पत्नी हूं तुम्हारी, सोशल सिक्योरिटी नहीं – सुषमा तिवारी

“विवान सुनो ना! मुझे एक हफ्ते के लिए मम्मी के घर जाना है तो प्लीज टिकट करवा देना| पापा की तबीयत कुछ ठीक नहीं है, वह चाहते हैं मैं एक हफ्ते तो उनके साथ गुजार लूँ”| चित्रा ने कपड़ों की तह लगाते हुए विवान से कहा जो बेखबर सा अपने मोबाइल में लगा हुआ था। … Read more

“मायके का एक कोना अपना सा” – रचना कंडवाल

“अरे कृतिका तुमने अपने रूम का क्या हाल बना रखा है?” सीमा कमरे में कदम रखते ही नाराज हो कर बोली।  कृतिका सीमा और आलोक की सत्रह साल की बेटी है। जो इंजीनियरिंग की कोचिंग कर रही है। वो झुंझला गई। “मम्मा मुझे अलग-अलग बुक्स से पढ़ना पड़ता है। इसलिए इधर उधर फैल जाती हैं।”सीमा … Read more

माँ मैं बहुत बुरी हूँ ना…. – रश्मि प्रकाश

आज माँ को इस हालत में देख कर सुमिता के आँसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे…. वो माँ जो हर वक़्त काम करती नज़र आती थी आज बिस्तर पर पड़ी थी…. एक तो उम्र का असर और काम करते रहने की वजह से शरीर भी लाचार सा हो गया था…. माँ दमयंती जी … Read more

दिल का बंटवारा कभी न हो••••• – अमिता कुचया

एक  गांव के पंच परिवार की बात है। उस परिवार के मुखिया रामेश्वर प्रसाद  बहुत अच्छे नेक दिल इंसान है। उन्हें कोई भी ग़लत  बात करें तो वो सहन नहीं कर सकते हैं। उनके परिवार में उनके  तीन  बेटे और एक बेटी है।वो घर में जो बात कर दे तो पत्थर की लकीर बन जाती … Read more

तुम बहू हो बहू की हद में ही रहो…! – भाविनी केतन उपाध्याय 

शर्वरी की शादी अभी जतिन से पांच महीने पहले ही हुई है, शर्वरी के ससुराल में जतिन के अलावा उसके सास-ससुर और दो देवर भी हैं। शर्वरी की सासूमां सरला जी बहुत सुलझी हुई और स्वभाव से बेहद सरल नाम के अनुरूप ही महिला हैं। वो शर्वरी को अपनी बेटी की तरह ही रखती हैं…… … Read more

 “भरोसा” – दुर्गेश खरे

मंगला बड़े मनोयोग से स्टील के डिब्बे में अपने हाथों से बनाए हुए गोंद के लड्डुओं को सजा कर रख रही थी और साथ में अपने पति को चेतावनी भी दे रही थी, “ रामू के बाबू ! गाय के घी का डिब्बा थैले में अभी रख लेना, कहीं सबेरे जल्दी में हम लोग बिसरा … Read more

बेटी – गीता चौबे “गूँज”

फोन का रिसीवर रखने के बाद रजनी के मन में अपनी बिटिया रंजीता के आखिरी शब्द बहुत देर तक गूँजते रहे…  ‘बेटी को बेटी ही रहने दो, उसे बेटा मत बनाओ…’   रजनी अवाक रह गयी और गहराई से सोचने लगी कि उससे चूक कहाँ हुई। इतना आक्रोश कैसे भर गया उसकी बेटी के मन में। … Read more

उम्मीद का दीया – शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’

प्राची से लालिमा प्रस्फुटित हो जैसे ही वसुधा को चूमने लगती है, प्रकृति विभोर हो झूमने लगती है। उषा-काल की प्रथम किरण को अपने आगोश में समेटने का हेतल का नियम ही था। ऐसा कोई दिन नहीं निकलता था जब उसने सूर्योदय की पहली किरण का आचमन नहीं किया हो। शायद कोई किरण उसके जीवन … Read more

उम्मीद कामिनी हजेला

एक सड़क  दुर्घटना में   कमला   के पति और इकलौते पुत्र  की मृत्य  होगई  थी। उसे लगा दुनिया दुनियां ही खत्म  हो गई। थोड़े दिन  शोक मनाने के बाद  कमला ने पुनः नये सिरे से जीवन जीने का  फैसला लिया । उसने  पति की बैंको की धनराशि ,घर सब अपने नाम  करवाने का प्रयास  … Read more

“एक कप चाय तुम्हारे साथ” – ऋतु अग्रवाल

“नीलिमा! कहाँ हो भई? राहुल, मनस्वी, यहाँ आओ।” प्रभात ने दरवाजे से ही आवाज लगाना शुरू कर दिया।      “आ रही हूँ। क्या बात है, बड़े खुश लग रहे हो? बच्चे जरा बाजार तक गए हैं, नए साल की पार्टी के लिए सामान लेने।” नीलिमा हाथ पोंछते हुए बाहर आई। सप्रभात के हाथ में मिठाई के … Read more

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