स्वाति सदन की दूसरी मंजिल के पिछवाड़े वाले कमरे में पड़ा हुआ हूं,कमरा क्या एक छोटी सी कोठरी जिसमें स्वाति कभी छत से उतार कर अचार के मर्तबान, बड़ियां बनाने का बांस का बड़ा सा प्लेटनुमा टोकरा, चटाइयां और बड़ी दरी सहेजकर रख दिया करती थी।
बड़े अरमान से बनाया था हमने ये स्वाति सदन!
तब दोनों बेटियां छोटी सी थीं, मां भी जिंदा थीं,बेटियों की सार संभाल कर सकती हैं सोचकर मैंने बेटियों को नर्सरी स्कूल भी नहीं भेजा । स्वाति और मेरे दोनों के अकाउंट से लोन उठा लिया था । स्वाति बेचारी अपने आफिस से लौटते ही किचन में घुस जाती। मां की सत्रह झिड़कियां भी सुनती जाती और रात ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे बैडरूम में आने पर मुझसे भी चार बातें सुनकर चुपचाप सो जाती।
सुबह साढ़े चार बजे से उठकर खाना नाश्ता, बच्चियों का दूध मां का गर्म पानी,चाय का थर्मस सब तैयार कर देती।उस समय हमारे घर में कोई भी कामवाली नहीं थी क्योंकि मकान का लोन सिर पर था। स्वाति का आफिस मेरे रास्ते में ही पड़ता था इसलिए वह मेरे साथ ही स्कूटर से चली जाती थी अपने आफिस टाइम के आधे घंटे पहले ।
घर का काम मिस्त्री मजदूरों की झिकझिक और अपनी नौकरी का दबाव चार माह के गर्भ के साथ साथ स्वाति सब झेल रही थी। चूंकि इसके पहले दो जुड़वां बेटियां पैदा की थीं इसलिए सासूमां को तो कोई देखरेख करना ही नहीं थी और मैं?
अपनी मां का आज्ञाकारी पुत्र ही तो था।
खैर; मकान की छत डली और बेटे का जन्म हुआ। बड़े अहसान के साथ मैंने घर को नाम दिया – स्वाति सदन।
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बच्चियां सरकारी स्कूल में भर्ती हो गईं, और लोन भी एक तिहाई पट चुका था। बेटा शुभम भी बड़ा हो रहा था इसलिए जोड़ जुगाड कर शहर के सबसे बड़े स्कूल में भर्ती करवाया। मैं और मेरी मां घर खर्च की खींचतान पर बहस करते रहे और स्वाति ने पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। बेटियां पढ़ लिख कर विदा हो गईं और स्वाति ने भी आंखें मूंद लीं।
स्वाति विदा हुई फिर मां भी जिंदा नहीं रहीं। शुभम जब मुश्किल से बारहवीं पास होने के बाद ग्रेजुएशन में चार की जगह छै साल रगड़ता रहा तो किसी तरह अपने बाॅस के हाथ जोड़कर क्लर्की दिलवा दी तो साहबजादे ने अपनी शादी भी कर ली।
नीचे छै, ऊपर चार कुल मिलाकर दस कमरे और ऐसी तीन कोठरियां, लेकिन… मुझे तो अपनी जिंदगी के आखिरी पल यहीं गुजारना है।
सजा संवरा ड्राइंग रूम,लकदक हाॅल, माड्यूलर किचन और दो नौकरों से सुसज्जित इस घर में रिटायर पिता ही कबाड़ लगने लगा है इसलिए उसे इस कोठरी में नजरबंद कर दिया गया है जहां एक छोटी सी खिड़की से झांक कर दुनिया की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है।
बेटियां आती हैं साल छै महीने में, बहुत कहती हैं कि पापा! हमारे साथ चलो, लेकिन अब लगता है कि जिनके साथ कभी सीधे मुंह बात नहीं की,किस मुंह से उनकी छांव गहें?
और बच्चियां अपने घर बार में सुखी रहें वही मेरा सुख है।
बचपन में बाबूजी को आसमान के तारों में खोजता रहता था और अब भी किसी तरह खिड़की के सींखचे पकड़ कर घंटों ताकता रहता हूं कि शायद किसी तारे के रूप में स्वाति मुझे मिल जाए और ले जाए मुझे खींच कर –
लम्हों के आरपार।
उषा शुक्ला