मनमानी – मीनाक्षी चौहान

चार दिन नहीं हुए इस नई नवेली बहुरिया को घर में आए कि अपनी मनमानी करनी शुरू कर दी। कैसे ना कैसे मुझ से अपनी बातें मनवा ही लेती है और मैं भी उसकी प्यारी-प्यारी, मीठी-मीठी बातों में आकर हाँ में हाँ मिला ही देती हूँ। परसों पहली बार मेरी रसोई में गोल की बजाय … Read more

हक हमारा – रचना कंडवाल

हमेशा जब भी मैं लिखती हूं तो संडे के बारे में ‌ही लिखती हूं क्योंकि एक हाउस वाइफ का‌ तो संडे मंडे कुछ नहीं होता पर कुछ प्राणी ऐसे हैं जिनका संडे चिल डे होता है। ऐसे ही एक संडे मैं उठी पतिदेव को पानी गर्म करके पीने को दिया और साथ में बेड टी … Read more

रिश्तों के रूप – रचना कंडवाल

गरिमा तुम मेरी बेटी की तरह हो।” ये सुनकर गरिमा को काटो तो खून नहीं। प्रोफेसर श्रीनिवास की आवाज ने उसे सहमा कर रख दिया। गरिमा का कालेज में नया दाखिला हुआ था। गरिमा दिखने में बेहद खूबसूरत थी। चंप‌ई रंग,कत्थ‌ई आंखें, मोहक हंसी,कमर तक लहराते हुए बादामी कलर के बाल उस पर सोने पर … Read more

जीना यहां मरना यहां – रचना कंडवाल

आज शाम को जब पतिदेव के आफिस से आने पर उन्हें चाय बना कर दी तो विचार आया कि चाय पर चर्चा कर लूं। पर किस चीज पर? राजनीति पर पूरा देश कर रहा है।मी टू पर सारी दुनिया में घमासान मचा है। तो ऐसा करती हूं अपने बारे में चर्चा ठीक रहेगी। मैंने शुरू … Read more

रंग- मीनाक्षी चौहान

मम्मी जी और बगल वाली आँटी में खूब जमने लगी है। इस नये घर में आये हमें अभी दो हफ्ते ही हुए हैं लेकिन दोनों ऐसे बतियातीं हैं जैसे एक-दूसरे को बरसों से जानतीं हैं। दोनों शाम ढ़लते ही अपनी-अपनी कुर्सियाँ लिये गेट के बाहर डट जातीं। हर दिन अलग-अलग मुद्दों पर गप्प चर्चा चलने … Read more

मजबूरी…!! -विनोद सिन्हा ‘सुदामा’

बहुत मुश्किल होता है किसी ऐसे सच को स्वीकार करना जो सिर्फ आपसे और आपके व्यक्तित्व से जुड़ा हो और जो कड़वा भी हो और आपको दर्द भी देता हो,मेरे लिए भी एक सच ऐसा था जिसे स्वीकार करना मुश्किल हीं नहीं पीड़ादायक भी था फिर भी स्वीकार कर रखा था मैंने कि मैं एक … Read more

थप्पड़…..।।। – विनोद सिन्हा “सुदामा”

व्हील चेयर पर बैठी मनोरमा देवी सुई में धागा लगाने की बार बार कोशिश कर रही थी पर उनकी बूढी आँखे उनका साथ नही दे रही थी.पास बैठी बबली जो कल ही ससुराल से आई थी ने कहा लाओ माँ मैं सुई में धागा लगा दूँ “तुमसे नहीं होगा” यह सुन मनोरमा देवी मुस्कुराने लगीं … Read more

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