तभी तो सासू मां बेटी के घर रहने चली जाती हैं –  मीनू झा

“भाभी, मम्मी जी जो बार-बार दीदी के घर जाने की ज़िद करती हैं और चली भी जाती हैं, अच्छा लगता है क्या?”
दीप्ति ने फोन पर अपनी जेठानी सोनाली से पूछा।

“क्या कहूं दीप्ति, बुरा तो मुझे भी बहुत लगता है, लेकिन उनको क्या कहा जा सकता है। बेटों को ही समझना चाहिए न ये बात।”

“आपको लगता है भाभी, उनके बेटे कभी उन्हें किसी बात के लिए रोकेंगे या मना करेंगे? मुझे तो डर है कि किसी दिन दीदी के ससुराल वालों ने उन्हें कुछ कह दिया, तो मम्मी जी दुखी हो जाएंगी। वैसे भी लोग यही सोचते होंगे न कि बहुएं ठीक से ख्याल नहीं रखतीं, तभी तो सासू मां बेटी के घर रहने चली जाती हैं। बेचारी मम्मी जी तो दोनों तरफ से ही बदनाम हैं,” दीप्ति बोली।

“खैर, अब कब आने का बोला है मम्मी जी ने?”

“कल बात हुई थी तो कह रही थीं, अगले महीने आऊंगी — तब तक ठंड भी कम हो जाएगी। अब देखते हैं क्या होता है।”

“आपको पता है भाभी, मैंने तो दीदी को भी कह दिया कि पता नहीं कौन-सा दुख देते हैं मम्मी जी को मैं और भाभी, जो वो बार-बार आपके पास चली जाती हैं। मैं और आप तो अपने कर्तव्य उनके प्रति तन-मन-धन से निभाते हैं, पर लोग तो यही कहते होंगे कि बहुएं कष्ट देती हैं, तभी तो मम्मी जी बेटी के घर रहना पसंद करती हैं।”

“और दीदी ने क्या कहा?”

“वो बोलीं — नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है। मम्मी जी तो आप दोनों की बहुत तारीफ करती हैं। हो सकता है बेटी के घर नया-नया आना उन्हें अच्छा लगता हो।”

“अब अपनी किस्मत में जो है वही सही। मम्मी जी को हम लोग क्या कह सकते हैं? चलो, देखते हैं वो अगले महीने आती हैं या नहीं।”

“ठीक है भाभी, फोन रखती हूं — बेटी के लिए भी कपड़े निकालने हैं।”

“ठीक है दीप्ति,” सोनाली ने कहा, “मेरा भी सिर कामों में पड़ा है। बाद में बात करते हैं।”


सावित्री जी के पति गुज़र चुके थे। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। सबकी शादी को कई वर्ष हो चुके थे। दोनों बहुएं बहुत अच्छी थीं, उनका भरपूर ध्यान रखती थीं।

सावित्री जी का एक उसूल था — वह ‘समधन के घर का पानी नहीं पीतीं।’ यानी, वे बेटी के ससुराल नहीं जाती थीं।
लेकिन पिछले साल हालात बदल गए।

बेटी निशा ने पास के शहर में नया मकान खरीदा था। गृहप्रवेश की पूजा में सावित्री जी असमंजस में थीं। तभी दामाद का फोन आया —
“मम्मी जी, आप मेरे पापा के घर तो नहीं जातीं, क्योंकि वो आपके समधी हैं। लेकिन ये घर तो आपकी बेटी के नाम से खरीदा गया है, इसमें आने में कैसी परेशानी?”

बस, फिर सिलसिला चल पड़ा।

बड़ी बहू के घर एक महीना भी पूरा नहीं होता कि सावित्री जी बेटी के घर चली जातीं।
छोटी बहू के पास होतीं तो भी यही हाल।
और पिछले बीस दिनों से वे फिर निशा के घर थीं — जिसकी चर्चा अभी दोनों बहुएं कर रही थीं।

सामने से वे कुछ नहीं कहतीं, पर मन में खटका रहता कि “मम्मी जी बेटी के घर ज़्यादा रहकर बहुओं की छवि खराब कर रही हैं, सहानुभूति भी बटोर रही हैं।”

उधर निशा के मन में भी सवाल उठ रहा था —
“मम्मी इतनी अच्छी हैं, कभी बहुओं की शिकायत नहीं करतीं, उनकी तारीफ करती हैं, फिर भी यहां आकर इतनी खुश क्यों रहती हैं? आखिर ऐसा क्या है यहां जो वहां नहीं?”

एक दिन निशा ने निश्चय किया कि वह खुद पूछेगी।

वो बालकनी में गई, जहां मम्मी कपड़े उतार रही थीं।

“मम्मी, मैं क्या कह रही थी — आप थोड़ी दुबली लग रही हैं।”

“मुझे तो लगता है दो-चार किलो बढ़ गया है। मेरा शरीर भारी लगने लगा है,” सावित्री जी मुस्कुराईं।

“आपको पता नहीं चलेगा मम्मी, लेकिन देखने वालों को पता चलता है। अब आपकी बहुएं कहेंगी — ‘गोलू-मोलू मम्मी जी को भेजा था, नंद ने दुबली कर दी।’”

सावित्री जी हंस दीं, “अरे वहां ऐसा क्या खाती थी जो यहां नहीं खाती? मैं ठीक हूं, दुबली नहीं हुई।”

“मम्मी, खाना तो वही है, पर यहां आप दिनभर व्यस्त रहती हैं — कभी रूम सजाती हैं, कभी अलमारी ठीक करती हैं, कभी दीवान खोलकर व्यवस्थित करती हैं, कभी किचन की सफाई। दिनभर इतना काम करोगी तो दुबली तो हो ही जाओगी।”

“सच कहूं बेटा,” सावित्री जी ने कहा, “मेरी दोनों बहुएं बहुत अच्छी हैं। भगवान सबको ऐसी बहुएं दे। समय पर चाय, नाश्ता, खाना — सब कुछ। मेरे कपड़े, दवाइयां, ज़रूरतें — सबका ख्याल रखती हैं। मुझे कुछ करने नहीं देतीं।”

“तो फिर मम्मी, परेशानी क्या है?”

“बस यही तो मेरा दुख है, बेटा,” सावित्री जी ने गहरी सांस ली,
“मुझे सब कुछ मिलता है — खाना, प्यार, सम्मान — पर अधिकार नहीं।
मुझे हमेशा लगता है जैसे मैं उनके घर की मेहमान हूं।”

“कैसा अधिकार, मम्मी?” निशा ने पूछा।

“देख बेटा, बड़ी बहू सोनाली ने हर काम के लिए नौकर रखे हैं। वह अपने बुटीक में व्यस्त रहती है, तो दिनभर घर में नौकर-चाकर रहते हैं। हर चीज पर ताला लगा होता है — बर्तन, रसोई, यहां तक कि डिब्बे तक।
और छोटी बहू इतनी परफेक्शनिस्ट है कि हर काम खुद करना चाहती है — बर्तन कामवाली से धुलवाकर खुद धोती है, झाड़ू-पोछा के बाद खुद सफाई करती है। उसके घर में कुछ करने की गुंजाइश ही नहीं बचती।”

“तेरे घर में मुझे किसी चीज़ की रोक नहीं है। जो चाहूं, कर सकती हूं — सजा सकती हूं, सहेज सकती हूं, रख सकती हूं। और तू तारीफ भी करती है। यही ‘अधिकार’ मुझे वहां नहीं मिलता।”

निशा मुस्कुराई, “मम्मी, शायद भाभियों को लगता होगा कि आपकी उम्र ज़्यादा हो गई है, आप काम करोगी तो थक जाओगी। इसलिए रोकती होंगी।”

“हो सकता है बेटा,” सावित्री जी बोलीं, “लेकिन मैं भी तो जीती-जागती इंसान हूं। बैठे-बैठे कितनी देर किताबें पढ़ूं, कितना टीवी देखूं, कितनी बातें करूं? मंदिर भी बस शाम को जाना होता है।
जब तक कुछ काम न करूं, दिन अधूरा लगता है। व्यस्त रहने से मुझे जीवन का उत्साह मिलता है।”

सावित्री जी के होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई।

अब निशा समझ चुकी थी —
मां को केवल प्यार, सम्मान और सुविधा नहीं चाहिए, व्यस्त रहने और योगदान देने का अधिकार भी चाहिए।


 मीनू झा

error: Content is protected !!